Thursday, 17 May 2012

अ-संन्यास

 
हिन्दू परम्परा में संन्यास की तरह गृहस्थ धर्म को भी मूल्य प्रदान किया गया है । भारतीय और मानवशास्त्रीय साहित्य में इस बात के प्रचुर प्रमाण उपलब्ध हैं कि हिन्दू समाज गृहस्थ जीवन को सबसे अधिक महत्त्व देता है । इसके अलावा मध्ययुगीन भारत के सभी भक्ति आन्दोलन भी आत्मसंयमित सांसारिकता का गुणगान करते हैं ।  विख्यात समाजशास्त्री त्रिलोकी नाथ मदन की यह चर्चित रचना संन्यास और गार्हस्थ्य की विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सम्बन्ध की मानवशास्त्रीय खोज करती है । पाँच अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में संन्यास की बजाय सांसारिकता को सद्जीवन मानने का पारम्परिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की चेष्टा की गयी है ।  
 
Book : Asanyas Hindu Sanskriti : Kuchh Vishay Kuchh Vyakhyayen 
Author : Triloki Nath Madan
Translator : Rajiv Kumar 

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`350(HB) 
ISBN : 978-93-5000-098-1
Total Pages 202
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Social Science

पुस्तक के सन्दर्भ में......
प्रोफेसर त्रिलोकी नाथ मदन द्वारा रचित यह विख्यात पुस्तक हिन्दुओं के गृहस्थ जीवन के बारे में है । सामाजिक मानवशास्त्र की इस रचना के अनुसार संन्यास हिन्दू धर्म का सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक आदर्श जरूर है, लेकिन गृहस्थ की भाषा में अनूदित होकर यही संन्यास  सांसारिक बंधनों में जीते हुए आत्मनियंत्रित और विरक्ति का भाव ग्रहण कर लेता है । इस लिहाज से ये सांसारिक सम्बन्ध अपने-आप में बुरे नहीं हैं । मनुष्य को सिर्फ इन सम्बन्धों का दास होने से बचना है। उसका लक्ष्य है सम्पूर्ण भोग-विलास और सम्पूर्ण त्याग के बीच के बिन्दु की तलाश करना । 
गृहस्थ की परिभाषा में सद्जीवन एक सांसारिक जीवन है।  पुस्तक के सभी अध्याय इसी विषय वस्तु का विस्तार हैं । सबसे पहले गार्हस्थ्य सम्बन्धी विचारधारा की व्याख्या की गयी है, जिसमें धनधान्य से परिपूर्ण उत्तम जीवन और साथ ही मानसिक वैराग्य का वर्णन है । दूसरे अध्याय में गृहस्थ की जीवन-शैली में मांगलिकता और शुद्धता का महत्व आँका गया है । तीसरे अध्याय में वैराग्य और श्रृंगारिकता के बीच सन्तुलन बनाने और दोनों के द्वैध से मुक्त होने के प्रयास की चर्चा है ।  चौथा अध्याय शिव (उत्तम ) की सत्ता स्वीकारता है और कामनाओं को सदाचरण के अधीन रखने का समर्थन करता है । पाँचवें अध्याय के मुताबिक उत्तम जीवन की सर्वोत्कृष्ट साक्षी उत्तम मृत्यु है, जिसका व्यक्ति को निर्भय होकर वर्णन करना चाहिए । 

यह परम्परा हमें बताती है कि उत्तम जीवन की परिभाषाएँ समय के साथ बदलती हैं, नये नैतिक मूल्यों  का आविर्भाव होता है और उनके  साथ नयी चिन्ताएँ जन्म लेती हैं ।  इस प्रकार आधुनिक भारतीय को पश्चिम प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता, विकास और लोकतंत्र के विचारों के सन्दर्भ में अपने जीवन को परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है ।  लेकिन एक संस्कृति की परम्पराओं का निर्वाह दूसरी संस्कृति में आसानी से नहीं होता ।  आधुनिक हिन्दू को इसीलिए खंडित मानस का तनाव झेलना पड़ता है । हिन्दू मानस की इन्हीं मुश्किलों के चित्रण के साथ पुस्तक समाप्त होती है । 

लेखक के सन्दर्भ में......
त्रिलोकी नाथ मदन एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के समाजशास्त्री और आधुनिक युग में धर्म, परम्परा और बहुलवाद के प्रमुख अध्येता हैं। अवकाश प्राप्त करने से पहले इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनोमिक्स ग्रोथ के निदेशक  रहे । प्रोफेसर मदन की बेहद चर्चित पुस्तक मॉडर्न मिथ्स एंड लॉक्ड माइंड्स : सेकुलरिज्म एंड फंडामेंटलिज्म इन इंडिया को विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस .डी. एस.) द्वारा एच. आर. चतुर्वेदी पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है ।