Monday, 14 May 2012

कुछ खोजते हुए



Book : Kuchh Khojte Hue
Author : Ashok Vajpeyi
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`1495(HB)
ISBN : 978-93-5072-204-6
Total Pages :  729
Size (Inches) :
6.75X9.75
Category  : Collection of Prose

सन 2005-2009 के दरम्यान 'जनसत्ता' (अखबार) के साप्ताहिक स्तम्भ कभी-कभार में प्रकाशित चुनिन्दा टिप्पणियाँ
पुस्तक के संदर्भ में अशोक वाजपेयी के विचार.......
यह कहना या ठीक-ठीक बता पाना कठिन है कि इस जिन्दगी भर से चली आ रही खोज का लक्ष्य क्या है ? बिना लक्ष्य के या किसी प्राप्ति की आशा के खोज क्यों नहीं की जा सकती? अगर यह सम्भव है, भले कुछ अतर्कित है तो इन पृष्ठों में जो कुछ खोजा जाता रहा है इसका कुछ औचित्य बनता है ।  खोजने की प्रक्रिया में कुछ सच, कुछ सपने, कुछ रहस्य, कुछ जिज्ञासाएँ, कुछ उम्मीदें , कुछ विफलताएँ सब गुँथे हुए से हैं ।  शायद कोई भी लेखक कुछ पाने के लिए नहीं खोजता : कई बार वह कुछ इससे पहले कि लेखक को इसका सजग बोध हो या कि वह उसे विन्यस्त कर पाये वह फिसल भी जाता है और कई बार ऐसे गायब हो जाता है कि दुबारा फिर खोजे नहीं मिलता एक साप्ताहिक स्तम्भ के बहाने अपनी ऐसी ही बेढब खोज को दर्ज़ करता रहा हूँ ।  इसमें संस्मरण, यात्रा-वृत्तान्त, पुस्तक और कला समीक्षा, इधर-उधर हुए संवाद और मिल गये व्यक्तियों से बातचीत आदि सभी संक्षेप में शामिल हैं । मुझ जैसे बातूनी व्यक्ति को, 'जनसत्ता' में पिछले तेरह वर्षों से, बिला नागा, अबाध रूप  से 'कभी-कभार' स्तम्भ लिखते हुए यह अहसास हुआ कि संक्षेप लेखन का बेहद वांछनीय पक्ष है ।  जो संक्षेप में कुछ पते की बात नहीं कर सकता वह विस्तार में ऐसा कर पायेगा इसमें अब कुछ संदेह होने लगा है कि विस्तार से लिखना चाहिए था ।  यह उन 'चाहियों' में से एक है जो मुझसे नहीं सधे।  जैसे लिखना तो मुझे था डायरी, जो अब-जब-जैसी याद आती है इसी स्तम्भ में लिख देता हूँ : डायरी नहीं लिख पाया ।  जो नहीं हुआ उसका ग़म क्या,वह नहीं हुआ !

लेखक के सन्दर्भ में......
पोलैण्ड गणराज्य के राष्ट्रपति द्वारा और फ्रांसीसी सरकार द्वारा वहाँ के उच्च सिविल सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी हिन्दी कवि-आलोचक, अनुवादक, सम्पादक तथा भारत की एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति हैं । इनका जन्म 1941 में हुआ । भारत के एक विशिष्ट बुद्धिजीवी वाजपेयी एक सृजनात्मक विश्व पर्यटक हैं ।  जिन्होंने सम्मेलनों में भाग लेने, व्याख्यान देने के क्रम में कई बार यूरोप आदि का भ्रमण किया है ।  इन्होंने पोलैण्ड के चार प्रमुख कवियों-चेस्लाव मिलोष, विस्वावा षिम्बोसर्का, ज्बीग्न्येव हेर्बेर्त और तादेऊष रूज़ेविच की कृतियों का हिन्दी अनुवाद किया है । इनकी 13 कविता की पुस्तकों, आलोचना की 7 पुस्तकों और अंग्रेजी में कला पर 3 पुस्तकों सहित इन्हें संस्कृति के विशिष्ट प्रसार और नवोन्मेषी संस्था निर्माता के रूप में जाना जाता है। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, दयावती कवि शेखर सम्मान, भारत भारती और कबीर सम्मान प्रदान किये गये हैं