Thursday, 10 May 2012

पॉपूलर कल्चर के विमर्श



'पॉपूलर कल्चर' के विविध रूपों का अध्ययन करने वाली सुधीश पचौरी की यह चौथी पुस्तक है, जिसमें 'पॉपूलर कल्चर' के अनेक रूपों एवं स्तरों की समीक्षाएँ हैं । इन टिप्पणियों में 'पॉपूलर कल्चर' के जिन रूपों के बारे में चर्चाएँ की गयी हैं, वह इसी 'पॉजिटिव' दृष्टि से की गयी हैं ।'पॉपूलर कल्चर' जिस क्षण हमें अपनी गिरफ़्त में लेती है, उसी समय हमें 'मुक्त' भी करती है । यही पॉपूलर कल्चर की 'द्वन्द्वात्मकता' है । उसके विमर्श हैं

Book : POPULAR CULTURE KE VIMARSH

Author : Sudhish Pachauri
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`395(HB)
ISBN : 978-93-5000-729-7
Total Pages :  198
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  :  Media/Literature

पुस्तक के सन्दर्भ में....
'पॉपूलर कल्चर के विमर्श' एक जरूरी किताब है। समकालीन भारतीय समाज में 'पॉपूलर कल्चर' नित्य 'उपभोग्य' हो रही है । ऐसी संस्कृतियाँ अब बहुत कम बची हैं जो इस उपभोक्तावाद की शिकार न हों । 'पॉपूलर कल्चर' को वे लोग 'पतित संस्कृति','उपसंस्कृति', कह कर निन्दित करते हैं, जो किसी 'पुराणपन्थी' के मारे होते हैं । उनकी प्रतिक्रियाएँ 'नैतिक दारोगाई' की ओर धकेलती हैं उच्चतर अध्ययन के संस्थानों में 'सांस्कृतिक विमर्श' एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में पढ़े-पढ़ाये जाते हैं । 'पॉपूलर संस्कृति' के 'पाठ' को समझने के लिए सांस्कृतिक अध्ययनों के विमर्शों, उनमें उपलब्ध पाठ-विग्रह और विखंडन के तरीकों को पढ़ना अनिवार्य माना जाता है  । भारतीय समाज में उपलब्ध 'पॉपूलर कल्चर' के अनेक पहलुओं, उसके अनेक  'अनुषंगों' और 'छटाओं' की समीक्षा है । फैशन, ग्लैमर, निर्बाध कामनाएँ, नये किस्म का अकेलापन, भीड़, उन्माद,हिंसा, सैक्स, लालच, स्वार्थपरता, निजता और नयी अन्धी स्पर्धा ने मनुष्य की जीवन शैली और जीवन-चर्या पर गहरे प्रभाव डाले हैं । यह किताब इन तमाम पहलुओं से गुजरती है और 'पॉपूलर कल्चर' के नये विमर्शों से परिचित कराती है

लेखक के सन्दर्भ में....
 
मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखंडन और विखंडन में 'कामायनी'), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित, हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा 'साहित्यकार' का सम्मान आदि सम्मानों से पुरस्कृत मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी का जन्म उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी) आगरा विश्वविद्यालय से तथा पीएच.डी.एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय से पूर्ण की । इनकी कुछ चर्चित पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं, मीडिया की परख, पॉपूलर कल्चर, भूमंडलीकरण, बाज़ार और हिन्दी,टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार, उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श, बिंदास बाबू की डायरी, फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति,हिंदुत्व और उत्तर-आधुनिकता, विभक्ति और विखंडन, निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद, जनतन्त्र और आतंकवाद, इत्यादि । वर्तमान में यह दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली में 'डीन ऑफ़ कॉलेजिज' हैं