Thursday, 31 May 2012

महादेवी साहित्य (सम्पूर्ण चार खण्डों में)



"महादेवी छायावादी आन्दोलन के चार प्रमुख कवियों के बीच अकेली महिला रचनाकार हैं। उनका कृतित्व इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि उन्होंने कविता को संगीत और चित्रकला की संगति में अभिव्यक्ति दी। संगीत तो शब्दों के स्वर और छंद-लय में समाहित हो गया पर चित्र उनकी तूलिका के माध्यम से कविता के पाश्रर्व में संवेदनों को मूर्त रूप देते रहे"।
- निर्मला जैन 

Book : Mahadevi Sahitya ( Total Four Parts)
Editor : Nirmala Jain
Publisher : Vani Prakashan 

Price  : ` 4000
Total Pages :  1463
Size( Inches) : 
7.5X10.25
Category : (
Rachnawali )
Book : Mahadevi Sahitya ( Total Four Parts)

पुस्तक : महादेवी साहित्य (सम्पूर्ण चार खण्डों में)
संपादक : निर्मला जैन 
मूल्य :   4000 रुपए (सम्पूर्ण चार खण्ड )

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 
         
महादेवी साहित्य(खण्ड एक)
     ISBN  :  81-8143-678-4
 महादेवी साहित्य(खण्ड दो)
     ISBN  :  81-8143-679-2
 महादेवी साहित्य(खण्ड तीन)  
     ISBN  :  81-8143-680-6
 महादेवी साहित्य(खण्ड चार)
      ISBN  :  81-7055-742-9


महादेवी साहित्य (खण्ड एक)     
'यामा' और 'दीपशिखा' की वैयक्तिक सुख-दु:खात्मक गीत-सृष्टि कवयित्री के रूप में महादेवी की ख्याति का आधार है। माँ के मुख से सुने भक्त कवियों के पदों ने बाल्यावस्था में ही तुकबन्दियाँ करने के लिए उन्हें प्रेरित किया था। पर उन रचनाओं को देखकर यह कल्पना करना कठिन रहा होगा कि उसी लेखनी का आश्रय पाकर छायावाद की गीति-कला कभी अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त करेगी  
महादेवी का कहना था कि, 'व्यक्तिगत सुख विश्व-वेदना में घुलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और व्यक्तिगत दुःख विश्व के सुख में घुलकर जीवन को अमरत्व'। उनके गीत आत्म के सर्वतोन्मुख होने में चरितार्थता पाने की ऐसी ही अथक साधना का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। महादेवी के गीत काव्य-कला के साथ संगीत और चित्रकलाओं के मेल का अद्भुत उदाहरण हैं, अपने इस कथन को कि  'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता हैकवयित्री ने ' दीपशिखा' में प्रतिफलित किया है  

महादेवी साहित्य (खण्ड दो)
1914-1915 के आसपास की रचनाओं से 1928 की कविताओं की तुलना करने पर पाठक ब्रजभाषा कविता से खड़ी बोली में छायावाद तक, हिन्दी काव्य-यात्रा के विभिन्न चरणों को पहचान सकेंगे । 
हिन्दी कविता में महादेवी की पहचान जिन छायावादी रचनाओं के आधार पर बनी उनका रचना समय 'नीहार' से 'दीपशिखा' तक माना जाता है पर तुकबन्दियाँ उन्होंने लगभग छह वर्ष की उम्र से ही शुरू कर दी थीं। 1917-1930 के लम्बे दौर के बीच महादेवी ने जो रचा उसमें से कुछ कविताएँ बाद के संग्रहों में प्रकाशित भी हुईं पर बहुत कुछ पत्रिकाओं में ही सिमटा रहा और लगभग विस्मृत हो गया । महादेवी की काव्य-यात्रा के विकास को समझने के लिए यह रचनाएँ साक्ष्य हैंउनका यह 'तुतला उपक्रम' अपनी बाल्यावस्था में ही पशु-पक्षियों से संवाद के रूप में आरम्भ होता है। महादेवी की मानसिक बनावट में, समय के साथ आनेवाले इस अंतर ने उनकी काव्यभाषा और शिल्प में कैसा बदलाव उपस्थित किया है। इस खण्ड के माध्यम से पाठक उन्हें नए सिरे से समझने की प्रेरणा देगा ।  

महादेवी साहित्य (खण्ड तीन)
'यामा' और 'दीपशिखा' की संवेदनशील करुणामयी कवयित्री की रचनाशीलता का बहिर्मुखी प्रवाह उनके संस्मरणात्मक साहित्य में मिलता है ऐसे अनेक पात्र जो सामाजिक विधान के अति साधारण 'सामान्यों' की श्रेणी में आयेंगे महादेवी की करुणा के स्पर्श से इतने सजीव और मर्मस्पर्शी हो गए हैं कि उनसे परिचय के बाद पाठक के लिए उन्हें भुलाना संभव नहीं हो सकतामहादेवी ने अनेक पीड़ितों को अपनी लेखनी के स्पर्श से आत्म के वृत्त में कुछ ऐसे समेट लिया है कि वे उनके परिचित कम परिवारी ही अधिक प्रतीत होते हैं ।  अपने पात्रों के अंतर्बाह्य व्यक्तित्व को पाठक की कल्पना के समक्ष साकार खड़ा कर देने में वे जितनी सिद्धहस्त हैं, उतनी ही उनके परिवेश, उनकी स्थिति के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों और समाज की विवेचना और यथावश्यक आलोचना करने में समर्थ हैंवह अपने पत्रों का स्मरण और आत्मीयता से करती हैं ।  
इस खण्ड में सम्मिलित अनुक्रम के अंतर्गत आप निम्नलिखित संस्मरणात्मक साहित्य पढ़ सकते हैं । 
अतीत के चलचित्र के अंतर्गत......
रामा, भाभी, बिंदा, सबिया, बिट्टो, दो फूल, घीसा, सबला, अलोपी, बदलू, लछमा,
स्मृति की रेखाएँ के अंतर्गत.......
भक्तिन, चीनी फेरीवाला, पर्वत पुत्र, मुन्नू की माई, ठकुरी बाबा, बिबिया, गुंगिया
पथ के साथी के अंतर्गत........
कवीन्द्र, दद्दा, सुभद्रा, निराला भाई, सुँघनी साहु, पन्त जी, कवि बापू
मेरा परिवार के अंतर्गत ......
नीलकंठ, गिल्लू, सोना, दुर्मुख, गौरा, नीलू, निक्की, रोज़ी और रानी 
स्मारिका के अंतर्गत.....
पुण्य स्मरण, जवाहर भाई, राजेन्द्र बाबू, संत राजर्षि, परिशिष्ट 

 महादेवी साहित्य (खण्ड चार)
महादेवी साहित्य के इस खंड में उनका चिंतनपरक विवेचनात्मक लेखन संकलित है।   इन लेखों में चारों ओर के जीवन और समाज के प्रति गहरे सरोकार और प्रखर बौद्धिकता से संपन्न उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष उजागर होता है जो अपने समय में पूरी तरह स्थित है। विभिन्न संदर्भों में समय-समय पर रचित इन लेखों का विषय-विस्तार विस्मयकारी हैइनमें संस्कृति जैसे अवधारणात्मक विषय से लेकर राष्ट्र भाषा शिक्षा परम्परा, सामयिक समस्या जैसे प्रस्तुत विषयों पर उनकी गहरी पकड़ का परिचय मिलता है । पर इनकी चिंता का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र है'नारी जीवन' उन्होंने 'श्रृंखला की कड़ियाँ' से आरम्भ कर 'नए दशक में महिलाओं का स्थान' तक आधुनिक समाज में नारी जीवन के अनेक पक्षों और समस्याओं पर विचार किया है । कविताओं की वेदना-विगलित आत्मस्थ विरहिणी, यहाँ स्त्री के अधिकारों, घर और बाहर के जीवन में उसकी भूमिका, उसके अर्थ-स्वातंत्र्य, हिन्दू पत्नी की दृष्टि से उसकी हैसियत जैसे नाजुक विषयों पर जितनी बेबाक और मुखर पैरोकार के रूप में सामने आती है, वह आज किसी भी 'नारीवादी' के लिए स्पर्धा का विषय हो सकता हैउनका साहित्य-चिंतन बड़ी सफलता से उस 'मिथ' को तोड़ता है, जिसके कारण लम्बे समय तक छायावादी लेखन को पलायनवाद और वायवीपन के आक्षेप को झेलना पड़ा। महादेवी ने अपने काव्य-संग्रहों की भूमिकाओं में, व्यापाक परिप्रेक्ष्य में छायावादी भाव-बोध और रचना दृष्टि का विस्तृत-विवेचन करते हुए उसका अपना पक्ष प्रस्तुत किया 

संपादक के संदर्भ में.......
निर्मला जैन का जन्म 1932 दिल्ली में हुआ। इन्होंने एम.ए., पी.एच. डी., डी. लिट की उपाधि दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की 1956 से 1970, स्थानीय लेडी श्रीराम कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष । 1970-81, दिल्ली विश्वविद्यालय ( दक्षिण परिसर) हिन्दी विभाग में रीडर । 1981-84, तक हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष। 1984-96 तक प्रभारी प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय ( दक्षिण परिसर ) 1962 से अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना, अनुवाद और संपादन में  संलग्न ।  
  




Wednesday, 30 May 2012

सम्पूर्ण नौ खण्डों में (महासमर भव्य संस्करण) 




Book : Mahasamar( Total Nine Parts) 
Author  : Narendra Kohli
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `5400(HB)  
Total Pages : 3325
Size (Inches) : 6.50X9.75

Category  : Novel/A Story of Mahabharat


सुप्रसिद्ध कथाकार नरेंद्र कोहली ने महाभारत की घटनाओं को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण बंधन वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के लगभग 25 वर्ष होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है । इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष  2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । 
महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध, आनुषंगिक) प्रकाशित हैं ।


सम्पूर्ण नौ खण्डों का मूल्य : 5400 रूपये है और प्रत्येक खंड का मूल्य 600 रुपये
            
महासमर-बंधन (खंड एक)
ISBN  : 81-7055-142-0
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-अधिकार (खंड दो)
ISBN : 81-7055-198-6
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-कर्म ( खंड तीन)
ISBN :  81-7055-229-X
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-धर्म (खंड चार)
ISBN :  81-7055-300-8
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-अंतराल(खंड पाँच)
ISBN :  81-7055-399-7
मूल्य : 600 रुपये 
 महासमर-प्रच्छन्न(खंड छह)
ISBN : 81-7055-512-4
मूल्य : 600 रुपये 
 महासमर-प्रत्यक्ष(खंड-सात)
ISBN :  978-81-8143-940-6
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-निर्बन्ध(खंड-आठ)
ISBN :  978-81-8143-930-7
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-आनुषंगिक(खंड नौ)
ISBN   :  81-7055-264-8
मूल्य : 600 रुपये 





डॉ.गोपाल राय के शब्दों में लेखक और पुस्तक के सन्दर्भ में ...
"नरेंद्र कोहली अपने समकालीन साहित्यकारों से पर्याप्त भिन्न हैं  । उन्होंने प्रख्यात कथाएं लिखी हैं वे  सर्वथा  मौलिक हैं । वे आधुनिक हैं, किन्तु पश्चिम का अनुकरण नहीं करते । भारतीयता की जड़ों तक पहुँचते हैं, किन्तु पुरातनपंथी नहीं हैं । नरेन्द्र कोहली ने महाभारत को महासमर के रूप में अपने युग में पूर्णत: जीवंत कर दिया है । इस उपन्यास में उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्ण विराटता के साथ अत्यंत मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया है । जीवन के वास्तविक रूप से संबंधित प्रश्नों का समाधान वे अनुभूति और तर्क के आधार पर देते हैं । इस कृति में आप महाभारत पढ़ने बैठेंगे और अपना जीवन पढ़ कर उठेंगे । प्रसिद्ध रूसी भाषाशास्त्री तातियाना ओरांस्काया इसकी तुलना लेव ताल्स्ताय के उपन्यास 'युद्ध और शांति' से करती हैं । 'महासमर' की कथा मनुष्य के उस अनवरत युद्ध की कथा है, जो उसे अपने बाहरी और भीतरी शत्रुओं के साथ निरंतर करना पड़ता है । संसार में चारों ओर लोभ और स्वार्थ की शक्तियाँ संघर्षरत हैं । बाहर से अधिक उसे अपनों से लड़ना पड़ता है । लोभ ,त्रास और स्वार्थ के विरुद्ध धर्म के इस सात्विक युद्ध को नरेंद्र कोहली एक आधुनिक और मौलिक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं ।" 


प्रत्येक खंड के बारे में संक्षिप्त परिचय ...
महासमर-बंधन (खंड एक)
'बंधन' शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के मनोविज्ञान तथा जीवन-मूल्यों की कथा है  । घटनाओं की दृष्टि से यह सत्यवती के हस्तिनापुर में आने तथा हस्तिनापुर से चले जाने के मध्य की अवधि की कथा है, जिसमें जीवन के उच्च आध्यात्मिक मूल्य जीवन की निम्नता और भौतिकता के सम्मुख असमर्थ होते प्रतीत होते हैं और हस्तिनापुर का जीवन महाभारत के युद्ध की दिशा ग्रहण करने लगता है  महासमर-बंधन (खंड एक) स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि  किस प्रकार शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के कर्म-बन्धनों से हस्तिनापुर बँध चुका है और भीष्म भी उससे मुक्त होने की स्थिति में नहीं थे

महासमर-अधिकार (खंड दो)
'अधिकार' की कहानी हस्तिनापुर में पांडवों के शैशव से आरम्भ हो कर वारणावत के अग्निकांड पर जा कर समाप्त होती है वस्तुत: यह खंड अधिकारों की व्याख्या, अधिकारों के लिए हस्तिनापुर में निरंतर होने वाले षड्यंत्र, अधिकार को प्राप्त करने की तैयारी तथा संघर्ष की कथा है

महासमर-कर्म ( खंड तीन)
'कर्म' की  कथा युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के पश्चात की कथा है इस राज्याभिषेक के पीछे मथुरा की यादव शक्ति है वारणावत से जीवित बच कर पांडव पांचालों की राजधानी काम्पिल्य पहुँचाने की योजना इस कथा खंड का महत्त्वपूर्ण पक्ष है  ।


महासमर-धर्म (खंड चार)

इस खंड में बताया गया है कि पांडवों को राज्य के रूप में खाण्डवप्रस्थ मिला, जहाँ न कृषि है, न व्यापारसम्पूर्ण क्षेत्र में अराजकता फैली हुई है  इस  खंड में  उस युग के चरित्रों  तथा उनके धर्म का विश्लेषण भी किया गया है अर्जुन और कृष्ण ने अग्नि के साथ मिलकर खांडववन को नष्ट कर डाला क्या यह धर्म था? जरासन्ध जैसा पराक्रमी राजा भीम के हाथों कैसे मारा गया और उसका पुत्र क्यों खड़ा देखता रहा ?  अंत में हस्तिनापुर में होने वाली द्यूत-सभा ।  धर्मराज होते हुए भी क्यों युधिष्ठिर द्यूत में सम्मिलित हुए ?


महासमर-अंतराल (खंड पाँच)
इस खंड में द्यूत में हारने के पश्चात् पांडवों के वनवास की कथा है कुंती, पाण्डु के साथ शत-श्रृंग पर वनवास करने गई थी लाक्षागृह के जलने पर, वह अपने पुत्रों के साथ हिडिम्ब वन में भी रही थी महाभारत की कथा के अंतिम चरण में, उसने धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुर के साथ भी वनवास किया था किन्तु अपने पुत्रों के विकट कष्ट के इन दिनों में वह उनके साथ वन में नहीं गयी वह न द्वारका गयी, न भोजपुर वह हस्तिनापुर में विदुर के घर पर क्यों रही ? इस प्रकार अनेक प्रश्नों के उत्तर निर्दोष तर्कों के आधार पर अंतराल में प्रस्तुत किये हैं
महासमर-प्रच्छन्न (खंड छह)
पांडवों का अज्ञातवास, महाभारत-कथा का एक बहुत आकर्षक स्थल है दुर्योधन की गृध्र दृष्टि से पांडव कैसे छिपे रह सके ? अपने अज्ञातवास के लिए पांडवों ने विराटनगर को ही क्यों चुना पांडवों के शत्रुओं में प्रछन्न मित्र कहाँ थे और मित्रों में प्रच्छन्न शत्रु कहाँ पनप रहे थे ? ऐसे ही अनेक पश्नों को समेटकर आगे बढती है, महासमर के इस छठे खंड प्रच्छन्न की कथा


महासमर-प्रत्यक्ष (खंड सात)
इसमें युद्ध के उद्योग और फिर युद्ध के प्रथम चरण अर्थात भीष्म पर्व की कथा है कथा तो यही है कि पांडवों ने अपने सारे मित्रों से सहायता माँगी कृष्ण से भी इस खंड में कुंती और कर्ण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ है और कुंती ने प्रत्यक्ष किया है कर्ण की महानता को ।   बताया है उसे कि वह क्या कर रहा है, क्या करता रहा है ।   बहुत कुछ प्रत्यक्ष हुआ है, महासमर के इस सातवें खंड प्रत्यक्ष में । 


महासमर-निर्बन्ध (खंड आठ)
निर्बन्ध, महासमर का आठवाँ खंड है इसकी कथा द्रोण पर्व से आरम्भ होकर शांति पर्व तक चलती है कथा का अधिकांश भाग तो युद्धक्षेत्र में से होकर ही अपनी यात्रा करता है किन्तु यह युद्ध केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं है यह टकराहट मूल्यों और सिद्धान्तों की भी है और प्रकृति और प्रवृत्तियों की भी  ।  इस खंड में पांडवों के लिए माया का बंधन टूट गया है वे खुली आँखों से इस जीवन और सृष्टि का वास्तविक रूप देख सकते हैं अब वे उस मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहाँ वे स्वर्गारोहण भी कर सकते हैं और संसारारोहण भी । 


महासमर-आनुषंगिक (खंड नौ)
महासमर का यह नवम और विशेष खंड है।  इसे आनुषंगिक कहा गया, क्योंकि इसमें महासमर की कथा नहीं,  उस कथा को समझने के सूत्र हैं ।   हम इसे महासमर का नेपथ्य भी कह सकते हैं यह सामग्री पहले 'जहाँ है धर्म, वहीँ है जय' के रूप में प्रकाशित हुई थी अनेक विद्वानों ने इसे महासमर की भूमिका के विषय में देखा है अत: इसे महासमर के रूप में ही प्रकाशित किया गया है  ।  प्रश्न महाभारत की प्रासंगिकता का भी है अत: उक्त विषय पर लिखा गया यह निबंध, जो ओस्लो (नार्वे में मार्च 2008 की एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया था, इस खंड में इस आशा से सम्मिलित कर दिया गया है, कि पाठक इसके माध्यम से 'महासमर' को ही नहीं ' 'महाभारत' को भी सघन रूप से ग्रहण कर पाएंगे । 


लेखक के संदर्भ में....

नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970  में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में । बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन ।  1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है। इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष  2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं । महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है।जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये। इसी महासमर के अंतर्गततीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं ।


28  अप्रैल 2012 , नवभारत टाइम्स में नरेन्द्र कोहली 



Saturday, 26 May 2012

साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा




वरिष्ठ लेखक जवरीमल्ल पारख द्वारा लिखित पुस्तक, 'साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा' 



वाणी प्रकाशन की वेबसाइट से इस पुस्तक की जानकारी के लिए इस लिंक पर जाए http://vaniprakashan.in/Sajha_Sanskriti,Sampradayik_Aatankvaad_Aur_Hindi_Cinema%28HB%29-p/1266.html

Book : Sajha Sanskriti, Sampradayik Aatankvaad 
            Aur Hindi Cinema 
Author  : Javrimal Parakh
Publisher : Vani Prakashan 
Price : 
`450(HB)  
ISBN : 978-93-5000-946-8
Total Pages : 271
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Cinema 


पुस्तक के सन्दर्भ में .........
हम जब किसी धार्मिक समुदाय की बात करते हैं, तो इस बात को भूल जाते हैं कि वह समुदाय एक आयामी नहीं होता  ।  उसमें  भी वे सभी भेद- विभेद होते हैं  जो दूसरे धार्मिक समुदायों में होते हैं  । एक अभिजात मुसलमान और एक गरीब मुसलमान का धर्म भले ही एक हो ,लेकिन उनके हित एक से नहीं होते । यदि ऐसा होता तो ('मुगले आज़म' फ़िल्म के सन्दर्भ में ) अकबर सलीम की शादी ख़ुशी-ख़ुशी अनारकली से कर देता,क्योंकि सलीम और अनारकली का धर्म तो एक ही था  दूसरा पहलू देखें  तो यदि सलीम किसी राजपूत स्त्री से विवाह करना चाहता तो क्या अकबर एतराज़  करता ? नहीं , इतिहास हमें बताता है मुग़ल और राजपूत दोनों का धर्म अलग जरुर था,लेकिन दोनों का सम्बन्ध अभिजात वर्ग से था  यह विचार का विषय है कि 1947 से पहले और 1947 के बाद भी लगभग दो दशकों तक मुसलमान समुदाय पर जो भी फ़िल्में बनीं, वे प्राय: अभिजात वर्ग का प्रस्तुतीकरण करती थीं  इन फ़िल्मों की साथर्कता सिर्फ इतनी  थी कि इनके माध्यम से सामंती पतनशीलता को मध्ययुगीन आदर्शवादिता से ढंकने की कोशिश जरुर दिखती थी । इन फ़िल्मों  के माध्यम से मुसलमान की एक खास तरह की छवि निर्मित की गयी जो उन करोड़ों  मुसलमान से मेल नहीं खाती थी,जो हिन्दुओं  की तरह खेतों और कारखानों में काम करते थे , दफ्तरों में क्लर्की करते थे या स्कूलों -कॉलेजों में पढ़ते थे  जो  न तो बड़ी -बड़ी हवेलियों में रहते थे , न खालिस उर्दू बोल पाते थे और न ही शेरो शायरी कर पाते थे  इन ढहते सामंती वर्ग के यथार्थ को पहली बार सही परिप्रेक्ष्य में ख्वाजा अहमद अब्बासी  ने 'आसमान महल ' (1965) के माध्यम से पेश किया था ।  लेकिन इस फ़िल्म  को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल सका । इसके बाद ' गरम हवा ' (1973) ने बताया कि  मुसलमान भी वैसे ही होते हैं जैसे हिन्दू ।  इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा ।  राजेंद्र सिंह  बेदी ( दस्तक ),सईद अख्तर मिर्ज़ा ( सलीम लंगड़े  पे मत रो, नसीम ), श्याम बेनेगल ( मम्मो ,हरी -भरी ), मनमोहन देसाई ( कुली ), शमित अमीन ( चक दे इंडिया ) और कबीर खान (न्यूयार्क ), करण जौहर ( माई नेम इज़  खान ) और  कई अन्य फ़िल्मकारों ने उन आम मुसलमानों को अपना पात्र बनाया जिन्हें कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है 


लेखक के सन्दर्भ में.....
जवरीमल्ल पारख का जन्म 1952 में जोधपुर , राजस्थान में हुआ था  । इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय से 1973 में  बी.ए. आनर्स और 1975 में एम.ए . हिंदी प्रथम श्रेणी से उतीर्ण  करने के बाद , प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में 'नयी कविता का अंत:संघर्ष'  विषय पर पीएच.डी.की उपाधि  सन 1984, में जवाहर लाल नेहरु  विश्वविद्यालय नयी दिल्ली से प्राप्त की । 1975 से 1987 तक  रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय में व्याख्याता रहे ,1987 से 1989 तक इंदिरा गाँधी  राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय  नयी दिल्ली में व्याख्याता रहे । 1989 से 1998 तक रीडर और 1998  से प्रोफेसर , 2004 से 2007  तक मानविकी विद्यापीठ  के निर्देशक पद पर कार्य किया 
सम्प्रति :-  इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर पद पर कार्यरत 
सिनेमा सम्बन्धी पुस्तकें : हिंदी  सिनेमा का समाजशास्त्र, लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ । साहित्य सम्बन्धी पुस्तकें- आधुनिक हिंदी साहित्य : मूल्यांकन और पुनमुल्यांकन, संस्कृति और समीक्षा के सवाल, नयी कविता का वैचारिक परिप्रेक्ष्य।  


मीडिया रिपोर्ट्स

दैनिक भास्कर 26 मई 2012 शनिवार की प्रकाशित समीक्षा 
http://epaper.bhaskar.com/detail.php?id=146184&boxid=52625520937&ch=cph&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05%2F26%2F2012&editioncode=194&pageno=7&view=image

रविवार 17 जून 2012 प्रभात खबर में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा http://epaper.prabhatkhabar.com/epapermain.aspx?pppp=8&queryed=11&eddate=6/17/2012%2012:00:00%20AM



सपनों की मंडी






नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया द्वारा मीडिया फेलोशिप के तहत शोध व य़ू.एन.-एफ .पी .ए.-लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित कृति 'सपनों की मंडी' । रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार से पुरस्कृत पत्रकार,लेखिका गीताश्री ने मानव तस्करी की वास्तविकता को पेश किया है । प्रस्तुत है 'सपनों की मंडी' का दैनिक भास्कर में, शनिवार 26 मई 2012 की प्रकशित समीक्षा । आप इस लिंक के माध्यम से यह समीक्षा पढ़ सकते हैं  ।  

http://epaper.bhaskar.com/detail.php?id=146184&boxid=52625520781&ch=cph&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05%2F26%2F2012&editioncode=194&pageno=7&view=image


इस लिंक के मध्यम से आप वाणी प्रकाशन की वेबसाइट से पुस्तक की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । http://vaniprakashan.in 


प्रस्तुत है 'सपनों की मंडी' के लोकार्पण पर कवरेज करती मीडिया की रिपोर्ट।





Book : Sapanon Ki Mandi
Author  : Geetashri
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `200(HB)  
ISBN : 978-93-5072-161-2
Total Pages : 148
Size (Inches) : 
5.75X8.75
Category  : Feminism/Social Science


पुस्तक के सन्दर्भ में.........
हिन्दी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर-साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, जो हुआ है, उसमें विषय विशेष की सूक्ष्मता से पड़ताल नहीं की गयी है । सपनों की मंडी के माध्यम से लेखिका गीताश्री  ने तकरीबन एक दशक तक शोध एवं  यात्राओं और उनके अनुभवों के आधार पर मानव तस्करी के कारोबार पर यह किताब लिखी है । इस किताब में ख़ास तौर पर आदिवासी समुदाय की लड़कियों की तस्करी, उनके शोषण और नारकीय जीवन का खुलासा किया है । किताब में कई चौंका देने वाले तथ्यों से पाठक रूबरू होते हैं  । लेखिका ने सभ्य समाज और आदिवासी समाज के बीच जो अंतर है उसकी एक समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या की है । किताब में जिंदगी के उस अंधेरे हिस्से की कहानी है, जिसमें एक बाज़ार होता है  ।  कुछ खरीददार होते हैं ।  कुछ बेचने वाले होते हैं और फिर मासूम लड़कियों का सौदा ।  लेखिका कहती हैं कि ताज्जुब तो तब होता है जब बेचने वाला कोई सगा निकलता है ।  लेखिका स्पष्ट तौर पर कहना चाहती हैं  की, सपनों की मंडी में मासूम लड़कियों के सपनों के सौदे की  कहानी है । सपनों की कब्र से उठती हुई उनकी चीखें हैं ।


पुस्तक बताती है, क्या है ट्रैफिकिंग ? 
ट्रैफिकिंग का आशय बहला-फुसलाकर या जबरन, महिलाओं  या किशोरियों का आगमन, जिसमें उनका विभिन्न स्तरों पर शोषण किया जाता है । उनसे जबरन मज़दूरी और वेश्यावृत्ति करना । इसमें उन्हें किसी भी रूप में खरीदना, बेचना और एक स्थान से दूसरे स्थान पर उनकी इच्छा के विरुध्द ले जाना शामिल है ।



यूएन की रिपोर्ट ?

सन 2007 में पेश संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों को पंजाब और हरियाणा में बेचने का चलन बढ़ा है । बिकने के बाद वहां बेटा पैदा करने तक उनका यौन शोषण किया जाता है ।  यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट फंड द्वारा तैयार की गयी ' हयूमन ट्रैफिकिंग एक्सप्लोरिंग वलनेरबिलिटीज एंड रिसपोंसेज इन साउथ एशिया' नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर लिंगानुपात वाले गरीब जिलों से कम लिंगानुपात वाले अमीर राज्यों में लड़कियों की मानव तस्करी होती है ।


लेखिका के सन्दर्भ में.....
गीताश्री का जन्म मुजफ्फरपुर ( बिहार ) में हुआ । सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पत्रकार ( वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं । सम्प्रति : आउटलुक (हिन्दी ) दिल्ली में सहायक संपादक 











Friday, 25 May 2012

अवधी ग्रन्थावली (सम्पूर्ण सात खण्डों में )



 
अवधी ग्रन्थावली के लगभग चार हजार पृष्ठों में समग्र अवधी साहित्य की पड़ताल है यानी हिन्दी की आधारभूत बोली अवधी के संरक्षण-संवर्द्धन का अनूठा और प्रथम प्रयास है  । अवध के क्षेत्र-विस्तार की अवधारणा समय-समय पर परिवर्तित होती रही है । ब्रिटिश शासनकाल में 'यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ ऑफ़ आगरा एंड अवध' और स्वतंत्र भारत में 'संयुक्त प्रान्त' के नवीन नाम 'उत्तर प्रदेश' के अंग-रूप में अवध-क्षेत्र में चौदह जिले आते हैं, फैज़ाबाद, अम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव, खीरी, लखीमपुर, सीतापुर, हरदोई, गोंडा और बहराइच । इस प्रकार अवध-क्षेत्र पूर्व में बनारस से ले कर पश्चिम में बरेली तक और उत्तर में नेपाल के सीमा-क्षेत्र से दक्षिण में इलाहाबाद तक फैला हुआ है। 

Book : Awadhi Granthawali ( Total Seven Parts)
Edited By : Jagdeesh peeyush
Publisher : Vani Prakashan 
Price  : ` 7000
Total Pages :  3165
Size( Inches) :  10 X 6.25
Category : (Granthawali)
    
Awadhi Granthawali-1
 ISBN 978-81-8143-900-0
Awadhi Granthawali-2
 ISBN 978-81-8143-902-4
Awadhi Granthawali-3
 ISBN  978-81-8143-903-1
Awadhi Granthawali-4
 ISBN 978-81-8143-904-8
Awadhi Granthawali-5
 ISBN  978-81-8143-905-5
Awadhi Granthawali-6
 ISBN  978-93-5000-147-9
Awadhi Granthawali-7
  ISBN  978-93-5000-150-9

Note:- Parts  Awadhi Granthawali 1-5 ( An Anthology of Awadhi traditional and modern literature) and Part-6 ( An Anthology of Awadhi traditional and Lokokti Khand) and Part -7 ( An Anthology of Awadhi traditional and Awadhi Dictionary)

 (खण्ड एक  : लोक साहित्य-खण्ड)
(खण्ड दो : लोक गाथा-खण्ड)
(खण्ड तीन: प्राचीन साहित्य-खण्ड)
(खण्ड चार:आधुनिक साहित्य-खंड)
(खण्ड पाँच:लोक कथा/गद्य खण्ड)
( खण्ड छह :शब्दकोश )
(खण्ड सात : लोकोक्ति खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के सन्दर्भ में....

अवधी ग्रन्थावली(खण्ड एक : लोक साहित्य-खंड)
इस खण्ड में  अवधी के लोक साहित्य पर वृहद् चर्चा की गयी है । लोक साहित्य किसी काल-विशेष का न हो कर युगों से चला आता हुआ, वह साहित्य है जो हमें जन-जीवन के बीच प्राय: मौखिक रूप से ही प्राप्त होता है । ऐसे साहित्य में हमारे समाज के लिए व्यापक सामग्री प्राप्त होती है । मनुष्य कठिन परिश्रम के बाद थोड़ा सा समय अपने मनोरंजन के लिए चाहता है । इसके लिए वह गीत गा कर, कथा सुन कर प्राप्त करता है । क्योंकि ' लोक-साहित्य' मानव के सम्पूर्ण रीति-रिवाज, आचार-विचार और उसके व्यवहार का स्वरूप है जो किसी प्रकार के बन्धन से जकड़ा हुआ नहीं होता । संस्कार-गीतों, श्रम-गीतों, त्योहार-गीतों, जातीय-गीतों, ऋतुओं-गीतों, गाथाओं आदि की विपुल सम्पदा अवधी के पास है ।
    
अवधी ग्रन्थावली (खण्ड दो : लोक गाथा-खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के इस खण्ड में  अवधी की पैंतीस गाथाओं को पहली बार एक साथ संगृहित किया गया है ।
लोकगाथा वस्तुत: मानव समाज का आदिम साहित्यिक रूप है । ऋग्वेद के कुछ संवाद सूक्तों और बारामासी गाथाओं को प्राचीनतम लोकगाथा माना जा सकता है । भारत की विभिन्न भाषाओं में जो लोकगीत पाए जाते हैं, उन्हें दो भागों में विभक्त किया जा सकता है  । पहले प्रकार के वे गीत हैं जो आकार में छोटे होते हैं, जिसमें कथानक का अभाव होता है और जिनकी प्रधान विशेषता उनकी गेयता है । दूसरे प्रकार के वे गीत हैं, जो आकार में बड़े हैं, जिनमें कथानक की प्रधानता के साथ गेयता भी है । काव्य की भाषा में इन्हें मुक्तक और प्रबंध कहा गया है । मजनूँ, भरथरी, गोपीचंद, सोरठी आदि के गीत द्वितीय श्रेणी में रखे जा सकते हैं ।

अवधी ग्रन्थावली (खण्ड तीन : प्राचीन साहित्य-खण्ड)
अवधी का साहित्यिक अवदान गुरु गोरखनाथ की कुछ बानियों, अमीर खुसरो की पहेलियों से चल कर संतों के साहित्य में प्रचुरता से मुखरित हुआ है । कुतबन, मंझन, मुल्ला दाऊद के साथ ही कबीर ने अपनी पूर्वी बोली पर गर्व किया है । जायसी, तुलसी और आधुनिक कवियों ने अवधी के साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया है । इसी समृद्धि की एक विस्तृत झलक इस खण्ड में प्रस्तुत की गयी है।

अवधी  ग्रन्थावली (खण्ड चार : आधुनिक साहित्य-खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के इस खण्ड में आधुनिक काल के अवधी कवियों की रचनाएँ पेश की गयी हैं । इस खण्ड में अवधी के प्रमुख और प्रतिनिधि कवियों की रचनाएँ दी गयी हैं । इनमें जो नाम शामिल हैं वे हैं, बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढीस, वंशीधर शुक्ल, रमई काका, गुरुभक्त सिंह मृगेश, द्वारका प्रसाद मिश्र, त्रिलोचन शास्त्री, पारस भ्रमर, विकल गोंडवी, आद्याप्रसाद उन्मत्त,  जुमई खां आज़ाद, विकल सकेती, श्रीपाल सिंह क्षेम, निशंक जी, रूपनारायण त्रिपाठी, हरिश्चंद पाण्डेय 'सरल', बरखा रानी, डॉ.श्याम तिवारी, डॉ ब्रजेन्द्र अवस्थी, डॉ. श्याम सुंदर मिश्र मधुप, सत्यधर शुक्ल, लवकुश दीक्षित,राम अकबाल त्रिपाठी अनजान, अरविन्द द्विवेदी, सतीश आर्य, अशोक टाटम्बरी, आद्या प्रसाद प्रदीप, मनोज जी, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत, कमल नयन पाण्डेय, रफीक सदानी, डॉ. राधा पाण्डेय, विद्याविन्दु सिंह, दूधनाथ शर्मा श्रीष, ओंकार उपाध्याय, सच्चिदानंद तिवारी शलभ, ब्रजेन्द्र खरे, नागेन्द्र अनुज, सुनील प्रभाकर, दीपक रूहानी,निर्झर प्रतापगढ़ी, कवि अमरेश, कुसुम द्विवेदी, अर्चना शुक्ल, कृष्णकांत एकलव्य, ब्रजनाथ, शोभनाथ अनाड़ी, विजय बहादुर सिंह, अक्खड़, जगदीश नीरद, लताश्री, व्यंजना शुक्ला, मोहनचंद्र त्रिपाठी, ताराचंद तन्हा, अनुराग आग्नेय, ब्रह्मसिंह चौहान, उमेश चौहान, डॉ.सियाराम, आनंद प्रकाश अवस्थी नन्हे भैया, दिनेश सिंह, जगदीश पीयूष, डॉ. सुनील सिध्दार्थ, भारतेंदु मिश्र  ।
कवियों के गीतों के साथ-साथ गज़लें भी शामिल हैं, जिससे पता चलता है कि  अवधी अपने को लगातार नया करती रही है ।
       
अवधी ग्रन्थावली ( खण्ड पाँच : लोक-कथा/गद्य खण्ड) 
लोककथाएँ क्या हैं ? कहाँ से आयीं इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत जटिल है ।  इसकी परिभाषा के रूप में हम कह सकते हैं कि ये कथाएँ मानव के भोले-भाले सरल उदगार हैं, इनमें लोक-जीवन का व्यापक चित्र उदघाटित होता है । लोककथाएँ लोकमानस की मर्मस्पर्शी  अभिव्यक्तियाँ हैं। लोककथाएँ लोक मानस  के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का संस्पर्श करती हुई उसके जीवनानुभवों की सम्यक व्याख्या करती हैं, लोकमानस के आचार-विचार,  खान-पान, रीति-रिवाज, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का स्पष्ट प्रतिबिम्ब लोक कथाओं में प्रतिबिम्बित होता है ।

अवधी ग्रन्थावली(खण्ड छह : शब्दकोश)
हिन्दी में शब्दकोशों की परम्परा एक हजार वर्ष पुरानी है । विशेष महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दी का पहला शब्दकोश बनाम व्याकरण ग्रन्थ-दामोदर पंडित का 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' मूलत: अवधी में लिखा गया था । शब्दकोश-निर्माण के लिए एक विशिष्ट प्रविधि अपनायी गयी है । क्योंकि शब्दों की कई कोटियाँ होती हैं, जैसे- तत्सम, तद्भव, देशज और आयातित इसलिए इन चारों स्रोतों को सबसे पहले भली-भाँति खंगाला गया है । शब्द-संग्रह के लिए एक ओर प्रकाशित साहित्य के  उपयोग के साथ भाषा- भाषियों का सर्वेक्षण भी किया गया है ।

अवधी ग्रन्थावली (खण्ड सात : लोकोक्ति खण्ड)
अवधी लोकजीवन में लोकोक्तियाँ उस उद्यान की तरह विद्यमान हैं, जहाँ चमत्कार का प्रकाश है, स्वाभाविकता की हरीतिमा है और आडम्बरहीनता का गौरव है । वहाँ न ठगई का भय है, न कल्पना की भूलभुलैया ।लोकोक्तियाँ अवधी किसानों, ग्रामीणों एवं सभ्यता-संस्कृति के प्रसाद से वंचित लोगों की वह वाणी है, जिसका सहारा पाये बिना कवि की प्रतिभा कुंठित रह जाती है ।
इसमें शब्द-योजना है, सलंकारता  है और एक विशेष प्रकार की लावण्यता एवं चटपटापन । लोकोक्तियों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है मानव जीवन में कोई ऐसी गतिविधि नहीं जो इसके चक्र से बाहर हो, क्योंकि इनमें दुःख-सुख, हर्ष-विषाद, रुचि-अरुचि, ग्लानि-प्रमाद आदि सभी कुछ जन-जीवन का सन्निहित होता है । आचार-विचार, रीति-रिवाज इत्यादि का ज्ञान-विज्ञान अपने यथार्थ रूप में दृष्टिगत हो जाता है। लोकोक्ति-साहित्य संभवत: उतना ही पुराना है जितनी मानव-भाषा । लिखित साहित्य के प्रादुर्भाव से पूर्व ही लोकोक्तियों का जन्म हो चुका था ।

संपादक के सन्दर्भ में ......
जगदीश पीयूष
'तथागत' और 'सुयोधन' नामक हिन्दी खंड काव्य और 'पानी पर हिमालय' जैसी कालजयी कृतियों के रचनाकार जगदीश पीयूष का जन्म 6 अगस्त 1950 को अमेठी में हुआ । वहीँ पर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की । अवधी बोली भाषा के प्रति 35 वर्षों से रचनात्मक सक्रियता । अवधी और लोक साहित्य से संदर्भित अनेक पुस्तकें । अवधी कविताओं के संग्रह 'अँधेरे के हाथ बटेर' पर उ.प्र. हिन्दी संस्थान का जायसी सम्मान । साहित्य सेवा के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । अवधी अध्ययन का द्वार खोलने वाली पुस्तक 'अवधी साहित्य :सर्वेक्षण और समीक्षा' भारतीय व विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में स्वीकृत । आठवें विश्व हिन्दी सम्मलेन   (न्यूयॉर्क, अमेरिका) के अवसर पर विश्व हिन्दी सम्मान से सम्मानित ।

पुस्तक : अवधी ग्रन्थावली (सम्पूर्ण सात खण्डों में ) विशेष सहयोगी
प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित के संदर्भ में ..
लखनऊ विश्वविद्यालय के निवर्तमान हिन्दी विभागाध्यक्ष । प्रो.सूर्यप्रसाद अवधी के विलुप्तप्राय साहित्य को सहेजने में पूरे  मन से सक्रिय रहते हैं ।
डॉ. आद्याप्रसाद सिंह 'प्रदीप' के संदर्भ में ....
गाँव रानपुर पलिया, तहसील कादीपुर सुलतानपुर के निवासी 63 वर्षीय  डॉ. आद्याप्रसाद सिंह 'प्रदीप' पिछले 45 वर्षों से अवधी की सेवा कर रहे हैं ।