Friday, 20 April 2012

शिकंजे का दर्द



बस की अगली सीट पर एक औरत बच्चा लिये हुए बैठी थी । बच्चा लगभग एक बरस का होगा, रो रहा था साथ में एक अधेड़ उम्र की महिला उसके साथ थी अधेड़ महिला शायद उसकी माँ या सास हो महिला का पति बस की दूसरी सीट पर बैठा था । बच्चे को चुप कराने के लिए पति ने बच्चे को लिया पहले अधेड़ महिला ने भी कोशिश की लेकिन बच्चा चुप नहीं हुआ। अगले स्टॉप से बस में एक व्यक्ति चढ़ा । बच्चे को रोता देख कर व्यक्ति ने कहा पानी पिलाओ । बच्चे के पिता ने पानी पिलाया तब बच्चा चुप हो गया । इस बात से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जीवन में अनुभव का एक विशेष महत्त्व है । जिसने जीवन को समझ कर  जिया है वह जीवन की स्पष्ट परिभाषा दे सकता है । इसी प्रकार अनुभवों पर आधारित 'शिकंजे का दर्द' प्रस्तुत है जिसमें लेखिका सुशीला टाकभौरे ने अपनी जीवनी के माध्यम से दलित और शोषित समाज को एक समाजशास्त्रीय ढंग से वर्णित किया है लेखिका कहती है कि 'शिकंजे का दर्द' लिखने का उद्देश्य दर्द देने वाले शिकंजे को  तोड़ने का प्रयास है  

Book : Shikanje Ka Dard

Author : Sushila Takbhaure
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 495(HB)
ISBN : 978-93-5000-719-8
Total Pages :  304
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Autobiography

पुस्तक के संदर्भ में....
 
दुनिया एक कैदखाना है, ऐसा कैदखाना जिसे ईश्वर ने बनाया है इसमें एक मानव निर्मित कैदखाना भी है, जिसे इन्सान ने बनाया हैमानव निर्मित कैदखाने से निकलना तो आसान है, लेकिन ईश्वर द्वारा निर्मित कैदखाने से बाहर आना इतना आसान नहीं पुस्तक 'शिकंजे का दर्द' शिकंजा यानी पंजा, जिसकी जकड़न में रहकर कुछ कर पाना कठिन हो शिकंजा यानी कठघरा जिसमें कैद होकर उसके बाहर जाना कठिन होशब्दकोश में दिए अर्थ के अनुसार शिकंजे का अर्थ दबाने, कसने का यंत्र है शिकंजे का अर्थ एक प्रकार का प्राचीन यंत्र है जिसमें अपराधी की टाँग कस दी जाती है । शिकंजा वह यंत्र है जिसमें धुनकने के पहले रुई को कसा जाता है । शिकंजे का अर्थ कोल्हू भी है । जिस तरह किसी ताकतवर को शिकंजे में जकड़कर उसकी पूरी ताकत को नगण्य बना दिया जाता है, उसी तरह लेखिका को भी सामाजिक जीवन की मनुवादी विषमता ने, वर्णवादी-जातिवादी समाज व्यवस्था ने शिकंजे में जकड़कर रखा, जिसका परिणाम पीड़ा-दर्द, छटपटाहट के सिवा कुछ नहीं है
सदियों के मूक मानव अब बोलने लगे हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे हैं, प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपनी व्यथा-कथा लिखने लगे हैं । प्रश्न है क्या प्रत्येक दलित पीड़ित को उसके मानवाधिकार मिल रहे हैं  ? क्या दलित शोषण की घटनाएँ रुकी हैं ? विषमतावादी भारतीय समाज में जातिभेद, ऊँच-नीच की भावनाएँ क्या अब नहीं हैं ? 'शिकंजे का दर्द' में संताप है दलित होने का, स्त्री होने का। इसमें शोषित, पीड़ित, अपमानित, अभावग्रस्त दलित जीवन की व्यथा है । स्त्री होना ही जैसे व्यथा की बात है । चाहे हमारा देश हो या विश्व के अन्य देश, हर जगह शोषण, उत्पीड़न का शिकार स्त्री ही रही है । जिस देश में वर्णभेद, जातिभेद की कलुषित परम्पराएँ हैं, वहाँ दलित स्त्री  शोषण की व्यथा और भी गहरी हो जाती है । सदियों से तिरस्कृत और अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर किये गये दलित जीवन की व्यथा-कथा का दर्द ' शिकंजे का दर्द' में समाहित है
 
लेखिका के संदर्भ में ...... 
'म.प्र दलित साहित्य अकादमी विशिष्ट सेवा सम्मान एवं पुरस्कार' और रमणिका फाउंडेशन की ओर से 'सावित्री बाई फुले' सम्मान एवं पुरस्कार से  पुरस्कृत सुशीला टाकभौरे का जन्म 4 मार्च 1954,  बानापुरा ( सिवनी मालवा), होशंगाबाद ( मध्यप्रदेश) में हुआ । एम.ए.   (हिन्दी) पीएच.डी.(अम्बेडकर विचारधारा) में किया  । साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में सृजनात्मक गतिविधियाँ एवं दलित समाज और नारी की स्थिति पर परिवर्तनवादी आन्दोलन में वैचारिक सक्रियता में संलग्न। फिलहाल, सेठ केसरीमल पोरवाल कॉलेज, कामठी (महाराष्ट्र) में अध्यापन