Saturday, 28 April 2012

सन्त वाणी


Book :  Sant Vani (1-5 Volume )
Presentation & Translator :  Dr. P. Jayaraman
Publisher : Vani Prakashan
Size (Inches) :   6.50X9.75
Category  : Ancient Tamil Saint Poetry
S.No.
Book
ISBN
Total Pages
Price
  1.
Sant Vani (Volume-1) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-201-8
356 Pages
` 795
  2.
Sant Vani (Volume-2) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-201-8
252 Pages
` 795
  3.
Sant Vani (Volume-3) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-708-2
363 Pages
` 695
  4.
Sant Vani (Volume-4) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-709-9
216 Pages
` 495
  5.
Sant Vani (Volume-5)Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-979-6
464 Pages
` 750

पुस्तक के सन्दर्भ में......
एक साहित्यिक, धार्मिक और दार्शनिक परियोजना
सन्त वाणी ( संतों की आवाज़)
भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा में भगवान विष्णु के प्रति विशेष समर्पण है विष्णु के प्रति यह समर्पण सम्पूर्ण भारत के प्राचीन काल से खासतौर पर दक्षिण में पाया गया श्रीमद भागवत महात्म्य में साक्षात वर्णन है कि मेरा द्रविड़ भूमि ( दक्षिण भारत ) में जन्म हुआ और कर्नाटक में बढ़ा महाराष्ट्र होते हुए भारत के उत्तर में वृन्दावन पहुँचने पर मैं एक सुन्दर लड़की बन गया (संस्कृत कविता के अंग्रेजी अनुवाद के साथ शुरू उत्पन्न द्राविडे साहां....) लम्बे समय से वैष्णव भक्ति की परम्परा तमिल क्षेत्र में विकसित हुई पांचवीं और नौवीं शताब्दी में 12 वैष्णव संत, कवि और दार्शनिक हुए, जिन्हें आजवारों और आलवार के नाम से जाना जाता है आलवार भगवान विष्णु की भक्ति में डूब जाते हैं, जोकि वह भगवान नारायण के ही अवतार थे
इन बारह संतों में हैं, पोइगाई आलवार, भूताथालवार, पेयालवार, तिरुमाज़िसी आलवार, तिरुमंगाई आलवार, पेरियालवार, आंडाल, तिरुप्पनालवार, तोंदारादिप्पोदी आलवार, कुलशेखर आलवार, नाम्नालवार और मधुरा कवि आलवार
500 वर्षों की अवधि के दौरान इन बारह आलवारों ने 4000 छंद प्राचीन तमिल भाषा में लिखें हैं । जो पूर्णतया भगवान विष्णु के प्रति समर्पित हैं, इनके छंद धार्मिक और दार्शनिकता पर आधारित हैं। आलवार चार जातियों से सम्बन्ध रखते थे और उन्होंने सभी जातियों का वर्णन किया है । उन्होंने समाज में फैली जातियों की समानता और एकता के लिए कार्य किया उस दौरान जितने भी कवि हुए वह भारतीय दार्शनिक परम्पराओं के अनुसार भगवान नारायण पर गहरी आस्था के साथ समर्पित थे । आठवीं शताब्दी में एक महिला संत आंडाल हुईं बाद में बहुत से दार्शनिकों में जैसे नाथमुनि,यामुनाचार्य, रामानुज और वेदान्त देसिका इन्होंने आलवार के अध्यात्म और दार्शनिकता का अनुपालन किया । और भगवान नारायण को पाया । 13वीं से 16वीं शताब्दियों के बीच वैष्णव भक्ति प्रचारित करने में इन विद्वानों और आचार्यों के बाद उत्तर भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परम्पराओं का प्रतिनिधित्व बिम्बरका, वल्लभ, हिताहरि वम्सा और चैतन्य ने किया । 
चैतन्य ने मथुरा और वृन्दावन में व्यापक रूप से आध्यात्मिक, दार्शनिक वैष्णव भक्ति का फैलाव किया इन बारह आलवार के कार्य और संकलन (4000 छंद ईश्वरत्व) के रूप में नालायिर दिव्य प्रबन्धम कहलाये । इसका संकलन वैष्णव आचार्य नाथमुनि ने किया जो 9वीं और 10वीं शताब्दी के मध्य तक जीवित थे । तमिल वेद में यह पुस्तक सुविचारित है और यह पुस्तक संस्कृत वेद से तुलना करने योग्य है । एक और नाम नाम्मालावार उल्लिखित होता है जैसे वेद्म तमिज्ह सेय्था मारण,(जो वेद तमिल वेद में संचारित है) डॉ.जयरामन ने हिन्दी में इन सभी 4000 तमिल छंदों को प्रस्तुत किया है । जिसमें वेद, उपनिषद, भागवद-गीता, विष्णु पुराण और अन्य संस्कृत धर्मग्रन्थों से एक ही समय के संदर्भ में अलवार संतों की वैष्णव भक्ति के विषय में कमेंटरी के साथ व्याख्या की है । जिसमें इन्होंने बताया है कि मध्ययुगीन हिन्दी भक्ति साहित्य (15वीं और 16वीं शताब्दी) और यहाँ तक की प्राचीनतम तमिल साहित्य 6वीं शताब्दी बीसी. से लेकर 2वीं शताब्दी एडी. तक सम्बन्ध रहे हैं । इस विचार के साथ वह सिद्ध करना चाहते हैं कि सम्पूर्ण भारत में उस समय भी सिद्धांत, विचार और भाषा में अंतर था  डॉ. जयरामन के अनुसार इस परियोजना का उद्देश्य जागरूकता फैलाना है कि अखंडित आध्यात्मिक और दार्शनिक, संत और विचारक शताब्दियों से भारत की एकता को बनाये हुए हैं । इसलिए डॉ. जयरामन ने अपनी इस परियोजना को 'संत वाणी' का नाम दिया है, जिसमें तमिल साहित्य और तमिल वेद, वैष्णव संतों की वाणी का वर्णन है यह पूरी श्रृंखला 10 खण्डों में होगी, जिसमें 5 खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं पाठकों के लिए यह खुशी की बात है कि 2013 के अंत तक इस सम्पूर्ण हिन्दी संस्करण के बाद 2014 में इस श्रृंखला का सम्पूर्ण अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध किया जायेगा इससे जो व्यक्ति हिन्दी नहीं जानते हैं वह भी इस श्रृंखला के पहलूयों से वाकिफ हो सकेगें डॉ. जयरामन श्रृंखला के माध्यम से दक्षिण भारत के वैष्णव, भक्ति और तमिल वेद एवं आध्यात्मिक विकास का फैलाव करना चाहते हैं

लेखक के सन्दर्भ में.....
डॉ. पी. जयरामन संस्कृत, हिन्दी एवं तमिल साहित्य के प्रखंड विद्वानों में हैं । इन्होंने एम.ए.(संस्कृत तथा हिन्दी) और पीएच.डी.,डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की है भारतीय संस्कृत तथा साहित्य की एकात्मकता के प्रति समर्पित हो कर वह अठारह वर्ष तक अध्ययनरत रहे । भारतीय रिजर्व बैंक के प्रबंध तंत्र में सोलह वर्ष तक कार्य किया इन्होंने जन-सामान्य के हितों का ध्यान रखते हुए बैंकिंग क्षेत्र में भारतीय भाषाओँ का विशेषकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया । सन 1980 में उन्होंने न्यू यार्क में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की और उनतीस वर्षों से भारतीय संस्कृति, परम्परा, दर्शन, भाषा, साहित्य एवं कलाओं के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं सम्मान : साहित्य वाचस्पति (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग), साहित्य भूषण( उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), हिन्दी भाषा एवं साहित्य की सेवा के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,आगरा द्वारा प्रदत्त सम्मान (2006), भारत सरकार द्वारा प्रवासी भारतीय सम्मान,2007 और 2009 में पद्मश्री

Friday, 27 April 2012

फिलस्तीन और अरब-इस्रायल संघर्ष



BOOK : PHILASTIN AUR ARAB-ISRAEL SANGHARSH
AUTHOR:  MAHENDRA MISRA
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 450 (HB)
ISBN : 978-93-5000-783-9
Total Pages :  248
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : HISTORY

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

फिलस्तीन की समस्या और अरब-इस्रायल संघर्ष मध्यपूर्व की एक अनसुलझी समस्या है । इसके मूल में है साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से इसका विभाजन और वहाँ यहूदियों के लिए धर्म और जाति पर आधारित एक सियोनवादी राष्ट्र की स्थापना इस्रायल आज अरब जगत में पश्चिम के नव साम्राज्यवाद की चौकी है । उसका निर्माण अस्तंगत साम्राज्यवाद की उपलब्धि है और उसे अमरीका के नवसाम्राज्यवाद का संरक्षण प्राप्त है। 
मध्यपूर्व में मौजूदा संघर्ष को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए पश्चिम एशिया के इतिहास का विश्लेषण और उसकी समझ जरूरी है। यह पुस्तक इस दिशा में एक ईमानदार कोशिश है। 'अरब पूर्व में इस्रायल की मौजूदगी एक खंजर की तरह है जिसने अरब जगत को काट कर टुकड़ों में बाँट दिया है।' मध्यपूर्व में हिंसा की जड़ें कितनी गहरी हैं- यह समझने के लिए राजनैतिक सियोनवाद की उत्पत्ति, विकास और उसकी क्रूर आक्रामक शक्तिमत्ता को समझना आवश्यक है। यह पुस्तक सियोनवाद के एक शताब्दी के इतिहास और फिलस्तीनी अरबों के निरन्तर विनाश की गाथा है आज पूरे अरब जगत में अशान्ति और क्रान्ति का माहौल है । 
इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वहाँ इस्रायल विरोध और फिलस्तीनियों की सक्रिय पक्षधरता व्यापक रूप से उभरकर सामने आये । मध्यपूर्व एक प्रच्छन्न ज्वालामुखी की तरह है । इसके सम्भावित विस्फोट से ' सभ्यताओं की टकराहट' के इस युग में पूरे विश्व का भविष्य ही खतरे में है। यह पुस्तक शायद एक विराट मानवीय त्रासदी को समझने में कुछ मदद करे
 
पुस्तक की विषय सूची 
भूमिका से पहले
भूमिका
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राजनैतिक सियोनवाद का उदय
प्रथम विश्वयुद्ध और उसके बाद
बन्दूकधारी सियोनवाद
अरब-इस्रायल संघर्ष
लेबनन, हिजबुल्ला और 2006 की लड़ाई
इन्तिफ़दा
दूसरा
इन्तिफ़दा और उसकी परिणति
शान्ति-वार्ता का पाखंड और समझौतों का झूठ
मौजूदा मतभेद के प्रमुख मुद्दे
वर्तमान स्थिति
परिशिष्ट- अरब देशों के यहूदी
सन्दर्भ-ग्रन्थ

लेखक के सन्दर्भ में.....

महेन्द्र मिश्र का जन्म सन 1938 में एटा जनपद, उत्तर प्रदेश के एक गाँव में हुआ इनके पिता संस्कृत साहित्य और आयुर्वेद के आचार्य थे और जीविका से शिक्षक। भाषा और साहित्य में अभिरुचि विरासत में मिली। महेन्द्र मिश्र अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. हैं । चार वर्ष आगरा और जबलपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता रहे। सन 1962 में भारतीय रेल यातायात सेवा में प्रवेश किया और 1996 में अपर सदस्य (यातायात) रेलवे बोर्ड एवं विशेष सचिव, रेल मंत्रालय के पद से सेवानिवृत्त हुए रेल पर उन्होंने दो पुस्तकें लिखी हैं- 'रेल परिवहन का स्वरूप' और 'भारतीय रेल के सुनहरे पन्ने' । वर्तमान में वह विशाल बांधों और परियोजनाओं की मानवीय एवं पर्यावरण की त्रासदी के अध्ययन में संलग्न हैं

Wednesday, 25 April 2012

मुन्नी मोबाइल


Book :  Munni Mobile
Author : Pradeep Saurabh
Publisher : Vani Prakashan
Price : Price :` 350 (HB)
 
ISBN : 978-93-5000-055-7
Total Pages :  156
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Fiction, Political

पुस्तक के संदर्भ में प्रख्यात कथाकार, संस्मरण लेखक रवीन्द्र कालिया के विचार......
'मुन्नी मोबाइल' समकालीन सच्चाइयों के बदहवास चेहरों की शिनाख्त करता उपन्यास है धर्म, राजनीती, बाजार और मीडिया आदि के द्वारा सामाजिक विकास की प्रक्रिया किस तरह प्रेरित व प्रभावित हो रही है, इसका चित्रण प्रदीप सौरभ ने अपनी मुहावरेदार रवाँ-दवाँ भाषा के माध्यम से किया है प्रदीप सौरभ के पास नये यथार्थ के प्रमाणिक और विरल अनुभव हैं इनका कथात्मक उपयोग करते हुए उन्होंने यह अत्यंत दिलचस्प उपन्यास लिखा है मुन्नी मोबाइल का चरित इतना प्रभावित है कि स्मृति में ठहर जाता है'

पुस्तक के संदर्भ में प्रख्यात लेखिका मृणाल पांडे के विचार.....

'लेखक-पत्रकार आनंद भारती की व्यासपीठ से निकली 'मुन्नी मोबाइल' की कथा पीछले तीन दशकों के भारत का आईना है । इसकी कमानी मोबाइल क्रांति से लेकर मोदी (नरेंद्र) की भ्रांति तक और जातीय सेनाओं से लेकर लंदन के आप्रवासी भारतीयों के जीवन को माप रही है । दिल्ली के बाहरी इलाके की एक सीधीसादी घरेलू नौकरानी का वक्त की हवा के साथ क्रमश: एक दबंग और सम्पन्न स्थानीय 'दादा' बन जाना और फिर लड़कियों की बड़ी सप्लायर में उसका आखरी रूपांतरण, एक भयावह कथा है, जिसमें हमारे समय की अनेक अकथनीय सच्चाइयाँ छिपी हैं। मुन्नी के सपनों की बेटी रेखा चितकबरी पर समाप्त होने वाली यह गाथा, खत्म होकर भी ख़त्म कहाँ होती है?'

पुस्तक के संदर्भ में सुप्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी के विचार.....
'मुन्नी मोबाइल' एकदम नई काट का, एक दुर्लभ प्रयोग है ! प्रचारित जादुई तमाशों से अलग, जमीनी, धड़कता हुआ, आसपास का और फिर भी इतना नवीन कि लगे आप इसे उतना नहीं जानते थे । इसमें डायरी, रिपोर्टिंग, कहानी की विधाएँ मिक्स होकर ऐसे वृत्तान्त का रूप ले लेती हैं जिसमें समकालीन उपद्रवित, अति उलझे हुए उस रौरव यथार्थ का चित्रण है, इसे पढ़कर आप गोर्की के तलछटिय जीवन के जीवंत वर्णनों और ब्रेख्त द्वारा जर्मनी में हिटलर के आगाज को लेकर लिखे 'द रेसिस्टीबिल राइज ऑफ़ आर्तुरो उई' जैसे विख्यात नाटक के प्रसंगों को याद किये बिना नहीं रह सकते ! पत्रकारिता और कहानी कला को मिक्स करके अमरीका में जो कथा-प्रयोग टॉम बुल्फ ने किये हैं प्रदीप ने यहाँ किये हैं।'


लेखक के  संदर्भ में.....

प्रदीप सौरभ का जन्म कानपुर, उत्तरप्रेदश में हुआ लम्बे समय तक इलाहाबाद में गुजारा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया जनआन्दोलनों में हिस्सा लिया कई बार जेल गये इनका निजी जीवन खरी-खोटी हर खूबियों से लैस रहा कब, कहाँ और कितना जिया,इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा कई नौकरियाँ करते-छोड़ते दिल्ली पहुँच कर साप्ताहिक हिंदुस्तान के सम्पादकीय विभाग से जुड़े गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए पंजाब के आतंकवाद और बिहार के बंधुआ मजदूरों पर बनी फिल्मों के लिए शोध कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 'मुन्नी मोबाइल' पर शोध



अनभै साँचा


पुस्तक के अन्त में दो विस्तृत साक्षात्कार हैं इन साक्षात्कारों में एक है 'उत्तर संरचनावाद को क्यों और कैसे पढ़ें?' यह साक्षात्कार उत्तर संरचनावाद का विस्तृत परिचय तो देता ही है, उसकी सीमाओं और संभावनाओं पर भी प्रकाश डालता है दूसरा साक्षात्कार दलित विमर्श पर है जिसमें प्रो. पाण्डेय ने दलित साहित्य, समाज, उनके संघर्ष तथा उसके निहितार्थों की गम्भीर व्याख्या की है और उसके भविष्य को परखा है
Book :  Anbhai Sancha
Author : Manager Pandey
Publisher : Vani Prakashan
Price :
Price : ` 495 (HB)
ISBN : 978-93-5000-944-4
Total Pages :  300
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : A Collection of Critical Essays

पुस्तक के संदर्भ में......
अनभै साँचा सुपरिचित हिन्दी आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय के आलोचनात्मक लेखन का एक चयन है जिसमें उनके गत तीस वर्षों के महत्त्वपूर्ण निबंधों को संकलित किया गया है । इस चयन में पाठक देखेंगे कि भक्तिकाव्य की पुनर्मीमांसा से लेकर आलोचना और इतिहास के अन्त:सम्बन्ध और रचना के स्तर पर उनकी चिंताओं का विश्लेषण  , उपन्यास के समाजशास्त्रीय अध्ययन की प्रवृत्तियों के अनुशीलन के साथ-साथ उपन्यास की सामाजिकता के विश्लेषण की आवश्यकता का निरूपण, हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना की सीमाओं और संभावनाओं का पर्यवेक्षण, समकालीन हिन्दी कविता की चुनौतियों और उससे उबरने से सूत्रों का विवेचन तो है ही, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, कुमार विकल और वरवर राव की कविताओं का सम्यक परीक्षण भी है  
इन कवियों पर विचार करते हुए प्रो. पाण्डेय ने समकालीन कविता को देखने-परखने के कई निष्कर्ष दिए हैं जिनमें जनशक्ति में आस्था, जीवन-संघर्ष के प्रति राग, प्रकृति के प्रति प्रेम, काव्यानुभूति की संस्कृति, कथ्य के प्रति तन्मयता और सच्चाई, अपने समय और समाज के प्रति दायित्वों का बोध, तात्कालिक कथ्यों पर लिखी जानेवाली कविताओं में स्थायी अभिप्रायों की खोज, रोजमर्रा जीवन की सामान्य घटना पर सृजन, कविता का सहज रूप और आत्मीय रचाव, घटनाओं के संयोजन में तटस्थता, अनुभव और भाषा की एकान्विति, अपने समय के संशय और अँधेरे की खोज, स्मृति की रचनात्मक संभावना की खोज, कविता में ईमानदार पारदर्शिता, नैतिक विवेक का दायित्व, अपने समय की यातना के प्रति बेचैनी, विस्यमकारी यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए विरूपता के बोध में सक्षम कला चेतना, ब्योरों में से नये अर्थ और संकेतों की खोज जैसे निकष समकालीन हिन्दी कविता ही नहीं, भारतीय कविता को भी उसकी सम्पूर्णता में परखने में समर्थ हैं पुस्तक में राष्ट्रवाद की भूमि पर उपन्यास की रचना और प्रेमचंद पर गम्भीर विमर्श के साथ-साथ फणीश्वर नाथ 'रेणु' की कहानियों का आत्मीय विवेचन, अश्वघोष की कृति 'वज्रसूचि' की विशेषताओं की पड़ताल, स्त्री मुक्ति की दिशा में महादेवी वर्मा की कृति 'श्रृखला की कड़ियाँ' पर गहन विमर्श, संस्कृति को सरकारी उद्यमों से दूषित करने की प्रवृति पर वैचारिक मुठभेड़ के अतिरिक्त महात्मा गाँधी की पारदर्शी ईमानदारी और सच के स्वीकार के साहस का गहन विश्लेषण भी है । जिसमें प्रो. पाण्डेय ने उन्हें 'भारतीय समाज में मुक्ति की व्यापक प्रक्रिया का प्रेरक' कहा है। 
प्रो. पाण्डेय मानते हैं कि गाँधी में 'अनभै साँचा' कहने का कबीर जैसा असाधारण साहस था इसी कर्म में 'मुक्तिबोध के आलोचनात्मक संघर्ष की मीमांसा है जिससे आलोचना की सामाजिक जिम्मेदारी और उसकी उपादेयता पर एक बहस संभव हो सकी है विख्यात समाजशास्त्री स्व. श्यामाचरण दुबे के कृतित्व पर भी इसी कड़ी में एक आलेख है जिसमें उनके अवदान की प्रासंगिकता का रेखांकन है पुस्तक के अन्त में दो विस्तृत साक्षात्कार हैं इन साक्षात्कारों में एक है 'उत्तर संरचनावाद को क्यों और कैसे पढ़ें?' यह साक्षात्कार उत्तर संरचनावाद का विस्तृत परिचय तो देता ही है, उसकी सीमाओं और संभावनाओं पर भी प्रकाश डालता है दूसरा साक्षात्कार दलित विमर्श पर है जिसमें प्रो. पाण्डेय ने दलित साहित्य, समाज, उनके संघर्ष तथा उसके निहितार्थों की गम्भीर व्याख्या की है और उसके भविष्य को परखा है

लेखक के संदर्भ में.....
सुप्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का जन्म 23 सितम्बर, 1941 को बिहार प्रान्त के वर्तमान गोपालगंज जनपद के गाँव 'लोहटी' में हुआ उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ से उन्होंने एम.ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं पाण्डेय जी गत साढ़े तीन दशकों से हिन्दी आलोचना में सक्रिय हैं आलोचनात्मक लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित, जिनमें प्रमुख हैं, हिन्दी अकादमी द्वारा दिल्ली का साहित्यकार सम्मान, राष्ट्रीय दिनकर सम्मान, रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान, वाराणसी का गोकुल चन्द्र शुक्ल पुरस्कार और दक्षिण भारत प्रचार सभा का सुब्रह्मण्य भारती सम्मान मैनेजर पाण्डेय जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के भाषा संस्थान के भारतीय भाषा केंद्र में हिन्दी के प्रोफेसर रहे हैं बरेली कॉलेज, बरेली और जोधपुर विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे

Tuesday, 24 April 2012

निज घरे परदेसी


किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है और भारत में यह काम आज हिन्दुत्ववादियों ने शुरू कर दिया है 'आदिवासी की पहचान और नाम छीनकर उसे 'वनवासी' घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है -वह भूल जाए अपनी संस्कृति-अपनी भाषा

Book :  Nij Ghare Pardesi
Author : Ramnika Gupta
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 200 (HB)
ISBN : 81-8143-116-2
Total Pages :  106
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Sociology
 
 
पुस्तक के संदर्भ लेखिका के विचार ....
"हजारों बरसों से या कहूं सदियों से आदिवासियों को खदेड़ने का काम जारी है । उन्हें जंगलों में आदिम जीवन जीने के लिए मजबूर कर सभ्यता से दूर रखने की साजिश भी इस बीच जारी रही और जारी रहा उनका शोषण और दोहन । उनकी संस्कृति को न तो यहाँ के वासियों ने पनपने या विकसित होने दिया और न ही उसे आत्मसात कर मूलधारा में शामिल होने दिया । उल्टे हमेशा उन्हें असभ्य, आदिम या जंगली की पहचान देकर उनमें हीन भावना भरी जाती रही, जिससे इन पर उनका वर्चस्व कायम रहे । फलस्वरूप आदिवासियों के समाज का विकास ठहर-सा गया, सोच का विकास रुक गया और रुक गई उनकी संस्कृति और भाषा का विकास । परंपरा और अंधविश्वास से जुड़ा यह समाज, बस जीने की चाह के बल पर कठिन-से-कठिन परिस्थितियों का अपने कठिन श्रम से मुकाबला करता रहा दीन-दुनिया से बेखबर । लेकिन इस सबके बावजूद उसने अपनी पहचान आदिवासी के रूप में कायम रखी आदिवासी यानी मूल निवासी यानी भारत का मूल बाशिंदा यानी इस धरती का पुत्र जो धरती और प्रकृति के विकास के साथ ही पैदा हुआ, पनपा, बढ़ा और जवान हुआ- प्रकृति का सहयात्री और सहजीवी जो सहनशीलता की सीमा तक सहन करता पर अन्याय के विरोध में भी खड़ा हो जाता भले उसे गूंगा बना दिया गया था   अभिव्यक्ति की ताकत नहीं थी उसके पास, पर अन्याय हद से गुजर जाने पर उसके हाथ गतिशील हो उठते   उसका सारा आक्रोश, सारा गुस्सा तीरों में भरकर बरस पड़ता   गुलेलों के पत्थरों से वह अपना प्रतिकार जाहिर करता और वापस जंगलों में तिरोहित हो जाता
आज कोई सबसे बड़ा खतरा अगर आदिवासी जमात को है तो वह उसकी पहचान मिटने का है इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मिटने की साजिश एक योजनाबद्ध तरीके से रची जा रही है किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है और भारत में यह काम आज हिन्दुत्ववादियों ने शुरू कर दिया है 'आदिवासी की पहचान और नाम छीनकर उसे 'वनवासी' घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है -वह भूल जाए अपनी संस्कृति-अपनी भाषा।"
 
पुस्तक के अनुक्रम
जरुरत है बिरसा के विस्तार की
बांसुरी बन रही है मशाल
आदिवासी अपने ही घर में बेघर
झारखण्ड : अपने-अपने सपने
कोई इन्हें वाणी तो दे : कोई इन्हें स्याही का जामा तो पहनाए
बिना झार के खंड : झारखंड
लड़ा आदिवासी- राज करेगा गैर-आदिवासी
भाजपा किसके साथ : मूल निवासी 'स्पेट' के साथ या भारतीय मूल के 'महेंद्र' के साथ
आदिवासी अंक : प्रेरणास्त्रोत
आदिवासी हिन्दू की परिभाषा में नहीं आता
विस्थापितों को समस्याएँ एवं आन्दोलन का इतिहास
 
लेखिका के संदर्भ में.....
रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, 1930 सुनाम (पंजाब) में हुआ हिन्दी की परिचित कथाकार,कवियत्री एवं चिंतक रमणिका गुप्ता झारखण्ड के छोटानागपुर में मज़दूरों, दलितों, आदिवासियों एवं महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत रही हैं सम्प्रति वह प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी' की संपादक हैं/


Monday, 23 April 2012

धोखा


लोग विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों को मानते हैं । सभी धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताएँ हैं, कोई मूर्ति पूजा करता है, तो कोई नहीं । कोई गंजा रहता है, तो कोई चुटिया रखता है, कोई केश दाढ़ी कटवाना पाप समझता है । कुछ अपनी इच्छा के अनुसार दाढ़ी, केश रखते हैं कोई ईश्वर को आकार देता है, कोई निराकार के रूप में मानता है । कोई तलवार रखता है, कोई त्रिशूल । कुछ ईश्वर के पुत्र के रूप में आते हैं । कोई अपने धार्मिक स्थल पर जूता निकाल कर अन्दर जाता है, कोई जूता पहने जाता है । कोई हवन करता है, कोई मिलाद करता है । कोई मांसाहार और  कोई शाकाहार की बात करता है, तो कोई सर्वाहार की बात करता है । किसी को जलाया जाता है तो किसी को बॉक्स में बन्द करके और किसी को बिना बॉक्स ही दफन किया जाता है और सभी धर्मों की एक शिक्षा है कि इंसान को इंसान समझें एक प्रश्न उठता है कि जितने भी भगवान, ईश्वर के पुत्र और पैगम्बर, संत लोग आये । उन्होंने शांति अमन, इंसानियत का पैगाम दिया । पूजा करने की विधि धर्म के अनुसार अवगत कराया । लेकिन मरने पर उत्तर की तरफ सिर करने में काफी हद तक एक रूपता पाई जाती है।  आखिर क्यों ? विभिन्न  धर्मों के मानने वाले, जब अपने धर्म को नहीं मानते जो उन्हें इंसानियत का पैगाम देती है, लेकिन जो धर्म में नहीं है उसे मानते हैं क्या धर्म कहता है कि इंसान को इंसान ना समझना, छुआ-छूत, भेदभाव करना, जाति आधारित व्यवस्था पर कायम करना ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विषमतावादी भारतीय समाज में जातिभेद, ऊँच-नीच की भावनाएँ शोषित, पीड़ित, अपमानित, अभावग्रस्त और दलित जीवन की व्यथा मौजूद है । प्रस्तुत है सूरजपाल चौहान की पुस्तक 'धोखा' जो समाज पर लघु कहानियों के माध्यम से कटाक्ष करती है

Book : Dhokha
Author : Surajpal Chauhan
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 150(HB)
ISBN : 978-93-5000-760-0
Total Pages :  84
Size (Inches) :   5.50X8.25
Category  : Collection of Short Stories

 
पुस्तक के संदर्भ में...
धोखा कहानी संग्रह पृष्ठ संख्या 71 से 'छू नहीं सकता'  "अच्छा बताओ बच्चों, वह कौन-सी चीज है जिसे हम देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते ?" दूसरी किलास के अध्यापक के सवाल का उत्तर देने के लिए सभी बच्चों ने हाथ ऊपर उठाया हुआ था । "हाँ, रामू तुम बताओ ?" "सर, सूरज ।" "लक्ष्मी, तुम बताओ ?" "सर, चाँद " "लाखन तुम बताओ ?" " सर, आसमान " "शाबाश!" कक्षा अध्यापक ने अब पूरी किलास से एक साथ पूछा था-" अच्छा, और कौन-सी चीज है जिसे हम देख तो सकते हैं, लेकिन छू नहीं सकते ?" "सर, रात को आसमान में चमकते तारे " सभी बच्चे एक स्वर में बोले थे "वेरी गुड, एक्सीलेंट" ठीक है, अब सभी बच्चे अपना-अपना हाथ नीचे करके शान्त होकर बैठे रहें   कक्षा अध्यापक की बात सुनकर सभी बच्चों ने हाथ नीचे कर लिया था   लेकिन कलास में सबसे पीछे बैठा एक बच्चा अब भी अपना हाथ उठाये हुए था   कक्षा अध्यापक की जब उस बच्चे पर नजर पड़ी तो उसने उस बच्चे से अब तक ऊपर हाथ उठाये जाने का कारण जानना चाहा   मास्टर ने बच्चे से पूछा था- "भीम, क्या तुम इस सवाल का कोई और उत्तर देना चाहते हो ?" "जी सर, वह किलास-रूम के एक कोने में पीने के पानी से भरा मटका, जिसे मैं देख तो सकता हूँ किन्तु छू नहीं सकता " बच्चे ने खड़े होकर अदब के साथ कहा था बच्चे की बात सुनकर पहले तो मास्टर सकपकाया, फिर नाक-भौंह सिकोड़ते हुए बोला-"अच्छा-अच्छा, ठीक है..., चल अब बैठ जा " लेखक सूरजपाल चौहान का यह लघु कथा संग्रह जातिवादी समाज की वास्तविकताओं को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करता है यह संग्रह उस विलक्षण आईने की तरह है जिसमें अपना अक्स देखा जा सकता है और उसके पार भी अपारदर्शी का काम करते हुए भी पारदर्शी   पारदर्शी कहने का आशय यह है कि इसकी प्रतिबद्धता चयनधर्मी नहीं है, प्रतिबद्धता प्राय: कुछ चीजों को छुपा ले जाती है दुनिया भर पर रोशनी डालती है, फटकारती है लेकिन खुद को कभी प्रकाश-वृत्त में नहीं लाती, स्वपरीक्षण नहीं करती सूरजपाल चौहान के लिए प्रतिबद्धता सहूलियत भरा मामला नहीं है वह जितना 'औरों' के प्रति निर्मम है उतना अपने और 'अपनों' के प्रति कठोर । 'अन्तर', 'एकता का ढोल' और 'धोखा' जैसी लधुकथाएँ लेखकीय निष्पक्षता, आमूलपरिवर्तन की ईमानदार कामना को साबित करती हैं

लेखक के सन्दर्भ में...... 
रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार और हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'कृति सम्मान' एवं 'सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार' से सम्मानित सूरजपाल चौहान का जन्म 20 अप्रैल, 1955 फुसावली, जनपद- अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ देश की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, गीत, कहानियाँ, बालगीत, लेख, टिप्पणियाँ और कथा-संस्मरण प्रकाशित । वर्तमान में भारत सरकार के उद्यम (एसटीसी ऑफ़ इंडिया लि., नई दिल्ली) में मुख्य प्रबंधक के पद पर कार्यरत











Saturday, 21 April 2012

गलीकूचे

गलीकूचे पृष्ठ संख्या 173 से ' फ्रीलांसर के पास समय बहुत कम था। उसने आव देखा न ताव, अपनी प्रेमिका को मुर्गी की तरह वहीं दबोच लिया। 'तुम्हारे मुहँ से पेट्रोल की बू आ रही है, तुमने शराब पी है ?' फ्रीलांसर की प्रेमिका ने पूछा। 'मैंने पेट्रोल-पम्प में नौकरी कर ली है।' फ्रीलांसर ने कहा।' पुस्तक में रवीन्द्र कालिया गम्भीरता, सार्थकता के माध्यम से पाठकों में एक आत्म विश्वास उत्पन्न करना चाहते हैं। विशिष्टता के साथ प्रस्तुत है, 'गलीकूचे'

Book : Gali Kooche
Author : Ravindra Kaliya
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 450 (HB)
ISBN : 978-93-5072-143-8
Total Pages :  290
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Semi-Fiction
 

पुस्तक के संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के विचार......
"यदि एक ओर निर्मल वर्मा कहते हैं, कि कहानी की मृत्यु से चर्चा आरम्भ करनी चाहिए, तो दूसरी ओर रवीन्द्र  कालिया का भी यही कहना है, कि 'मुझे कहानी के उस स्वीकृत रूप से घोर वितृष्णा है, जिस अर्थ में वह आज कहानी के नाम से जानी जाती है।' इस विरोध को एकरसता की क्षोभ-भरी प्रति-क्रिया के रूप में लिया जा सकता है। इन नवयुवक लेखकों की कहानियों से साफ झलकता है, कि वे आज की सामाजिक सतह से नीचे जाकर 'मानव-नियति' और 'मानव-स्थिति' सम्बन्धी बुनियादी प्रश्न उठा रहे हैं। लगता है, युग नये सिरे से अपने-आप से भयावह प्रश्नों का साक्षात्कार कर रहा है। वैसे किताबी नुस्खे और चालू फ़ैशन यहाँ भी हैं, किन्तु 'प्रश्नात्मक दृष्टि' खरी और तेज है। आज के मानवीय सम्बन्धों की अमानवीयता को बेध कर पहचानने की अद्भुत क्षमता इस दृष्टि में है । इसलिए जिस निर्ममता के साथ सीधी भाषा में ये आज की मानव-स्थिति को कम-से-कम रेखाओं में उतार कर रख देते हैं, वह पूर्ववर्ती कथाकारों के लिए स्पर्धा की वस्तु हो सकती है । कहानी के रूपाकार और रचना-विधान की दृष्टि से ये कहानियाँ एक अरसे से उपयोग में आने वाले कथागत साज-संभार को एकबारगी उतार कर काफी हल्की हो गयी हैं- हल्की, लघु और ठोस

लेखक के सन्दर्भ में....
'शिरोमणि साहित्य सम्मान' (पंजाब), 'लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान'(उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), 'साहित्य भूषण सम्मान'(उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), 'प्रेमचन्द सम्मान', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सम्मान'(मध्य प्रदेश) आदि सम्मानों से पुरस्कृत प्रख्यात कथाकार, संस्मरण लेखक और यशस्वी सम्पादक, रवीन्द्र कालिया का जन्म 1 अप्रैल, 1939 को हुआ इनके उपन्यास व कहानियाँ विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं इन्होंने कई महाविद्यालयों में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में कार्य किया है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ एवं सम्पादक नया ज्ञानोदय  





Friday, 20 April 2012

शिकंजे का दर्द



बस की अगली सीट पर एक औरत बच्चा लिये हुए बैठी थी । बच्चा लगभग एक बरस का होगा, रो रहा था साथ में एक अधेड़ उम्र की महिला उसके साथ थी अधेड़ महिला शायद उसकी माँ या सास हो महिला का पति बस की दूसरी सीट पर बैठा था । बच्चे को चुप कराने के लिए पति ने बच्चे को लिया पहले अधेड़ महिला ने भी कोशिश की लेकिन बच्चा चुप नहीं हुआ। अगले स्टॉप से बस में एक व्यक्ति चढ़ा । बच्चे को रोता देख कर व्यक्ति ने कहा पानी पिलाओ । बच्चे के पिता ने पानी पिलाया तब बच्चा चुप हो गया । इस बात से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जीवन में अनुभव का एक विशेष महत्त्व है । जिसने जीवन को समझ कर  जिया है वह जीवन की स्पष्ट परिभाषा दे सकता है । इसी प्रकार अनुभवों पर आधारित 'शिकंजे का दर्द' प्रस्तुत है जिसमें लेखिका सुशीला टाकभौरे ने अपनी जीवनी के माध्यम से दलित और शोषित समाज को एक समाजशास्त्रीय ढंग से वर्णित किया है लेखिका कहती है कि 'शिकंजे का दर्द' लिखने का उद्देश्य दर्द देने वाले शिकंजे को  तोड़ने का प्रयास है  

Book : Shikanje Ka Dard

Author : Sushila Takbhaure
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 495(HB)
ISBN : 978-93-5000-719-8
Total Pages :  304
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Autobiography

पुस्तक के संदर्भ में....
 
दुनिया एक कैदखाना है, ऐसा कैदखाना जिसे ईश्वर ने बनाया है इसमें एक मानव निर्मित कैदखाना भी है, जिसे इन्सान ने बनाया हैमानव निर्मित कैदखाने से निकलना तो आसान है, लेकिन ईश्वर द्वारा निर्मित कैदखाने से बाहर आना इतना आसान नहीं पुस्तक 'शिकंजे का दर्द' शिकंजा यानी पंजा, जिसकी जकड़न में रहकर कुछ कर पाना कठिन हो शिकंजा यानी कठघरा जिसमें कैद होकर उसके बाहर जाना कठिन होशब्दकोश में दिए अर्थ के अनुसार शिकंजे का अर्थ दबाने, कसने का यंत्र है शिकंजे का अर्थ एक प्रकार का प्राचीन यंत्र है जिसमें अपराधी की टाँग कस दी जाती है । शिकंजा वह यंत्र है जिसमें धुनकने के पहले रुई को कसा जाता है । शिकंजे का अर्थ कोल्हू भी है । जिस तरह किसी ताकतवर को शिकंजे में जकड़कर उसकी पूरी ताकत को नगण्य बना दिया जाता है, उसी तरह लेखिका को भी सामाजिक जीवन की मनुवादी विषमता ने, वर्णवादी-जातिवादी समाज व्यवस्था ने शिकंजे में जकड़कर रखा, जिसका परिणाम पीड़ा-दर्द, छटपटाहट के सिवा कुछ नहीं है
सदियों के मूक मानव अब बोलने लगे हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे हैं, प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपनी व्यथा-कथा लिखने लगे हैं । प्रश्न है क्या प्रत्येक दलित पीड़ित को उसके मानवाधिकार मिल रहे हैं  ? क्या दलित शोषण की घटनाएँ रुकी हैं ? विषमतावादी भारतीय समाज में जातिभेद, ऊँच-नीच की भावनाएँ क्या अब नहीं हैं ? 'शिकंजे का दर्द' में संताप है दलित होने का, स्त्री होने का। इसमें शोषित, पीड़ित, अपमानित, अभावग्रस्त दलित जीवन की व्यथा है । स्त्री होना ही जैसे व्यथा की बात है । चाहे हमारा देश हो या विश्व के अन्य देश, हर जगह शोषण, उत्पीड़न का शिकार स्त्री ही रही है । जिस देश में वर्णभेद, जातिभेद की कलुषित परम्पराएँ हैं, वहाँ दलित स्त्री  शोषण की व्यथा और भी गहरी हो जाती है । सदियों से तिरस्कृत और अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर किये गये दलित जीवन की व्यथा-कथा का दर्द ' शिकंजे का दर्द' में समाहित है
 
लेखिका के संदर्भ में ...... 
'म.प्र दलित साहित्य अकादमी विशिष्ट सेवा सम्मान एवं पुरस्कार' और रमणिका फाउंडेशन की ओर से 'सावित्री बाई फुले' सम्मान एवं पुरस्कार से  पुरस्कृत सुशीला टाकभौरे का जन्म 4 मार्च 1954,  बानापुरा ( सिवनी मालवा), होशंगाबाद ( मध्यप्रदेश) में हुआ । एम.ए.   (हिन्दी) पीएच.डी.(अम्बेडकर विचारधारा) में किया  । साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में सृजनात्मक गतिविधियाँ एवं दलित समाज और नारी की स्थिति पर परिवर्तनवादी आन्दोलन में वैचारिक सक्रियता में संलग्न। फिलहाल, सेठ केसरीमल पोरवाल कॉलेज, कामठी (महाराष्ट्र) में अध्यापन