Saturday, 31 March 2012

मुअनजोदड़ो

सिन्धु घाटी सभ्यता के आख्यान में मोहनजोदड़ो-हड़प्पा हम सभी ने सुना है। यह 'मुअनजोदड़ो' क्या चीज है ? वहाँ के लोग मुअनजोदड़ो बोलते हैं, मुअनजोदड़ो मुआ यानी मृत और बहुवचन में मुअन मुआ का सिन्धी प्रयोग है। दड़ा यानी टीला/ मुअन-जो-दड़ो का आशय मुर्दों का टीला। 'मुअनजोदड़ो'बाद का नाम है भारत-पाक का बंटवारा क़ुदरती नहीं, बनावटी है और सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों की साझा सभ्यता-संस्कृति है

Book : Muanjodaro 
Writer : Om Thanvi
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 200
ISBN : 978-93-5000-723-5
Total Pages :  118
Size (Inches) :   5.75X8.25
Category  :  Travelogue

पुस्तक के संदर्भ में मधुकर उपाध्याय के कुछ विचार...

"यात्राएँ जैसी भी हों, उनका अर्थ नहीं बदलता। इसलिए कि हर यात्रा में एक अर्थ निहित है, जो उसका स्थायी भाव है। कि किनारे नहीं जाना है। सूरते-हाल जो भी हो वैसे भी पहुँचना कभी मक़सद नहीं हो सकता।  न यात्राओं का । न ज़िन्दगी का । यात्राएँ तो होती ही हैं पहुँची हुई। अपने हर क़दम पर उसी में सब हासिल-जमा । बशर्ते नज़र ठीक हो और नजरिया भी  ओम थानवी के पास दोनों की कमी नहीं है। बल्कि इफ़रात है। नतीजतन, यात्रा के अलावा पढ़ाकू फ़ुरसतों के साथ उन्होंने 'मुअनजोदड़ो'में अपने रंग भर दिए हैंउनका यह नज़रिया ही किताब का असली हासिल है।  
किसी देश या शहर के ऊपर से उड़ान भरते हुए उसके बारे में सब कुछ जान लेने वाले यात्रा वृत्तांतों से अलग, 'मुअनजोदड़ो'में नए क़रीने से चीजें देखने का सलीका है गहराइयों में उतरता। टीलों की ऊँचाइयों तक ले जाता  वह आप पर कुछ लादता-थोपता नहीं साथ चलता रहता है। बहैसियत एक ईमानदार दोस्त । 'मुअनजोदड़ो'की एक और ख़ास बात: वह यात्रा को रैखिक नहीं रहने देता ।  बल्कि कई बार अहसास दिलाता है कि आप किसी बहुमंजिला इमारत की लिफ्ट में हैं और हर मंज़िल एक कथा है  हमारे पूर्वजों की अनवरत कथा, जो जारी है अनन्तिम है। 
पुस्तक के संपादक 'ओम थानवी'  का परिचय :
ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं  देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं बहुचर्चित संकलन 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के संपादक हैं नवचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोदड़ो के माध्यम से भारत और पाकिस्तान की साझा सभ्यता-संस्कृति को उन्होंने यात्रा-वृत्तान्त के रूप में प्रस्तुत किया है  ओम थानवी का जन्म राजस्थान के फलोदी क़स्बे, जिला जोधपुर में 1 अगस्त, 1957 को एक शिक्षक परिवार में हुआ  बीकानेर में शिक्षा-दीक्षा हुई वहीँ से लेखन, रंगकर्म, अभिनय और निर्देशन में सक्रिय  हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश पाने में विफल होने पर पत्रकारिता के पेशे में चले आये  शुरुआत में जयपुर से प्रकाशित 'इतवारी' साप्ताहिक पत्रिका का सन 1980 में संपादन किया इसके बाद राजस्थान पत्रिका का, 1989 में जनसत्ता से जुड़े   वर्तमान में दैनिक जनसत्ता के संपादक हैं