Friday, 15 July 2011

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़



 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : आज के गम के नाम'
भूमिका और सम्पादन : शहरयार, महताव हैदर नकवी
वाणी प्रकाशन 
ISBN: 978-93-5000-757-0

मूल्य : 295 रुपये 


'और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा...'



             - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 





आज से ठीक सौ साल पहले अविभाजित भारत के सियालकोट जिले के कालाकादर गाँव में पैदा हुआ था एक ऐसा बालक, जिसे आज दुनिया फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के नाम से जानती है. फ़ैज़ उर्दू में प्रगतिशील कवियों में सबसे प्रसिद्ध तो थे ही - जोश, जिगर और फ़िराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वे सबसे लोकप्रिय भी थे। फ़ैज़ साहब के बारे में ये एक बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जब गांधीजी की हत्या हुई तब फ़ैज़ साहब 'पाकिस्तान टाइम्स' के संपादक थे, वे उनकी शवयात्रा में शरीक होने ख़ास तौर पर पाकिस्तान से आए थे, और उन्होंने संपादकीय भी लिखा था. बतौर सम्पादक उन्होंने किसानों और मजदूरों की समस्याओं पर ख़ूब लिखा. बंटवारे और खून-ख़राबे के साथ जब आज़ादी मिली तो उन्होंने 'दाग़दार  उजाला' कहकर अपना विरोध दर्ज कराया. 
उनकी कुछ नज़्में भारतीय उप-महाद्वीप में प्रतिरोध का प्रतीक बन गयी हैं. फ़ैज़ साहब की जन्म-शती पर उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर शहरयार और महताव हैदर नकवी ने 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : आज के गम के नाम' शीर्षक से एक किताब सम्पादित की है,  जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. किताब से फ़ैज़ साहब की एक बहुचर्चित नज़्म हम यहाँ पेश कर रहे हैं.


मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग 


मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शां* है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर* का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात*
तेरी  आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ* हो जाए
यूँ  न था मैंने फ़कत चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुःख हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना* तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख़ाब में बनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचओ-बाज़ार में हम
ख़ाक में लुथड़े हुए खून में नहलाए हुए

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा 
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग

         दरख्शां =चमकदार, गमे-दहर=दुनिया के ग़म, सबात=मज़बूती, निगूँ=उल्टी, बहीमाना=हैवानियत 
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