Tuesday, 27 September 2011

A Textual Study of the Apu Trilogy


A Textual Study of The Apu Trilogy

Prof. Satish Bahadur & Dr. Shyamala Vanarase

2011

Vani Prakashan
695/-
Discount: 10%
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As we move towards witnessing centenary celebrations of
 Indian Cinema in 2013, 
Vani Prakashan 
ushers in a new series on Cinema and associated crafts.

The first in the series 

A Textual Study of The Apu Trilogy

by a teacher who flagged Film Appreciation as a classroom discourse for the first time in India.

Prof. Satish Bahadur (1934-2010) was a Doctorate in Economics and Founder Member of Agra Film Society. Being discovered by Marie Seton at Agra, he along with his comrade-in-arm P.K. Nair, the founder director of the National Film Archives, Pune traveled across the country to introduce and inculcate critical film appreciation.

This book is a delicate and careful compilation of his class notes on Satyajit Ray's most celebrated Apu Trilogy: Pather Panchali (Song of the Little Road), Aparajito (The Unvanquished) and Apur Sansar (The World of Apu). Te films were completed between 1955-1959 and were based on two Bengali novels written by Bibhutibhushan Bandhopadhyay: Pather Panchali (1929) and Aparajito (1932). These notes are put together by his fellow faculty at FTII Dr. Shyamala Vanarase.



The book is available in Hindi.

Available at all leading Book Stores and Distributors.

Read More:

White Chalk and Black Board 
by Arun Khopkar
The Hindu 
25 September, 2011

(Arun Khopkar, an alumnus of the Film and Television Institute of India, is a filmmaker with many national and international awards to his credit. He is also a reputed film scholar and teacher. arunkhopkar@gmail.com)
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A Book on 'Apu trilogy' to be released
Times Of India
23 August, 2010
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Understanding a legacy
Indian Express
25 August, 2011
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Tribute to the auteur
DNA
24 August, 2011


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Wednesday, 21 September 2011

हिन्दी का लोकवृत (1920-1940) : फ्रांचेस्का ऑर्सीनी

हिन्दी का लोकवृत
हिन्दी का लोकवृत
(1920-1940) 
राष्ट्रवाद के युग में भाषा और साहित्य

लेखिका : फ्रांचेस्का ऑर्सीनी

अनुवाद : नीलाभ
  
वाणी प्रकाशन

मूल्य :  700 रुपये 

साथियो, 
फ्रांचेस्का ऑर्सीनी स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ्रीका स्तुदिएस, लन्दन विश्वविद्यालय में उत्तर भारतीय साहित्य की रीडर हैं. फिलहाल वे 'उत्तर भारत के पंद्रहवीं से लेकर सत्रहवीं सदी के साहित्य का इतिहास : बहुभाषिकता के दृष्टिकोण' लिख रही हैं. यहाँ हम पेश कर रहे हैं उनकी अभी हाल में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'हिन्दी का लोकवृत्त' की भूमिका से कुछ अंश :

पब्लिक स्फीयर यानी सार्वजनिक क्षेत्र

हालाँकि इस पुस्तक का प्रमुख केन्द्र-बिन्दु हिन्दी का साहित्यिक क्षेत्र है, तो भी उसके रूपान्तरण में हमें व्यापक सार्वजनिक-राजनैतिक क्षेत्र में विस्तार, संस्था-निर्माण और संगठन की सामान्य प्रक्रियाओं की झलक मिलती है।

इस किताब में जिस अवधि पर नज़र डाली गयी है वह 1919-20 में गाँधी जी के नेतृत्व में चलाये जा रहे जन-अभियानों के साथ राष्ट्रवादी आन्दोलन के विलक्षण विस्तार से ले कर 1920 और, 30 के दशकों के दौरान कांग्रेस पार्टी के संस्थानीकरण तक, और अन्ततः 1937-39 में, स्वतन्त्रता की लगभग दहलीज़ पर, कांग्रेस के प्रान्तीय मन्त्रिमण्डलों के गठन के साथ एक सत्ताधारी पार्टी के रूप में उसके संगठन तक फैली हुई है।’’

इस तरह एक ऐसे सामान्य ढाँचे की हमें ज़रूरत है जिसके दायरे में साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक परिघटनाओं के साथ-साथ गतिविधियाँ, संस्थाएँ कार्यकर्ता और विमर्ष आ जायें।

इस दृष्टि से जुर्गेन हेबरमास की ‘पब्लिक स्फ़ियर’ यानी ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ की अवधारणा कई कारणों से काफ़ी आकर्षक लगती है। पहली बात तो यह है कि वह यूरोपीय (विशेष रूप से अंग्रेज) सार्वजनिक क्षेत्र था, जिसे ध्यान में रख कर हिन्दी और दूसरे भारतीय बुद्धिजीवियों ने प्रगति और आधुनिक राष्ट्र की अपनी परिकल्पना को विकसित किया था।

दूसरे, हेबरमास द्वारा वर्णित यूरोपीय सार्वजनिक क्षेत्र और बीसवीं सदी के आरम्भ के हिन्दी सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना करने पर उनके बीच के गहरे अन्तर नज़र आ जायेंगे जो यूरोपीय (अंग्रेज) उदाहरण और उपनिवेषवादी भारत की विषिष्टताओं को स्थापित कर सकते हैं और यही नहीं, भारत की सन्दर्भ में कल्पना और यथार्थ के बीच के अन्तर को भी स्पष्ट कर सकते हैं।

‘सार्वजनिक क्षेत्र’ के हेबरमास ने सत्रहवीं और अट्ठारवीं शताब्दी के यरोप के बुर्जुवा समाज का जो विश्लेषण किया, उसी से ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ की उनकी परिभाषा उपजी है। इस समाज में ‘आम नागरिक जनता के तौर पर’ एकजुट हुए थे ताकि वे ‘सार्वजनिक सरोकार’ या ‘सामान्य हित’ के मामलों की चर्चा कर सकें और निरंकुशतावादी राज्य की आलोचना करके उस पर दबाव डाल सकें।

परम्परागत सामन्ती समाज में शासक ही जनता था और लोगों के ‘समक्ष’ अपनी हैसियत और प्रभुत्व को जताता था। जनता श्रेणीबद्ध सामन्ती समाज में अपने-अपने निर्धारित स्थान से इस प्रदर्षन में हिस्सेदारी करती थी।

हेबरराम का तर्क था कि एक निर्वैयक्तिक राज्य की ओर संचरण, बुर्जुवा अर्थतन्त्र के विकास और बुर्जुवा परिवार के निजी जगत के उभरने के साथ ही आम नागरिक, क्लबों, पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों जैसी सामाजिक संस्थाओं के मध्यवर्ती क्षेत्र में, ‘जनता’ के रूप में एकजुट होने लगे।

इन नागरिकों ने विचारों के स्वतन्त्र और विवेकपूर्ण आदान-प्रदान द्वारा (विशेष रूप से सेन्सरशिप, अर्थात सूचनाओं पर प्रतिबन्ध, के कानूनों के हटाये जाने के बाद) आम राय या लोकमत का निर्माण किया और उसे व्यक्त करने के लिए एक भाषा, तौर-तरीक़े और परिपाटियाँ बनायी।

पहले की सदियों के दौर साक्षरता के प्रचार-प्रसार ने शहरी संस्कृति, समाचार-तन्त्र, और व्यावसायिक प्रकाषन गृहों के विकास के साथ ‘सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का अम्बार’ खड़ा कर दिया था।

जिस ‘आम जनता’ की बात ये नागरिक कर रहे थे वह दरअसल काफ़ी सीमित थी और उसमें मुख्य रूप से बुर्जुवा और सामन्ती भद्र लोक शमिल था। फिर भी अपनी आत्म-छवि में यह साहित्यिक क्षेत्र ‘जनता’ ही था और कम-से-कम सैद्धान्तिक तौर पर इस तक सबकी पहुँच थी।

अलावा इसके, हालाँकि बुर्जुवाज़ी ने विवेकपूर्ण विमर्ष और तार्किक विचार प्रक्रिया पर अपनी एकमात्र दावेदारी कर रखी थी, ‘सार्वजनिकता का गुण’ और ‘तार्किक आदान-प्रदान का उदार अभीष्ट ग़ैर-बुर्जुवा, सबऑल्टर्न समूहों की भी पहुँच में आ गये, चाहे वे जेकोबिनिज्म़ और उसके उत्तराधिकारियों का उग्रतावादी बुद्धिजीवी वर्ग हो या फिर किसानों और मज़दूरों सरीखे सामाजिक वर्गों का व्यापक हिस्सा.....उदार सार्वजनिक क्षेत्र के सकारत्मक मूल्यों ने जल्दी ही अपेक्षाकृत व्यापक लोकतान्त्रिक स्वर प्राप्त कर लिया जिसके नतीजे के तौर पर प्रभावशाली लोकप्रिय आन्दोलन उभर कर सामने आये, जिनमें से हर एक का अपना स्पष्ट आन्दोलनात्मक संस्कार (यानी सार्वजनिक क्षेत्र का अपना स्वरूप) था।’

संचार माध्यम, जन समुदाय और उनसे व्यक्त होने वाले समीक्षात्मक कार्य सबसे पहले गै़र-सियासी साहित्यिक सरोकारों के इर्द-गिर्द विकसित हुए, जिससे एक क़िस्म का ‘साहित्यिक गणतन्त्र’ उभर कर सामने आया।

फिर धीरे-धीरे हर क्षेत्र में तर्क और विवके आलोचक का सर्वमान्य मापदण्ड बन गया और जल्दी ही आलोचनात्मक बहसें अभिरुचि के सवाल से सरक कर राज्य के प्रष्नों पर जा टिकीं, यानी राजनैतिक मुद्दों पर। मिसाल के तौर पर यह माँग़ होने लगी कि राज्य के काम-काज के बारे में जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए जिससे राज्य की गतिविधियाँ आलोचनात्मक जाँच-परख का विषय बन सकें और जनमत के प्रभाव के अधीन आ सकें।

ऐसी बहसों न राज्यों के नियमों और कार्यो पर सार्वजनिक बहस को बढ़ावा दिया, नागरिकता के आदर्शों को एक ठोस रूप प्रदान किया और एक अपेक्षाकृत अधिक अमूर्त विचार को जन्म दिया कि कार्य प्रक्रिया से गुज़र चुके होते।

इसमें भारी लोकतान्त्रिक सम्भावनाएँ निहित थी जैसा कि हेबरमास के एक आलोचक ने सुझाया है, इस बात का अभिप्राय यह था कि ‘सार्वजनिक सरोकार’ सरोकारों का कोई पूर्व-सिद्ध समूह नहीं थे, बल्कि यह कि जो बात सामान्य चिन्ताओं का विषय समझे जाने योग्य होगी, उसे सही तौर पर भागीदारी के बीच तर्कपूर्ण बहस-मुबाहिसे से ही तय किया जायेगा।

इस स्थिति में लोकमत ऐसी बहसों का ही नतीजा बन जाता है-समान भलाई के बारे में एक सर्वानुमति यानी आम राय। हेबरमास ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ की एक सामान्य परिभाषा इन्हीं शब्दों में करते हैं: ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ से हमारा अभिप्राय सबसे पहले, हमारे सामाजिक जीवन का एक ऐसा जगत है जिसमें जनमत सरीखी कोई चीज़ रूप ले सकती है। उस तक सभी नागरिकों की पहुँच है।

सार्वजनिक क्षेत्र का एक अंष हर उस बातचीत में अस्तित्व ग्रहण करता है जिसमें सामान्य नागरिक एक सार्वजनिक संस्था स्थापित करने के लिए इकट्ठा होते हैं। फिर वे न तो निजी मामलों को निपटाने वाले व्यापारिक या पेशेवर व्यक्तियों की तरह व्यवहार करते है, न ऐसी सवैधानिक व्यवस्था के सदस्यों की तरह जो सरकारी नौकरशाही ही कानूनी पाबन्दियों के अधीन हों।

नागरिक एक सार्वजनिक संस्था के रूप में तब व्यवहार करते हैं, जब वे सामान्य हितों के विषयों के बारे निर्बाध रूप से आपस में विचार-विमर्श करते हैं-यानी, एकत्र और संगठित होने और अपनी राय को व्यक्त और प्रकाशित करने की आज़ादी की गारण्टी के साथ। किसी बड़ी सार्वजनिक संस्था में इस तरह का परस्पर आदान-प्रदान जानकारी को प्रसारित करने और उसे प्राप्त करने वालों को प्रभावित करने के विशिष्ट साधनों की माँग करता है।

सार्वजनिक क्षेत्र की इस अवधारणा के लिए बहस-मुबाहिसे की एक साझी भाषा का अस्तित्व अनिवार्य है। इसके अलावा, तार्किक-विवादपूर्ण बहसों की मोहलत देने का मतलब यह है कि इस दारे में मान्यताएँ, कथन और कार्य एक ख़ास क़िस्म की मुलायमियत और लचीलापन ग्रहण कर लेते हैं. मौजूदा नियम-क़ायदों, विश्वासों और सामाजिक सम्बन्धों पर सवाल उठाये जा सकते हैं और वे सचेत रूप से अस्थायी बन सकते हैं।

चारों तरफ़ का संसार और व्यक्ति की अपनी पहचान में नयी गतिशीलता और लचीलापन आ जाता है। समान एजेण्डे और संस्थाएँ स्थापित की जा सकती हैं और उन्हें लागू करने के लिए संसाधन और लोग जुटाये जा सकते हैं।

यह साझा क्षितिज और क्षेत्र एक ऐसी जनसक्रियता को जन्म देता है, जो अनिवार्य रूप से भागीदारी की मौजूदा सीमाओं से नहीं बँधी होती. वह अपने सामने असाधारण रूप से भागीदारी की मौजूदा सकती है, क्योंकि सैद्धान्तिक तौर पर उसमें हर कोई शामिल हो सकता है।

हालाँकि हेबरमास ने भी यह माना है कि इस तरह का सार्वजनिक क्षेत्र हमेशा कुल मिला कर एक आदर्श ही रहा है और आलोचकों ने लिंग और वर्ग के आधार पर उसकी गम्भीर सीमाओं की ओर इशारा किया है तो भी हम कल्पना कर सकते हैं कि एक आदर्श के रूप में वह भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए कितना शक्तिशाली और आकर्षक आदर्श रहा होगा जो अपने निजी जनवादी मुहावरे और संस्थाएँ स्थापित करने के लिए आतुर थे और ख़ासतौर पर 1920 के दशक में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में समूची जनता को शामिल करने के उत्सुक थे।

जिस 'आम जनता' की बात ये नागरिक कर रहे थे वह दरअसल काफी सीमित थी और उसमें मुख्य रूप से बुर्जुवा और सामन्ती भद्रलोक शामिल था। फिर भी अपनी आत्म-छवि में यह साहित्यिक क्षेत्र 'जनता' ही था और कम-से-कम सैद्धान्तिक तौर पर इस तक सबकी पहुँच थी।

अलावा इसके, हालांकि बुर्जुवाजी ने विवेकपूर्ण विमर्श और तार्किक विचार प्रक्रिया पर अपनी एकमात्र दावेदारी कर रखी थी, 'सार्वजनिकता का गुण' और 'तार्किक आदान-प्रदान' का उदार अभीष्ट गैर-बुर्जुवा, सबऑल्टर्न समूहों की भी पहुँच में आ गए, चाहे वे जेकोबिनिज्म और उसके उत्तराधिकारियों का उग्रतावादी बुद्धिजीवी वर्ग हो या फिर किसानों और मजदूरों सरीखे सामाजिक वर्गों का व्यापक लोकतांत्रिक स्वर प्राप्त कर लिया जिसके नतीजे के तौर पर प्रभावशाली लोकप्रिय आन्दोलन उभरकर सामने आए, जिनमें से एक का अपना स्पष्ट आन्दोलनात्मक संस्कार (यानी, सार्वजनिक क्षेत्र का अपना स्वरूप) था।  (भूमिका से, 26-29)

Monday, 5 September 2011

'लज्जा' / REVENGE

प्रिय पाठकों,

नमस्कार!

हर सप्ताह हम आपके समक्ष लाते हैं कुछ नयी किताबें...

इस सप्ताह प्रस्तुत है तसलीमा नसरीन की विश्व प्रसिद्ध कृति

 'लज्जा'
 का
तीसवाँ संस्करण 
और 
वाणी प्रकाशन  से प्रकाशित 'शोध' का अंग्रेजी अनुवाद 

'Revenge'

इन किताबों के बारे में विस्तृत जानकारी संलग्न है.

आप इन पुस्तकों को निम्नालिखित नंबरों पर कॉल कर मंगवा सकते हैं:

9136369644

(अमित जैन, सेल्स इग्जेक्युटिव, वाणी प्रकाशन )

011-23275710
011-23273167

अन्यथा
sales.vaniprakashan@gmail.com 
पर  पुस्तकादेश भेजने की कृपा करें. 
धन्यवाद!