Saturday, 30 July 2011

'हंस' के रजत जयंती कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन से दो खण्डों में प्रकाशित 'हंस : लम्बी कहानियाँ' पुस्तक का लोकार्पण होगा .






साथियो,
'सूखा' (निर्मल वर्मा) 'और अंत में प्रार्थना' (उदय प्रकाश), 'कामरेड का कोट' (सृंजय), 'धर्मक्षेत्रे-कुरूक्षेत्रे'   (दूधनाथ सिंह), 'दो औरतें' (कृष्ण बिहारी) 'जलडमरूमध्य' (अखिलेश), 'डेढ़ सौ साल की तन्हाई' (संजीव) आदि  कहानियों ने 20 वीं सदी के उत्तरार्ध और 21 वीं सदी के शुरुआती दौर के भारतीय समाज की 'माइक्रो रियलिटी' को परत-दर-परत उघारा है और नए-नए विमर्श शुरू किए हैं. 

हिंदी की बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिका 'हंस' में प्रकाशित इन लम्बी कहानियों ने समकालीन हिंदी कहानी को एक नया आयाम दिया है. दरअसल ये लम्बी कहानियाँ 'हंस' की धरोहर हैं.


वाणी प्रकाशन, दिल्ली  ने 'हंस' के गौरवपूर्ण 25 वर्षों के प्रकाशन से चुनिन्दा व सर्वाधिक लोकप्रिय लम्बी कहानियों का संकलन दो खण्डों में प्रकाशित किया है. 


'हंस' की रजत जयंती के अवसर पर 31 जुलाई 2011 को शाम पांच बजे ऐवाने गालिब सभागार में आयोजित कार्यक्रम में राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित और वाणी प्रकाशन से दो खण्डों में प्रकाशित 'हंस : लम्बी कहानियाँ' पुस्तक का लोकार्पण किया जाएगा।


आप सभी साथी कार्यक्रम में आमंत्रित हैं।

शुक्रिया।

वाणी प्रकाशन, दिल्ली

Wednesday, 27 July 2011

पुनर्पाठ

साथियो,
 
आज शाम छह बजे इंडिया हेबिटाट सेंटर, कासरीना हॉल, नई दिल्ली में वाणी प्रकाशन की ओर से पुनर्पाठ-2 का आयोजन किया जा रहा है.  


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' पर हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और आचार्य राधाबल्लभ त्रिपाठी के साथ संवाद करेंगे युवा इतिहासकार और सी.एस.डी.एस. के फेलो रविकांत. 

(अपरिहार्य कारणवश हिंदी के युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी आज के कार्यक्रम में शरीक़ होने में असमर्थ हैं.)

कार्यक्रम में पुनर्पाठ-1 में (दिव्या : यशपाल) पर हुए संवाद पर तैयार पुस्तक और फ़िल्म की सी.डी. का भी लोकार्पण किया जाएगा.

बेहतर सवाल पूछनेवाले पांच विद्यार्थियों और शोधार्थियों को पांच-पांच सौ रुपये प्रोत्साहन राशि दी जाएगी. 

नोट : कार्यक्रम के निर्धारित समय से पंद्रह मिनट पहले आयें.  हम शाम की चाय आपके साथ पीना चाहते है.

शुक्रिया.

वाणी प्रकाशन, दिल्ली  



Saturday, 23 July 2011

वाणी प्रकाशन समाचार


साथियों,
फेसबुकट्विटर और ब्लॉग पर कई मित्रों ने 'वाणी प्रकाशन समाचार' पत्रिका को ऑनलाइन प्रकाशित करने का आग्रह किया हैउनकी सलाह को मद्देनज़र रखते हुए हम 'वाणी प्रकाशन समाचारका जुलाई 2011 अंक (50) ऑनलाइन प्रकाशित कर रहे हैंआगे से पत्रिका का हर अंक हम आपसे ऑनलाइन भी साझा करेंगेयह अंक आपको कैसा लगाअपनी प्रतिक्रया और सलाह हमें ज़रूर भेजेंशुक्रिया.  




























Tuesday, 19 July 2011

पुनर्पाठ-2





वाणी प्रकाशन की क्लासिक’ उपन्यास ुनर्पाठ श्रृंखला में 16 जून 2011 को पहला संवाद यशपाल की दिव्या’ पर हुआ. उस सत्र में आप सभी की उपस्थिति सराहनीय रही. इतिहासवेत्ताउपन्यासकार भगवान सिंह ने उपन्यास को उधेड़ाफिर सँवारा और इस सम्पूर्ण चर्चा में महलों की राजनीति’ जैसे नये मुद्दे भी हाथ लगे. युवा लेखक व विचारक मित्रों ने नये-नये सवाल उठाएचर्चा हुईगर्म चर्चा हुई.

अब हम पुनर्पाठ का दूसरा सत्र लेकर आपके समक्ष उपस्थित हो रहे हैं, जो कि 27 जुलाई 2011, शाम 6:00 बजे पिछली बार की तरह कॉसरीना हॉल, हैबिटैट सेंटर में हजारी प्रसाद द्विवेदी के बहुचर्चित एतिहासिक उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर होगा.

प्रो. नामवर सिंह के सान्निध्य व डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी के उपन्यास-परिचय के साथ बजरंग बिहारी तिवारी कार्यक्रम में संवाद करेंगे.

'आमंत्रण पत्र' और 'वाणी प्रकाशन समाचार' के जुलाई 2011 अंक में प्रकाशित 'पुनर्पाठ' कार्यक्रम का परिचय संलग्न है.

आप मित्रगण सहित सादर आमंत्रित हैं।

वाणी प्रकाशन

वाणी प्रकाशन
21 -ए, अंसारी रोड 
दरियागंज
नयी दिल्ली-110002  

दूरभाष: 011 -23275710
       011 -२३२७३१६७


Friday, 15 July 2011

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़



 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : आज के गम के नाम'
भूमिका और सम्पादन : शहरयार, महताव हैदर नकवी
वाणी प्रकाशन 
ISBN: 978-93-5000-757-0

मूल्य : 295 रुपये 


'और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा...'



             - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 





आज से ठीक सौ साल पहले अविभाजित भारत के सियालकोट जिले के कालाकादर गाँव में पैदा हुआ था एक ऐसा बालक, जिसे आज दुनिया फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के नाम से जानती है. फ़ैज़ उर्दू में प्रगतिशील कवियों में सबसे प्रसिद्ध तो थे ही - जोश, जिगर और फ़िराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वे सबसे लोकप्रिय भी थे। फ़ैज़ साहब के बारे में ये एक बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जब गांधीजी की हत्या हुई तब फ़ैज़ साहब 'पाकिस्तान टाइम्स' के संपादक थे, वे उनकी शवयात्रा में शरीक होने ख़ास तौर पर पाकिस्तान से आए थे, और उन्होंने संपादकीय भी लिखा था. बतौर सम्पादक उन्होंने किसानों और मजदूरों की समस्याओं पर ख़ूब लिखा. बंटवारे और खून-ख़राबे के साथ जब आज़ादी मिली तो उन्होंने 'दाग़दार  उजाला' कहकर अपना विरोध दर्ज कराया. 
उनकी कुछ नज़्में भारतीय उप-महाद्वीप में प्रतिरोध का प्रतीक बन गयी हैं. फ़ैज़ साहब की जन्म-शती पर उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर शहरयार और महताव हैदर नकवी ने 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : आज के गम के नाम' शीर्षक से एक किताब सम्पादित की है,  जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. किताब से फ़ैज़ साहब की एक बहुचर्चित नज़्म हम यहाँ पेश कर रहे हैं.


मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग 


मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शां* है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर* का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात*
तेरी  आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ* हो जाए
यूँ  न था मैंने फ़कत चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुःख हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना* तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख़ाब में बनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचओ-बाज़ार में हम
ख़ाक में लुथड़े हुए खून में नहलाए हुए

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा 
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग

         दरख्शां =चमकदार, गमे-दहर=दुनिया के ग़म, सबात=मज़बूती, निगूँ=उल्टी, बहीमाना=हैवानियत 
...


Tuesday, 12 July 2011

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ओम थानवी



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ISBN : 978-93-5000-723-5
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मुअनजोदड़ो - भारतीय इतिहास की धरोहर है. सुप्रसिद्ध पत्रकार और लेखक ओम थानवी इस धरोहर-स्थल की कई बार यात्रा कर चुके हैं. पिछले दिनों  उनका यात्रा-वृत्तान्त 'मुअनजोदड़ो' जब प्रकाशित हुआ तो पाठकों ने इसे हाथोंहाथ लिया और समीक्षकों ने भी. समीक्षकों के मुताबिक़ 'मुअनजोदड़ो' को पढ़ते हुए इतिहास, पुरातत्व, भूगोल, साहित्य - यहाँ तक कि संगीत के गलियारों से गुजरने तथा मानव सभ्यता की बुनियादी गुत्थियों को सुलझाने के सूत्रों से परिचय होता है. तसल्ली की बात है कि इन गुत्थियों में न यह कृति उलझती हैं न पाठको को उलझने देती है. इसमें तर्क है, खोज है, विश्लेषण है तथा विशेषज्ञों और विद्वानों के वैज्ञानिक निष्कर्षों के प्रमाण भी हैं. पिछले दिनों हिन्दी की कई साहित्यिक पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों में 'मुअनजोदड़ो' की समीक्षाएं प्रकाशित हुई हैं. उनमें से कुछ हम आपसे साझा कर रहे हैं.
 शुक्रिया!
-- 



15 अगस्त 2011 से पहले पुस्ताकादेश  


 देने पर पायें 2o% छूट!

































Thursday, 7 July 2011

तीसरी ताली




Book : Teesari Taali
Author : Pradeep Sourabh
Publisher : Vani Prakashan
Price :  350(HB)
ISBN : 978-93-5000-502-6
Total Pages :  195
Size (Inches) :   5X8
Category  : Novel 


पुस्तक के संदर्भ में सुधीश पचौरी के विचार....
"यह उभयलिंगी सामाजिक दुनिया के बीच और बरक्स हिजड़ों, लौंडों, लौंडेबाजों, लेस्बियनों और विकृत-प्रकृति की ऐसी दुनिया है जो हर शहर में मौदूद है और समाज के हाशिये पर जिन्दगी जीती रहती है  अलीगढ़ से लेकर आरा, बलिया, छपरा, देवरिया यानी 'एबीसीडी' तक, दिल्ली से लेकर पूरे भारत में फैली यह दुनिया समान्तर जीवन जीती  है प्रदीप सौरभ ने इस दुनिया के उस तहखाने में झाँका है, जिसका अस्तित्व सब 'मानते' तो हैं लेकिन 'जानते' नहीं । समकालीन 'बहुसांस्कृतिक' दौर के 'गे', 'लेस्बियन', 'ट्रांसजेंडर' अप्राकृत-यौनात्मक जीवन शैलियों के सीमित सांस्कृतिक स्वीकार में भी यह दुनिया अप्रिय, अकाम्य, अवांछित और वर्जित  दुनिया है  यहाँ जितने चरित्र आते हैं वे सब नपुंसकत्व या परलिंगी या अप्राकृत यौन वाले ही हैं  परिवार परित्यक्त, समाज बहिष्कृत-दण्डित ये 'जन' भी किसी तरह जीते हैं असामान्य लिंगी होने के साथ ही समाज के हाशियों पर धकेल दिए गये, इनकी सबसे बड़ी समस्या आजीविका है जो इन्हें अन्तत: इनके समुदायों में ले जाती है इनका वर्जित लिंगी होने का अकेलापन 'एक्स्ट्रा' है और वही इनकी जिन्दगी का निर्णायक तत्त्व है  अकेले-अकेले बहिष्कृत ये किन्नर आर्थिक रूप से भी हाशिये पर डाल दिये जाते हैं कल्चरल तरीके से 'फिक्स' दिये जाते हैं  यह  जीवनशैली की लिंगीयता है जिसमें स्त्री लिंगी-पुलिंगी मुख्यधाराएँ हैं जो इनको दबा देती हैं नपुंसकलिंगी कहाँ कैसे जिएँगे ? समाज का सहज स्वीकृत हिस्सा कब बनेंगे ? फर्राटेदार पाठ देता 'मुन्नी मोबाइल' के बाद प्रदीप सौरभ का यह दूसरा उपन्यास 'तीसरी ताली' लेखक की जबर्दस्त पर्यवेक्षण-क्षमता का सबूत है  यहाँ वर्जित समाज की फुर्तीली कहानी है, जिसमें इस दुनिया का शब्दकोश जीवित हो उठा है लेखक की गहरी हमदर्दी इस जिन्दगी के अयाचित दुखों और अकेलेपन की तरह है । इस दुनिया को पढ़कर ही समझा जा सकता है कि इस दुनिया को बाकी समाज,  जिस निर्मम क्रूरता से 'डील' करता है वही क्रूरता इनमें हर स्तर पर 'इनवर्ट' होती रहती है  उनकी जिन्दगी का हर पाठ आत्मदंड, आत्मक्रूरता, चिर यातना का पाठ है यह हिन्दी का एक साहसी उपन्यास है जो जेंडर के इस अकेलेपन और जेंडर के अलगाव के बावजूद समाज से जीने की ललक से भरपूर दुनिया का परिचय कराता है"


लेखक के  संदर्भ में.....
प्रदीप सौरभ का जन्म कानपुर, उत्तरप्रेदश में हुआ  लम्बे समय तक इलाहाबाद में गुजारा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया   जनआन्दोलनों में हिस्सा लियाकई बार जेल गये । इनका निजी जीवन खरी-खोटी हर खूबियों से लैस रहा  कब, कहाँ और कितना जिया,इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा  कई नौकरियाँ करते-छोड़ते दिल्ली पहुँच कर साप्ताहिक हिंदुस्तान के सम्पादकीय विभाग से   जुड़े गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए पंजाब के आतंकवाद और बिहार के बंधुआ मजदूरों पर बनी फिल्मों के लिए शोध कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 'मुन्नी मोबाइल' पर शोध 

'वाणी प्रकाशनको आप सभी से यह खुशखबरी साझा करते हुए बेहद प्रसन्नता हो रही है कि हमारे चर्चित और लोकप्रिय उपन्यासकार प्रदीप सौरभ को किन्नरों के जीवन पर आधारित उपन्यास 'तीसरी तालीके लिए वर्ष 2012 का 18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मायू.के. द्वारा सम्मानित किया गया है । यह सम्मान प्रदीप सौरभ को लन्दन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में 28 जून,2012 दिया गया । 



(बाएं से काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी, प्रदीप सौरभ, कैलाश बुधवार, विरेन्द्र शर्मा, तेजेन्द्र शर्मा, लॉर्ड किंग, सोहन राही)





(बैठे हुए बाएं से - प्रदीप सौरभ, काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी, विरेन्द्र शर्मा (एम.पी.) लॉर्ड किंग, सोहन राही।)
(खड़े हुए बाएं से - आदिति महेश्वरी, काउंसलर के.सी. मोहन, फ़्रेंचेस्का ऑरसीनी, तेजेन्द्र शर्मा, दीप्ति शर्मा, मधु अरोड़ा, नीना पाल, कैलाश बुधवार।)




मीडिया रिपोर्ट
वर्ष 2012 का 18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मायू.के. द्वारा प्रदीप सौरभ को लन्दन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में 28 जून,2012 दिया गया। जनसत्ता अखबार में प्रकशित खबर 

http://epaper.jansatta.com/44873/Jansatta.com/30-June-2012#page/7/2

अखबार, दैनिक भास्कर 14 अप्रैल, 2012 के अंक में प्रकशित
18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मायू.के
.http://epaper.bhaskar.com/detail.php?id=134317&boxid=41411858562&view=text&editioncode=194&pagedate=04/14/2012&pageno=8&map=map&ch=cph


अखबार, जनसत्ता 14 अप्रैल, 2012 के अंक में प्रकशित 
18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मायू.के
http://epaper.jansatta.com/38132/Jansatta.com/14-April-2012#page/7/1


अखबार, न्यू ऑब्ज़र्वर पोस्ट 13 अप्रैल, 2012 के अंक में प्रकशित 
18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मायू.के
http://newobserverpost.blogspot.in/2012/04/18th-katha-uk-awards-2012-at-house-of.html


13 मार्च, 2011, नवभारत टाइम्स 
यह कहानी उन लोगों की है जिन्हें समाज के ज्यादातर लोग गिरी नजर से देखकर उनका मजाक उड़ाते हैं। सामाजिक हाशिए पर रहने वाले ऐसे लोग हैं : हिजड़े, लौंडे, लौंडेबाज वगैरह। ऐसे लोग हर शहर में मिल जाएंगे। उनकी अपनी अलग दुनिया है जिस पर भागमभाग में लगे लोगों का शायद ही ध्यान जाता हो। आम लोगों के लिए यह वजिर्त दुनिया है। समाज से लगभग बहिष्कृत और दंडितों जैसा जीवन जीने को मजबूर ये लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के चलते ही ऐसे समाजों का रूप ले लेते हैं। उनके बारे में सब मानते तो हैं पर जानते नहीं। लेखक ने अपनी पैनी नजर से ऐसे लोगों की दुनिया के अंधकार में झांकने की कोशिश की है।



तीसरी ताली'

प्रदीप सौरभ द्वारा लिखी गयी किन्नरों के जीवन पर आधारित कृति 'तीसरी ताली' को पाठकों और मीडिया ने बड़े जोर शोर से सराहा. कुछ प्रतिक्रियाओं को  हम आपके समक्ष उपस्थित कर रहे हैं...यदि 'तीसरी ताली' आपने भी पढ़ी हो तो हमें जरूर बताएं कि आपको यह किताब कैसी लगी
    

























'तीसरी तली'  का लोकार्पण समारोह
मार्च 2011, साहित्य अकादेमी 


बाए से दाए: हिन्दी में नयी कहानी के रचनाकार श्री उदय प्रकाश,  संपादक, पत्रकार व लेखक श्री प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन के प्रबंध निर्देशक श्री अरुण माहेश्वरी एवं हिन्दी साहित्य की जानी मानी आलोचक प्रो. निर्मला जैन