Wednesday, 11 April 2018

वाणी प्रकाशन समाचार | वर्ष :11, अंक : 131, अप्रैल 2018

प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

  वर्ष :11, अंक : 131, अप्रैल  2018  










Tuesday, 3 April 2018

निर्मल स्मृति

निर्मल स्मृति

(3 अप्रैल 1929 )





निर्मल सूक्तियाँ ~
  • मुझे ईश्वर में विश्वास नहीं है, फिर भी न जाने कैसे एक विचित्र स्नेहिल-सी कोमलता मेरे अस्तित्व के गहनतम तल में भाप-सी उठने लगती है, जब मैं अपने लेखन में कभी ईश्वरका नाम लिखता हूँ।

  • साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ़ अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न में पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा अहसास होता है कि तुम सचमुच कितने प्यासे थे।
   
  • मनुष्य का अन्तःविवेक समाज की नैतिक मान्यताओं से नहीं आता, जो बदलती रहती हैं। यह आता है, उस असीम विस्तार के बोध से, जो इतिहास के ऊपर फैला हैऔर मनुष्य के भीतर भी।

  • मेरे लिए सफलता एक ऐसे खिलौने की तरह है, जिसे एक अजनबी किसी बच्चे को देता है, इससे पहले कि वह इसे स्वीकार करे, उसकी नज़र अपने माँ-बाप पर जाती है और वह अपना हाथ खींच लेता है।
  • जब हम जवान होते हैं, हम समय के ख़िलाफ़ भागते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बूढ़े होते जाते हैं, हम ठहर जाते हैं, समय भी ठहर जाता है, सिर्फ़ मृत्यु भागती है, हमारी तर                                               
  • असली सन्त और क्रान्तिकारी सिर्फ़ वही लोग हो सकते हैं जो माँ के पेट से निकलते ही चारों तरफ़ दुनिया को देखते होंगे और घोर निराशा में चीख मार कर रोते होंगे...क्योंकि हर बच्चा पैदा होते ही चीखता है- सन्त और क्रान्तिकारी बनने की सम्भावनाएँ हर व्यक्ति में मौजूद रहती हैं।
  • सुख की तलाश आँखमिचौनी का खेल है- जब तुम उसे खोजते हो, तो वह ओझल हो जाता है, फिर वह अचानक तुम्हें पकड़ लेता है, जब तुम अपनी यातना की ओट में मुँह छिपा कर बैठे हो।
  • हर लेखक की शुरुआत में उसका अन्त छिपा रहता है...और इन दोनों के बीच वह स्वयं है, पराजित भी और विजेता भी, यातना भोगता हुआ, लेकिन उस यातना का द्रष्टा भीएक ऊबड़-खाबड़ ज़मीन, जिस पर उसकी समूची दुनिया बसी है।
  • शब्द व्यक्तियों के बीच सम्प्रेषणीयता स्थापित नहीं करते, बल्कि महज उसे उद्घाटित करते हैं, जो पहले से ही उनके बीच अदृश्य रूप से व्याप्त है।

                                                              
  • कभी-कभी ऐसा होता है कि हम चाहे सत्य को प्राप्त न कर सकें, अपने झूठ को पहचान लेते हैं, उस झूठको उद्घाटित करने का जोख़िम उठा लेते हैं। यह अपने में एक नैतिक कर्म है।
  • कोई भी रचना न पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है, न पूर्ण रूप से उपज, बल्कि जिस सँकरे दरवाज़े से लेखक ख़ुद नहीं गुज़र सकता, उसकी रचना अपने को अदृश्य छाया-सी उस दरवाज़े के अनुकूल समेट कर रास्ता बना लेती है। समेटने की प्रक्रिया में उस अदृश्य ईश्वर का जन्म होता है जिसे हम रूप कहते हैं, उस छाया को गति और प्राण देता और एक मांसल प्रवाह देता हुआ।

  • बन्द करने के लिए कितनी चाभियाँ हैं, खोलने के लिए एक भी नहीं।
  • एक सुख का अभाव कभी दुख का कारण नहीं बनता, उलट एक नये, अपरिचित सुख को जन्म देता है
  • पुराने स्मारक और खँडहर हमें उस मृत्यु का बोध कराते हैं जो हम अपने भीतर लेकर चलते हैं। बहता पानी उस जीवन का बोध कराता है जो मृत्यु के बावजूद वर्तमान है, गतिशील है, अन्तहीन है।

  • इतिहास का यह धर्म है कि वह हर देश को किसी-न-किसी दुनिया के कठघरे में खड़ा कर सके; कलाकार का धर्म है कि वह हर कठघरे से मुक्ति पा कर अपनी प्राथमिक और मौलिक दुनिया में प्रवेश करने का साहस जुटा सके।
  • हमारा असली यथार्थ वही नहीं, जो मैं जी रहा हूँ। हमारा असली यथार्थ हमारे स्वप्नों, हमारी आकांक्षाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे उन विकल्पों के भीतर भी छिपा रहता है जिन्हें हम चुन नहीं सके लेकिन वे हमारे भीतर उतने ही जीवन्त और स्पन्दनशील हैं।
  • पहाड़, भिक्षुक, लामा, फकीर, सूनी दुपहरें...ये ऐसेबिम्ब हैं, जिनके बीच मेरी कल्पना ने अपना परिवेश निर्मित किया था...बचपन के बिम्ब जिन्हें शब्दों में ढालते हुए समूचा जीवन बीत जाता है, और फिर भी लगता है, जो कुछ बना है, उससे बहुत कम है, जो अछूता, बंजर, आकारहीन पड़ा है।
  • साहित्य में अभाव का उतना ही महत्त्व है, जितना कला में अदृश्य का, और संगीत में मौन का...मौनअभाव और अदृश्य के स्थल खाली नहीं हैं...इनमें हमारी कल्पना वास करती है।
  • जब सारे अन्धविश्वास एक सुसंगत शृंखला में जुड़ते हैं, तो वे अन्धे हों, न हों, एक गहरी सांस्कृतिक अर्थवत्ता प्राप्त कर लेते हैं।
                                                                                             
  • तुम यथार्थ को पास रख कर उसका सृजन नहीं कर सकते। तुम्हें उसके लिए मरना होगा, ताकि वह  तुम्हारे लिए जीवित हो सके।
  • मृत्यु कोई समस्या नहीं है, यदि तुमने अपनी ज़िन्दगी शुरू न की हो।
  • जो लोग तुम्हें प्यार करते हैं, वे तुम्हें कभी माफ़ नहीं करते।
  • एक कलाकृति न जड़ है, न वृक्ष- वह भाषा में प्रकृति की लीला है।

  • किसी भी महान कलाकृति का अनुभव- वह चाहे कहानी में हो या महाकाव्य में- अपने पाठक को विस्मृति  के अँधेरे से स्मृति के आलोक में लौटाने का क्षण है।
  • देवता ईर्ष्या करते हैं मनुष्य से, इसलिए कि मनुष्य किसी भी बने-बनाये खेल से बाहर आ सकता हैदेवताओं की बनी-बनायी भूमिका होती है।

  • हम प्रायः लेखक के अकेले क्षणों की चर्चा तो करते हैं, कभी पाठक के एकान्त की बात नहीं करतेजिसके बिना वह कभी साहित्यिक कृति से साक्षात नहीं कर सकता था।
  • जो चीज़ें हमें अपनी ज़िन्दगी को पकड़ने में मदद करती हैं, वे चीज़ें हमारी पकड़ के बाहर हैं। हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं...
  • हमें समय के गुज़रने के साथ-साथ अपने लगावों और वासनाओं को उसी तरह छोड़ते चलना चाहिए जैसे  साँप अपनी केंचुल छोड़ता है और पेड़ अपने पत्तों और फलों का बोझ... जहाँ पहले प्रेम की पीड़ा वास करती थी, वहाँ सिर्फ़ खाली गुफ़ा होनी चाहिए, जिसे समय आने पर संन्यासी और जानवर छोड़कर चले जाते हैं...
  • जीवन में अकेलेपन की पीड़ा भोगने का क्या लाभ यदि हम अकेले में मरने का अधिकार अर्जित न कर सकें? किन्तु ऐसे भी लोग हैं जो जीवन भर दूसरों के साथ रहने का कष्ट भोगते हैं, ताकि अन्त में अकेले न मरना पड़े...

  • हम अपने को सिर्फ़ अपनी सम्भावनाओं की कसौटी पर नाप सकते हैं। जिसने अपनी सम्भावनाओं को  आखिरी बूँद तक निचोड़ लिया हो, उसे मृत्यु के क्षण कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए...
  • कैसी विचित्र बात है, सुखी दिनों में हमें अनिष्ट की छाया सबसे साफ़ दिखाई देती है, जैसे हमें विश्वास न हो कि हम सुख के लिए बने हैं। हम उसे छूते हुए भी डरते हैं कि कहीं हमारे स्पर्श से वह मैला न हो जाए और इस डर से उसे भी खो देते हैं, जो विधाता ने हमारे हिस्से के लिए रखा था। दुःख से बचना मुश्किल है, पर सुख को खो देना कितना आसान है... 
  • जब हम अकेले सड़क पार करते हैं, तो खाली हाथ हवा में डोलता है, पुरानी छुअन की याद में उस अपाहिज की तरह, जिसे मौके-बेमौके अपने कटे अंग की याद आ जाती है- यह एक छोटी-सी मृत्यु है। लोग बहुत धीरे-धीरे मरते हैं...
  • जिसे हम पीड़ा कहते हैं, उसका जीने या मरने से कोई सम्बन्ध नहीं है। उसका धागा प्रेम से जुड़ा होता है, वह खिंचता है तो दर्द की लहर उठती है...
  • मैं जब अकेले में सोचता हूँ- यह मैं हूँ, यह क्षण मेरा है, यह मेरी जगह है; कोई मुझे इससे नहीं छीन सकता... तो एक गहरी राहत और ख़ुशी होती है- मैं स्वतन्त्र हूँ और पूरी तरह अपनी स्वतन्त्रता चख सकता हूँ। किन्तु जिस दिन कोई ऐसा क्षण आएगा, जब मैं यह सोच सकूँगा- कि न यह मैं हूँ, न यह क्षण मेरा है, न मेरी अपनी कोई जगह है, न मैं जीवित हूँ, न मनुष्य हूँ... इसलिए जो नहीं हूँ, उसे कौन मुझसे छीनकर ले जा सकता है? जिस दिन मैं यह सोचूँगा, उस दिन मैं मुक्त हो जाऊँगा, अपनी स्वतन्त्रता से मुक्त, जो अन्तिम गुलामी है। मुक्ति और स्वतन्त्रता में कितना महान अन्तर है...

निर्मल वर्मा का समस्त साहित्य संसार 

वाणी प्रकाशन से ...

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चित्र  (c) गगन गिल 


Monday, 19 March 2018

निषिद्ध | तसलीमा नसरीन


 वाणी के स्त्री-विमर्श 

 तीसरी कड़ी 

निषिद्ध
तसलीमा नसरीन

नारीवाद पश्चिमकी जागीर नहीं है। दबी-पिसी अत्याचारित, असम्मानितअवहेलित स्त्रियों का एकजुट होकर नारी के अधिकार के लिए ज़िन्दगी की बाज़ी लगाकर कठिन संग्राम करने का नाम ही नारीवाद है।तसलीमा नसरीन

 मेल और बेमेल
बहुत लोग देश-विदेश हर जगह सलमान रुश्दी के साथ-साथ मेरा नाम लेते हैं। लेकिन अगर एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच बहुत बड़ा अन्तर होता है तब स्वाभाविक रूप से दूसरा व्यक्ति बहुत अटपटा महसूस करता है। मुझे जब साफ़ तरीके से महिला सलमान रुश्दीका खिताब दिया जाता है- तो मैं सीधा सवाल करती हूँ- सलमान रुश्दी को सीधे-सीधे पुरुष तसलीमा नसरीनक्यों नहीं कह रहे हो- सुनूँ जरा?’ मुझे अच्छी तरह मालूम है कि एक फतवेको छोड़ कर हमारा सभी कुछ बेमेलहै। सलमान रुश्दी पुरुष और मैं स्त्री हूँ। यह बहुत बड़ी भिन्नता है। पुरुष होने की वजह से वे बहुत सी सुविधाएँ पा जाते हैं और औरत होने के नाते, मैं असुविधाएँ भुगतती हूँ। बेमेल चीजों को एक-एक करके बता रही हूँ- फतवा जारी होने के बाद सलमान रुश्दी ने कट्टरपंथियों से माफ़ी माँग ली थी, ‘तौबा करकेखालिस मुसलमान होने का प्रण किया था। मैंने माफ़ी नहीं माँगी। मैं मुसलमान बने रहना भी नहीं चाहती थी। बचपन से ही मैं नास्तिक थी। चाहे कितने आँधी-तूफान आये हों सर ऊँचा कर आज भी वैसी ही नास्तिक हूँ। जिस देश में रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी हुआ था उस ईरान नाम के देश में सलमान रुश्दी कभी नहीं रहे। जिस देश में मुझे फाँसी पर चढ़ाने की माँग को लेकर आतंकवादियों के जुलूस निकले थे, जिस देश में मेरी हत्या करने के लिए असहिष्णु मुस्लिम लोग पगला गये थे, जिस देश में मेरे खिलाफ हुलियाज़ाहिर किया गया था, जिसके फलस्वरूप मुझे महीनों रात के अँधेरे में छुपकर जीना पड़ा, जिस देश में अगर मैं हाथ लग जाती तो मुझे कट्टरपन्थी, संत्रासवादी फाड़ खाते- उसी देश में मैं उस वक्त के उस तांडव के समय सशरीर उपस्थित थी। कट्टरपंथियों और सरकार के सब अत्याचार मुझे अकेले सहने पडे़ हैं। फतवे की वजह से सलमान रुश्दी को किसी ने उन्हें उनके देश से निकाल नहीं दिया था। उन्हें निर्वासन का दण्ड नहीं मिला था। इंग्लैंड रुश्दी का देश है तब भी वे वहीं थे और आज भी वहीं रह रहे हैं। रुश्दी पर कुल मिलाकर सिर्फ़ एक ही फतवाजारी हुआ है। मेरे खिलाफ़ बांग्लादेश से तीन फतवेऔर भारत से पाँच जारी हुए हैं। सभी फतवोंमें सिर की कीमत लगायी गयी है। रुश्दी को किसी देश से देशनिकालानहीं मिला लेकिन मुझे दो-दो देशों से। 

मेरे लेखन की वजह से यह हुआ है। रुश्दी की एक किताब निषिद्ध हुई हैमेरी पाँच किताबें निषिद्ध हुई हैंलज्जा, मेरा बचपन, उतल हवा, द्विखण्डित और वे सब अँधेरे।

धर्म की निन्दा करने पर भी रुश्दी किसी धर्ममुक्त मानवतावादी दल या मानवाधिकार संस्था के साथ जुडे़ हुए नहीं हैं, मैं सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हूँ। व्यक्तिगत जीवन में रुश्दी बहुत नकचढ़े व्यक्ति हैं, मैं इसके पूरी तरह विपरीत हूँ। रुश्दी एक के बाद एक अपनी उम्र से बहुत छोटी कन्याओं से उलझे रहे हैं, उन्हें भोग रहे हैं फिर छोड़ रहे हैं। उनकी बुढ़ापे की पगलाई लालसाको कोई अस्वाभाविकता के रूप में नहीं देखता बल्कि एक समर्थ, कद्दावर सुन्दर प्रेमी के रूप में उन्हें सम्मान मिलता है और ज़्यादातर पुरुषों की नज़रों में वे ईर्ष्या के पात्र बन जाते हैं। और दूसरी तरफ पुरुषविहीनजीवन बिताने पर भी मुझे लेकर तरह-तरह के यौनतापूर्ण किस्से-कहानियाँ लिखी जाती हैं, मुझे वेश्या या बिगड़ी औरतकहने वाले लोगों की कमी नहीं है। यौन जीवन का उपभोग सिर्फ़ पुरुष करेंगे। स्त्रियाँ अगर उपभोग करना चाहें या उपभोग करने के अधिकार की बात करें या लिखें तो वे वेश्याकहलाती हैं। लिखना शुरू करने के आरम्भ से ही लोगों की निन्दा और छिः छिः सुनती आ रही हूँ। स्त्रियों की यौन-स्वतन्त्रता के पक्ष में सवाल उठाकर मैं समाज की दुर्गति को बुलावा दे रही हूँ। रुश्दी के साथ मेरी एक और बढ़िया मेल या बेमेल वाली बात है। रुश्दी को जो लोग अच्छा लेखक कहते हैं उनमें से ज़्यादातर लोगों ने रुश्दी का लिखा पढ़ा ही नहीं। मुझे जो लोग खराब लेखिका कहते हैं, उनमें से ज़्यादातर लोगों ने मेरा लिखा पढ़ा नहीं।



सन् 1993 से रुश्दी के साथ मेरा नाम जोड़ा जा रहा है। ईरानी फतवा जारी होने के बाद रुश्दी एक आलोचित और मशहूर नाम था। इधर मेरे सिर की कीमत घोषित होने के बाद बांग्लादेश और भारत की सीमा के बाहर लोगों को मेरे नाम का पता लगा था। मैं जब बांग्लादेश में अन्तरीनहालत में थी तब यूरोप के लेखकों द्वारा मेरे नाम खुली चिट्ठी लिखने वालों के आन्दोलन में रुश्दी का भी नाम था। इसके बाद जब मुझे देशनिकालादिया गया, निर्वासित जीवन में ही सुना था कि जर्मनी की एक पत्रिका में अपने बारे में मेरे विचार पढ़कर वे गुस्से से आगबबूला हो गये थे। उस पत्रिका में मैंने हताशा प्रकट करते हुए लिखा था कि फतवे से डर के माफी माँगना निश्चित ही एक कायरता भरा आचरण है।

रुश्दी आजकल न्यूयॉर्क शहर में रहते हैं। न्यूयॉर्क में मैं भी रह रही हूँ। लेकिन हमारी मुलाकात होने की कोई सम्भावना नहीं है। अमेरिका के लेखक-कवियों का जो बड़ा संगठन है- फैन क्लब- वे उसके प्रेसिडेंट के पद पर बहाल थे। दो साल से फैन क्लब की तर से विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रताके पक्ष में विशाल अनुष्ठान किया जा रहा है। एशिया और अफ्रीका के विभिन्न लेखकों को बुलाया गया और रीब-रीब सभी लोग अपरिचित हैं। सलमान रुश्दी जानते हैं कि मैं हाल ही में भारत से निकाली गयी हूँ और यहाँ हूँ। मेरी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर जो कुठाराघात हुआ है वह नफरत करने लायक और अविश्वसनीय है। मेरी रीब-रीब सभी किताबें बांग्लादेश में सरकार की ओर से या फिर सामाजिक रूप से निषिद्ध हैं। सिर्फ़ बांग्लादेश से ही नहीं, लिखने की वजह से ही मुझे पश्चिम बंगाल से भी निकाला गया है। सिर्फ़ यही नहीं साढे़ सात महीनें के लम्बे अर्से के लिए मुझे कलकत्ता और दिल्ली में गृहबन्दीया घर में कैदीकी तरह रखा गया है। मुझे खदेड़ने की प्रक्रिया का यह भी एक हिस्सा है। आखिरकार मुझे भारत से निकाल दिया गया। मेरे चमचमाते इतिहास को छल, बल, कौशल से अस्वीकार करके सलमान रुश्दी वाक्-स्वाधीनताका उत्सव मना रहे हैं। वे जो चाहे कर सकते हैं। उनके ही सिक्योरिटी गार्डों में से एक ने उनके विरुद्ध किताब लिखी है। वह किताब छप न पाये इसके लिए उन्होंने प्रकाशक से साठ-गाँठ कर रखी है। हाँ, अब वे ही वाक्-स्वाधीनता यानी बोलने की आजादी का उत्सव मना रहे हैं। वे पुरुष हैं। साठ पार कर लेने पर भी कच्ची उम्र की लड़कियों का लालच करने पर भी लोग उन्हें बुरा-भला नहीं कहते, हालाँकि लड़कियों ने शिकायत की है कि रुश्दी उन्हें यौन वस्तुके अलावा और कुछ नहीं समझते। इतने सब पर भी लोग उन पर अपना नफरत नहीं दागते। ये प्रचण्ड पुरुषवादी लेखक, ढेरों नाम, यश, ख्याति पाने वाले व्यक्ति। उनके साथ मेरे फतवेके मेल के अलावा और कोई मेल नहीं है, सोचकर मुझे सुकून मिलता है, और सच कहूँ तो उनके नाम के साथ कोई मेरा नाम जोडे़ तो मुझे चिढ़ होती है।


एक और नाम के साथ पिछले दो सालों से मेरा नाम काफ़ी लपेटा जा रहा है- वे हैं मबूल फ़िदा हुसैन। बहुत बड़े कलाकार हैं। उनकी कलाकृतियाँ भारत में सबसे ऊँची कीमत पर बिकती हैं। बहुत लोग उनको भारत का श्रेष्ठ कलाकार समझते हैं। सरस्वती की नग्न तस्वीर बनाकर उन्होंने हाल ही में हिन्दू धार्मिक अनुभूतियों पर प्रहार किया है। हिन्दुओं ने उनकी कलाकृति नष्ट कर दी। उनको ललकारा है, धमकी दी है। देश छोड़ने पर वे मजबूर हुए हैं। मैं मनुष्य की बोलने की आजादी पर शत-प्रतिशत विश्वास करती हूँ। मबूल फ़िदा हुसैन जो चाहे बना सकते हैं इसकी स्वतन्त्रता उन्हें है। सिर्फ़ इसी वजह से उन पर अत्याचार करने का किसी को अधिकार नहीं है। मबूल फ़िदा हुसैन जैसे महान कलाकार के साथ मुझ जैसी छोटी-मोटी का नाम जुड़ जाये तो मुझे अटपटा-सा लगा है। छोटी-मोटी ही सही लेकिन मैं अपने आदर्श को बेहद मूल्यवान समझती हूँ। उनके नाम के साथ अपना नाम लिए जाने पर मैं जरा भी पुलकित महसूस नहीं करती। मबूल फ़िदा हुसैन का नग्न सरस्वती का चित्र बनाने को लेकर भारत में जब विवाद शुरू हुआ तब स्वाभाविक तौर पर मैं कलाकार की स्वतन्त्रता की पक्षधर थी। क्योंकि मुसलमानों में नास्तिकों की संख्या न के बराबर है। उनके धर्ममुक्त या नास्तिक होने पर मुझे बहुत तसल्ली मिलती है। इसके बाद मैंने मबूल फ़िदा हुसैन के चित्रों की गहरी खोजबीन यह देखने के लिए किया कि हिन्दू धर्म के अलावा दूसरे किसी धर्म को लेकर, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं। देखा, उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। बल्कि अरबी में अल्लाहू शब्द को उन्होंने बड़ी श्रद्धा से अपने कैनवास में उकेरा। मैं स्पष्ट रूप से देख पाती हूँ इस्लाम में उनका अथाह विश्वास और श्रद्धा है। इस्लाम के अलावा दूसरे किसी धर्म पर उनका विश्वास नहीं है। हिन्दू धर्म के प्रति अविश्वास के कारण ही लक्ष्मी और सरस्वती का नग्न चित्र बनाया है। क्या वे मोहम्मद का नग्न चित्र बनायेंगे? मैं निश्चित कह सकती हूँ, वे कभी नहीं बनायेंगे। वैसे मुझे कोई समस्या नहीं है सब धर्मों के देवी-देवता या पैगम्बरों की नग्न तस्वीर बनाने में। दुनिया के हर धर्म के प्रति मेरा समान विश्वास है। किसी धर्म को दूसरे धर्म से ऊपर जगह दूँगी, एक से नफरत करूँगी, दूसरे धर्म से प्यार करूँगी या उस पर विश्वास करूँगी, यह समस्या मुझे नहीं है। सभी धर्म कहते हैं हमारा धर्म ही श्रेष्ठ है, सत्य है, सही है, गलतियों से रहित है, हमारा ईश्वर ही सचमुच का ईश्वर है, बाकी धर्म गलत हैं। बाकी के ईश्वर गलत हैं। इसी सीख पर पले-बढे़ धर्मान्ध संत्रासवादी बहुत आसानी से ही विधर्मियों पर आक्रमण करते हैं। एक समय था जब ईसाई संत्रासवादियों ने यूरोप में भयंकर संत्रास चलाया था। आज भी गर्भपात के विरोध में रह-रह कर वे हिंसा प्रदर्शन कर रहे हैं। हिन्दू संत्रासवादियों ने हाल ही में आक्रमण किया था, अयोध्या और गुजरात में। मुस्लिम संत्रासवादियों के आक्रमण से भारत ही क्यों सारा विश्व ही बार-बार काँप उठा है।



बूल फ़िदा हुसैन उन सब धार्मिकों की तरह हैं जो अपने धर्म में विश्वास रखते हैं और दूसरों के धार्मिक विश्वास की निन्दा करते हैं। मबूल फ़िदा हुसैन के साथ अपना नाम लिए जाने में मुझे उत्साहित होने का कोई कारण नहीं दिखायी देता, हालाँकि वे एक बहुत विशाल वृक्ष हैं और मैं एक तुच्छ तिनका। कारण मैं नास्तिक हूँ और वे न केवल आस्तिक हैं वरन् सिर्फ़ अपने ईश्वर के नाम पर आस्तिक हैं। इस दुनिया में सैकड़ों दूसरे ईश्वर भी हैं, उन पर विश्वास की बात जब उठती है तो वे ज़ाहिर है, आस्तिक नहीं हैं।

बूल फ़िदा हुसैन के साथ मेरा मेल सिर्फ़ एक बात में ही है। रीब-रीब एक ही समय में मुट्ठी भर धर्मान्धों द्वारा आक्रान्त होकर हम दोनों को देश छोड़ना पड़ा। इसके अलावा और जो कुछ भी है सब बेमेल है। पहली बेमेल बात है- उनका देश छोड़ना अपनी इच्छा से हुआ, और मेरा निर्वासन स्वेच्छा से नहीं हुआ। मुझे कलकत्ता के अपने घर से ही नहीं बल्कि भारत से भी निकाल दिया गया। धर्मान्धों ने नहीं, स्वयं सरकार ने देशनिकाला दिया है। मबूल फ़िदा हुसैन का रिहायिशी घर है विदेश में, मेरा नहीं है। मबूल फ़िदा हुसैन की वापसी के लिए सरकार कोशिश कर रही है। मुझे न तो बांग्लादेश सरकार और न ही भारत सरकार लौटने की इजाजत दे रही है। भारत से निकाली जाने के बाद मैं जितनी बार भारत में रहने के लिए आयी हूँ, पत्र पढ़ते ही मुझे विदा कर दिया गया है। मबूल फ़िदा हुसैन ने एक धर्म के बारे में व्यंग्य किया है, मैंने स्त्री अधिकारों की बात करते हुए सब धर्मों में स्त्री अधिकार विरोधी श्लोकों की समालोचना की है और मूलरूप से जो कहा है वह यह कि समानाधिकार की नींव पर कानून बने। स्त्री-विरोधी कानून और संस्कृति खत्म हो। धर्म की समालोचना करते समय मैं सब धर्मों की समालोचना करती हूँ- अपने सगे-सम्बन्धियों के धर्म-इस्लाम को बचाकर- समालोचना नहीं करती।



सलमान रुश्दी और मबूल फ़िदा हुसैन की तरह नाम, यश, ख्याति, दबदबा मेरे पास नहीं है, फिर मैं नहीं चाहती कि उनके नाम के साथ मेरा नाम लिया जाये। धर्मान्ध और क्षमतावान सरकार द्वारा लम्बे अर्से से मैं जिस तरह सताई जा रही हूँ- इनमें से किसी ने भी उसका थोड़ा-सा हिस्सा भी नहीं भुगता। जिस तरह बेघर हालत में अनिश्चयता के अँधेरे में दिन-ब-दिन मुझे विदेश और अनजान जगहों में समय काटना पड़ रहा है, बीमारी और तंगी में जिन्दा रहने की लड़ाई मुझे अकेले ही लड़नी पड़ रही है, एक साथ ही अपने आदर्श और विश्वास के लिए संग्राम करना पड़ रहा है, यह कोई आसान बात नहीं है। सलमान रुश्दी और मबूल फ़िदा हुसैन को इस असहनीय हालात के आस-पास भी नहीं फटकना पड़ा। उनकी कला के प्रति अपनी अपार श्रद्धा रखते हुए ही मैं कहती हूँ कि इन दो पुरुषों के साथ मुझे एक ही वर्ग में रखना अनुचित है। धर्ममुक्त, ऊँच-नीच रहित, साम्य और समानाधिकार की नींव पर खडे़ समाज के लिए मेरा निरन्तर संग्राम लोग चाहे जिस नजरिये से देखें- मेरे आसपास फटकने की भी योग्यता उनमें नहीं है, चाहे वे कितने ही बडे़ कलाकार क्यों न हों।

तसलीमा नसरीन 
अनुवाद : सांत्वना निगम
सम्पादन : विमलेश त्रिपाठी 

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