Wednesday, 27 December 2017

सलीम आरिफ़/तेरा बयान ग़ालिब



तेरा बयान ग़ालिब


रात को अकसर होता है, परवाने आकर
टेबल-लैम्प के गिर्द इकट्ठे  हो जाते हैं
सुनते हैं, सर धुन्ते हैं
सुनके सब अशर ग़ज़ल के
जब भी मैं दीवाने ग़ालिब खोल के पढ़ने बैठता हूँ
सुबह फिर दीवान  के  रौशन सफ़हों  से
परवानों की राख उठानी पड़ती है !!
               -गुलज़ार

लेखक के शब्दों में 

भूमिका से... 

मिर्ज़ा ग़ालिब से मेरा तआर्रु/परिचय बचपन से रहा है। लखनऊ में होश सँभाला तो उनका कहा कुछ ना कुछ कान में पड़ जाता था। घर में अक्सर उनका कोई शेर कभी अपने पिताजी से, या माँ से, या कभी किसी मेहमान के मुँह से सुनते रहते थे। हमारे घर में दीवान-ए-ग़ालिब की दो-तीन किताबें थीं, जिन्हें कभी-कभी पढ़ लेते थे। वह हमारे बीच होते हुए भी हमारे सामने नहीं थे, फिर उनसे पूरा परिचय हुआ कॅालेज में। जब अक्सर शेक्सपियर या किसी दूसरे अंग्रेज़ी शायर को समझाते हुए हमारे प्रोफ़ेसर राज बिसरिया साहब ग़ालिब का कोई मिस्रा प्रस्तुत कर देते थे। इसी तरह उनका कोई-न-कोई शेर या लतीफ़ा हमे सुनने को मिल जाता।

अस्तित्ववाद को भी क़ैद-ए-हयातके सहारे समझना या नींद क्यों रात भर नहीं आतीया फिर ज़ारों ख़्वाहिशें ऐसीजैसे मिस्रों ने मुझे ग़ालिब की तर खींचा। फिर दिल-ए-नादाँ वाली उम्र आयी और इश्क़ ने निकम्मा कर दिया। मगर ग़ालिब वहाँ भी काम आते रहे। उनके शेर अक्सर नाज़ुक और मुश्किल मौक़ों पर काम आ जाते। मिर्ज़ा ग़ालिब की महानता उनके हर आने वाली नस्ल और समय के समकालीन और सम-समयक बन जाने में है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नयी दिल्ली में प्रशिक्षण के दौरान भी ग़ालिब से लगातार रिश्ता बना रहा।

बम्बई आया ही था कि अरुण कौल साहब ने आकर मुलाक़ात की और मुझसे और नितीश रॉय (कला निर्देशक) को कहा कि गुलज़ार साहब मिलना चाहते हैं,  ग़ालिब पर धारावाहिक बना रहे हैं। उस समय मैं श्याम बेनेगल की भारत एक खोजकी रिसर्च और वेशभूषा की तैयारी में लगा था। गुलज़ार साहब से मिला और उन्होंने बड़े प्यार और एहतराम से हम दोनों को मिर्जा ग़ालिबधारावाहिक में शामिल होने की पेशकश की। उसकी वेशभूषा की तैयारी करते हुए ग़ालिब और उनके समय को और रीब से जानने का मौक़ा मिला। उस दौरान उनके ख़तों का ज़िक्र होता रहता था। गुलज़ार साहब ने बहुत से दृश्य और किरदार उन ख़तों के हवाले से धारावाहिक में इस्तेमाल किये थे। मेरे ससुर जाने-माने लेखक जावेद सिद्दीक़ी  साहब और शमा ज़ैदी भी उन ख़तों का ज़िक्र अक्सर करती रहती थीं। मैंने उन ख़तों को ढूँढ़ कर पढ़ा। पहले मलिक राम साहब और बाद में ख़लीअंजुम साहब के तैयार किये हुए सम्पादन में, ‘मिर्ज़ा ग़ालिबके मुख़्तलिफ ख़तों के बहुत से अलग-अलग हिस्सों को जोड़ कर मैंने उन्हें एक  मौज़ूँ  और थीम के हिसाब से जोड़ा। फिर उस ख़त के कथ्य के हिसाब से ग़ल चुन कर उन्हें एक कड़ी में पिरोकर एक स्क्रिप्ट बनायी। 2002 में ग़ालिब के ख़तों पर आधारित एक स्टेज शो करने की सोची, जो नाटक न होते हुए भी नाट्कीय हो। ये पहली बार होने जा रहा था कि ग़ालिब के ख़त रंगमंच पर पढ़े जा रहे थे। जावेद सिद्दीक़ी साहब ने उसे ग़ालिबनामाका नाम दिया। मैं उस स्टेज शो में ग़ालिब के ख़त के हिस्से पढ़ता था और जसविन्दर सिंह उनकी ग़ज़लें गाते थे, जिन्हें कुलदीप सिंह साहब ने संगीतबद्ध किया था। ये शो बहुत क़ामयाब रहा और हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों में हुआ। और उसके बाद न्यूयॉर्क में Alice Tully हॉल में 2004 में भी भारतीय विद्या भवन ने इसे पेश किया। उर्दू और हिन्दी रंगमंच पर ये अपनी तरह का बिल्कुल नया तजुर्बा था। इसके बाद तो ग़ालिबनामाकी तर्ज़ पर फ़ैज़, अमीर ख़ुसरो, क़ैफ़ीमी और दूसरे शायरों पर स्टेज शो होने लगे। मौलाना आज़ा, टैगोर, महात्मा गाँधी और दूसरी मशहूर शख़्सियतों के ख़तों को विषय बनाकर नाटक होने लगे। उर्दू शायरों को रंगमंच पर ग़ालिबनामाके बाद उसी अन्दा में पेश करने का एक नया सिलसिला चल पड़ा जो बहुत अच्छी बात है।

अपने सत्तरवें साल में जगजीत सिंह साहब, ‘मिर्ज़ा ग़ालिब की कुछ नयी ग़लें रिकॉर्ड करना चाह रहे थे। और उन्होंने मुझे बुलाकर उसमें शामिल होने की दावत दी। वो चाहते थे कि ग़ालिब को पेश करने का कुछ नया तरीक़ा सोचा जाये। ग़ालिबनामाके बारे में उन्होंने बहुत सुन रखा था, मगर देख नहीं पाये थे। हम लोग ग़लें चुन रहे थे और रिकॉर्डिंग की तैयारी हो रही थी, कि जगजीत भाई अचानक हमसे जुदा हुए और ग़ल गायकी की दुनिया में बहुत बड़ी ख़ला छोड़ गये। उनका अधूरा सपना अधूरा रहा इसका असोस ज़िन्दगी भर रहेगा और ये ख़याल भी कि ग़ालिब की बहुत-सी और ग़लें उनकी आवाऔर धुनों में लोगों तक नहीं पहुँच पायीं।

तब ये ख़याल आया कि इससे अच्छी श्रद्धांजलि क्या होगी कि उनकी गायी ग़लों को ख़तों के साथ पेश किया जाये। गुलज़ार साहब को भी जगजीत भाई के साथ प्रोजेक्ट में शामिल होना था, मैंने उन्हीं से गुज़ारिश की कि वो ग़ालिब के ख़त अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड कर दें और इस तरह दुनिया की दो बेहतरीन आवाज़ें एक साथ ग़ालिब की आवाज़ बन कर ग़ालिब के कलाम और उनके ख़तों को पेश कर सकीं। इसे राजेश कुमार सिंह ने बहुत प्यार से अपने स्टूडियो में रिकॉर्ड किया। सा...रे...गा...मा ने सीडी की शक्ल में जो पेश किया, गुलज़ार साहब ने उसे तेरा बयान ग़ालिब का नाम दिया।

अरुण माहेश्वरी जी ने जब ग़ालिब के ख़तों पर किताब छापने की पेशकश की तो लगा कि इसका किताबी रूप भी शायद ग़ालिब के चाहने वालों को पसन्द आये। मैं सतेन्द्र कुमार साहब का शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने इसको देवनागरी में डिजिटलाईज्ड करने में मदद की और अपना कीमती समय देकर इसे किताब की शक्ल तक पहुँचाया।
मिर्ज़ा ग़ालिबकी 147वीं बरसी के मौक़े पर इसे किताब के रूप में देख कर जगजीत सिंह भाई की कमी बहुत बुरी तरह से महसूस हो रही है। ग़ालिब की शायरी पर अपनी आवा की इतनी गहरी छाप आज तक किसी ने नहीं छोड़ी। गुलज़ार साहब ने मिर्ज़ा ग़ालिबधारावाहिक बनाते हुए उस समय के सबसे समृद्ध कलाकारों को जोड़ा था। जगजीत सिंह, नसीरूद्दीन शाह, मनमोहन सिंह (छाया चित्रकार), नरिन्दर सिंह (ध्वनि संयोजन), नितीश रॉय (कला निर्देशक) ने मिलकर उस काल और उस समय को इस तरह से पेश किया था कि आज 30 साल बाद भी उसकी छाप लोगों के मन में गहरी बैठी हुई है। श्रीमती तन्वी आमी ने बेगम उमराव और नीना गुप्ता ने डोमनी के किरदारों को बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया। ये अनायास नहीं है कि नसीरूद्दीन शाह ग़ालिब का चेहरा और जगजीत सिंह उनकी आवाज़ आज तक बने हुए हैं। गुलज़ार साहब की रहबरी में मिर्ज़ा ग़ालिबधारावाहिक ने ग़ालिब को घर-घर तक पहुँचाया और उन्हें कई सौ साल की नयी ज़िन्दगी दी है। तेरा बयान ग़ालिबकी यह किताब उस धारावाहिक के बा-कमाल कलाकारों को समर्पित है।
1 फरवरी, 2016
सलीम आरिफ़


मिर्ज़ा ग़ालिब


मिर्ज़ा ग़ालिब से सलीम आरिफ़ का तआर्रुफ़/परिचय बचपन से रहा है। लेखक ने लखनऊ में होश सँभाला तो ग़ालिब साहब का कहा कुछ कुछ कान में पड़ जाता था  लेखक अपने घर में अक्सर उनका कोई शे कभी अपने पिता जी  से, या माँ से, या कभी किसी मेहमान के मुँह से सुनते रहते थे उनके घर में दीवाने--ग़ालिब की दो-तीन किताबें थीं, जिन्हें कभी-कभी वे  पढ़ लेते थे ग़ालिब लेखक के बीच होते हुए भी उनके सामने नहीं थे, फिर ग़ालिब से उनका पूरा परिचय हुआ कॉलेज में

अस्तित्ववाद को भी 'क़ैद--हयात' के सहारे समझना या 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' या फिर 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' जैसे मिस्रों ने सलीम आरिफ़ को ग़ालिब की तरफ़ खींचा | फिर दिल--नादाँ वाली उम्र आयी  और इश्क़ ने निकम्मा कर दिया | मगर ग़ालिब उनके वहाँ भी काम आते रहे | उनके शे अक्सर नाज़ुक और मुश्किल मौक़ों पर काम जाते थे |
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मिर्ज़ा साहबबरसों से ख़ुतूत फ़ारसी में लिखने छोड़ दिये,
मैंने वो अन्दाज़े-तहरीर इजाद किया है के मुरासले को
मुकालमा बना दिया है  हज़ारों कोस से -ज़बान--क़लम
बातें किया करो  हिज्र में विसाल के मज़े लिया करो 
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सलीम आरिफ़
ये सगे-दुनिया कि असद कहलाता है,
और तख़ल्लुस अपना ग़ालिब बताता है,
और  खुद अहले-हिन्द का  मग़्लूब है
नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, नयी दिल्ली से स्नातक सलीम आरिफ़ भारतीय रंगमंच और फ़िल्मों के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम है। 1985 और 1986 के गणतंत्र दिवस परेड में आपनेड्रम्स ऑफ़ इंडियाऔरविंड्स इंस्ट्रुमेंट्स ऑफ़ इंडियामें कोरियोग्राफर निर्देशक के रूप में अपनी छाप छोड़ी 1986 मेंअपना उत्सवकार्यक्रम मेंगूँजते पत्थरमें आलोचकों की प्रशंसा भी पायी सलीम आरिफ़ को श्याम बेनेगल का 'भारत एक खोज', गुलज़ार का 'मिर्ज़ा ग़ालिब' और चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के 'चाणक्य' जैसे धारावाहिकों से फ़िल्म डिजाइनर के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली     
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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े-गुफ़्तगू क्या है
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