Saturday, 22 September 2018

बच्चों की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए - मैनेजर पाण्डेय



बच्चों की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए

(मैनेजर पाण्डेय से प्रमोद तिवारी की बातचीत)


प्रमोद तिवारी: हिन्दी में पत्रिकाएँ पर्याप्त संख्या में निकल रही हैं और कविता, कहानी, प्रेम आदि के उनके विशेषांक भी खूब निकल रहे हैं परन्तु भाषा को लेकर हिन्दी समाज में एक उदासीनता का भाव मिलता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में जहाँ भाषा रोजी-रोटी ही नहीं राज्य और राजनीति का भविष्य भी तय करती है वहाँ भाषा के प्रति इस उपेक्षित रवैये का क्या कारण है?

मैनेजर पाण्डेय: यह जितना आश्चर्यजनक है उतना ही चिन्ताजनक भी कि आज के समय में साहित्य के प्रसंग में भाषा-चिन्ता बहुत कम दिखाई देती है। यही नहीं कि हिन्दी की पत्रिकाओं में हिन्दी भाषा के वर्तमान और भविष्य या हिन्दी क्षेत्र की लोकभाषाओं के वर्तमान और भविष्य की स्थितियों के बारे में कोई लेख, कोई विचार-विमर्श इन पत्रिकाओं में दिखाई नहीं देता बल्कि यह भी है कि साहित्य की विभिन्न विधाओं में भाषा के प्रयोग के विभिन्न रूपों-पक्षों और भंगिमाओं के विवेचन-विश्लेषण का भी कोई विशेष प्रयास नहीं दिखाई देता।
अगर मैं गाँव के मुहावरे में कहूँ तो हिन्दी लगभग गरीब की जोरूकी तरह है जो गाँव भर की भौजाई होती है। इसके साथ जिसको जैसा उचित लगता है वह वैसा व्यवहार करता है। साहित्य की दुनिया में सक्रिय सभी लोग जानते हैं कि यह मूलतः भाषिक कला है और उसी भाषा की कोई चिन्ता नहीं है। यही नहीं भाषा का मामला सांस्कृतिक मामला भी है और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश को ध्यान में रखें तो राजनीतिक मामला भी है, इस सबके साथ महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि जब से हिन्दुस्तान में पूँजीवाद के भूमण्डलीकरण की आँधी आयी है तब से अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं को दबाती-कुचलती चल रही है। इस सन्दर्भ में मुझे याद आता है कि रमेश उपाध्याय ने कथन पत्रिका का एक अंक भाषायी साम्राज्यवादपर केन्द्रित किया था। किसी और पत्रिका का कोई अंक भाषा पर केन्द्रित हो यह मुझे याद नहीं। इसलिए भाषा की उपेक्षा की चिन्ता तो जायज है।

प्रमोद तिवारी: इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण यह है कि भाषा के दार्शनिक-आध्यात्मिकपक्ष का चिन्तन भारत में बहुत हुआ है परन्तु उसके समाजशास्त्राीय पक्ष पर उतनी सामग्री नहीं मिलती। अकादमिक संस्थानों में भाषा के तकनीकी पहलुओं पर ज्यादा काम मिल जाता है परन्तु इस पर नहीं मिलता कि बारीकी के साथ पूरी सामाजिक संरचना को भाषा कैसे प्रभावित करती है?

मैनेजर पाण्डेय: सारी दुनिया में भाषा सम्बन्धी चिन्तन का आरम्भिक दौर धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टियों के तहत ही हुआ, भारत में भी और पश्चिम में भी। फिर सारी दुनिया में आधुनिक काल में भाषा सम्बन्धी चिन्तन सामाजिक हुआ। आप हिन्दुस्तान और हिन्दी क्षेत्र को ध्यान में रखें तो आजादी के समय भाषा का सवाल राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल बना इसलिए वह राजनीतिक सवाल भी था और सांस्कृतिक भी। इसी काल में वह सामाजिक सवाल भी बना। जो लोग भाषा के आधुनिक रूप के निर्माता हैं- भारतेन्दु से लेकर प्रेमचन्द तक वे भाषा के सवाल को सामाजिक प्रक्रिया से जोड़ते थे इसके असंख्य उदाहरण हैं।

बाद के दिनों में भाषा के स्वरूप की व्याख्या करने का काम राहुल जी, किशोरीदास वाजपेयी और सबसे अधिक डॉ. रामविलास शर्मा ने किया। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि भाषा के सामाजिक पक्ष पर काम ही नहीं हुआ। अब आज के लोग उस पर ध्यान ही न दें तो ये लोग क्या करेंगे। राम विलास शर्मा जी ने भाषा और समाजनाम से किताब लिखी, यही नहीं वे किसी रचना का विश्लेषण करते हैं तो उसकी भाषा, संरचना और सामाजिकता का ध्यान रखते हैं। समस्या यह है कि आज इन पर ध्यान कम दिया जा रहा है।

प्रमोद तिवारी: मार्क्सवादी चिन्तकों ने समाज के स्वरूप के प्रसंग में आधार और अधिरचना को लेकर काफी बात की है। इसमें भाषा की स्थिति क्या होती है?

मैनेजर पाण्डेय: एक तो भाषा के बारे में आधार और अधिरचना के रूपक के अन्तर्गत विचार करने की प्रक्रिया ही मुझे उचित नहीं लगती। उस रूपक की समस्याओं और कठिनाइयों के बारे में रेमण्ड विलियम्स ने विस्तार से लिखा है जिसे मैं दोहराना नहीं चाहता। अगर उस रूपक को ध्यान में रखते हुए ही कहूँ तो मुझे लगता है कि भाषा आधार से भी जुड़ी होती है और अधिरचना से भी। कार्ल मार्क्स ने भाषा को व्यावहारिक चेतनाकहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि भाषा के बिना विचार का अस्तित्व नहीं हो सकता। मार्क्स के इन दोनों कथनों को ध्यान में रखिए तो यह स्वाभाविक निष्कर्ष निकलेगा कि भाषा मनुष्य के जीवन व्यवहार का अनिवार्य और अविभाज्य अंग है। मार्क्स के ही अनुसार मनुष्य समाज और संसार में तीन तरह का व्यवहार करता है- आर्थिक व्यवहार, राजनीतिक व्यवहार और विचारधारात्मक व्यवहार। इन तीनों में भाषा की अनिवार्य और सक्रिय भूमिका होती है। मैं तो यह भी कहूँगा कि भाषा के बिना न तो समाज बन सकता है और न ही मनुष्य की सामाजिकता का विकास हो सकता है। इसलिए भाषा को आधार और अधिरचना में से किसी एक में रखना उचित नहीं है।

प्रमोद तिवारी: भाषा के वर्ग चरित्रा को स्तालिन ने नकारा था। आज स्त्री भाषा, दलित भाषा और भाषा के वर्ग चरित्रा की बात हो रही है। आपके इस बारे में क्या विचार हैं?

मैनेजर पाण्डेय: भाषा के वर्ग से जुड़े होने और न होने पर एक जमाने में सोवियत संघ में बहसें हुई थीं। मैं उन बहसों के इतिहास में नहीं जाना चाहता क्योंकि उन्हें उपयोगी भी नहीं मानता। असल में भाषा के साथ वर्ग या हिन्दुस्तान के सम्बन्ध में वर्ण का सम्बन्ध भाषा के प्रयोग में दिखाई देता है। भाषा के स्वभाव में वह हो, यह जरूरी नहीं है। जो लोग जिस उद्देश्य और विचारधारा से भाषा का प्रयोग करते हैं वे लोग अपने उद्देश्य और विचारधारा के अनुकूल भाषा को बनाते-बिगाड़ते भी हैं। इसलिए आज के जमाने में स्त्री भाषा और दलित भाषा की बात करना उचित ही है क्योंकि ये दोनों समुदाय जिस भाषा को जानते हैं, जिसको वो सहते हुए जीते-मरते हैं उस भाषा का कई बार अपनी जिन्दगी के अनुभवों की अभिव्यक्ति के लिए उपयेाग करते हैं। मैं हिन्दी क्षेत्रा की एक वास्तविकता की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहता हूँ। कहावतों और मुहावरों में किसी भाषा क्षेत्र के लोकमत की अभिव्यक्ति होती है। हिन्दी क्षेत्र की लोकभाषाओं में और हिन्दी में भी ऐसी असंख्य कहावतें और मुहावरे हैं जो स्पष्ट रूप से जातिवादी और दलित विरोधी हैं। उसी तरह से स्त्री विरोधी कहावतें और मुहावरे भी हिन्दी क्षेत्र की लोकभाषाओं और स्वयं हिन्दी में भी मौजूद हैं। इन मुहावरों और कहावतों का विस्तार से विवेचन कर के यह बताया जा सकता है कि भाषाओं का वर्गीय और जातीय चरित्र क्या होता है और कैसे बनता है। यही नहीं भाषा और विचारधारा के अन्तरंग सम्बन्ध का विश्लेषण कीजिए तो मालूम होगा कि भाषाओं का प्रयोग वर्गीय प्रयोजनों के लिए होता है जिससे भाषाओं का वर्गीय चरित्र भी बनता है।

प्रमोद तिवारी: मीडिया इस बात को बार-बार दोहराती रही है कि आज के समय में किसी देश की एक ही भाषा (नेशनल लैंग्वेज) रहेगी और विकास के साथ शेष सारी भाषाएँ समाप्त हो जाएँगी, सिर्फ एक विश्वभाषा (अंग्रेजी) बचेगी। एक भाषा क्या एकध्रुवीय दुनिया को और मजबूत नहीं बनाएगी? इसे आप किस रूप में देखते हैं?

मैनेजर पाण्डेय: एक तो अगर मीडिया की ओर से ऐसा कहा जाता है तो यह एक कल्पना ही है। न वर्तमान की सच्चाई है न भविष्य की सच्चाई होने वाली है। पूँजीवाद के भूमण्डलीकरण का जो अभियान हिन्दुस्तान में पिछले 20 वर्षों से चल रहा है वह दुनिया के बहुत सारे देशों में 50 वर्षों से अधिक समय से चल रहा है। उस भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के बावजूद दुनिया के सभी देशों की अपनी-अपनी भाषाएँ हैं, स्वयं यूरोप में हर देश की अपनी राष्ट्रीय भाषा है और उसके साथ ही अनेक देशों में क्षेत्रीय भाषाएँ भी हैं। स्वयं इंग्लैण्ड में अंग्रेजी के अलावा कई भाषाएँ हैं इसलिए यह भ्रम के अलावे कुछ नहीं है कि पूँजीवाद के भूमण्डलीकरण के किसी भी दौर में दुनिया की सारी भाषाएँ नष्ट हो जायेंगी और केवल एक भाषा रहेगी। यह जरूर है कि पूँजीवाद बाजार के लिए उपयोगी भाषा को प्रश्रय देता है और बढ़ावा भी देता है और बाजार का सम्बन्ध खरीददारों से होता है जो किसी न किसी भाषा में अपना जीवन जीते हैं। इसलिए बाजार उन भाषाओं को भी स्वीकार करता है जो विभिन्न क्षेत्रों के खरीददारों की जिन्दगी की भाषा होती है। यह अकारण नहीं है कि भूमण्डलीकरण के दौर में भोजपुरी बड़े पैमाने पर मीडिया और फिल्म की भाषा के रूप में आगे बढ़ रही है। इसका भी सम्बन्ध बाजार से है और उपभोक्तावाद से भी। वह जरूर है कि पूँजीवाद भाषाओं की बहुलता के बदले एक भाषा के प्रभाव के विस्तार को उपयेागी समझता है। लेकिन एक भाषा का अस्तित्व और प्रश्न केवल बाजार तक सीमित नहीं होता उसका सम्बन्ध मनुष्य की जिन्दगी, उसके अनुभव, उसकी कल्पना, उसके सोच-विचार और उसकी संस्कृति से भी होता है। इसलिए मैं यह समझता हूँ कि भूमण्डलीकरण के कारण भारत में भाषाओं की बहुलता संकटग्रस्त तो है लेकिन वह बहुलता कभी समाप्त हो जाएगी यह सम्भावना मुझे दिखाई नहीं देता।

प्रमोद तिवारी: भाषा विशेष (अंग्रेजी) के वर्चस्व में टेक्नोलॉजी (मोबाइल, कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि) की भूमिका प्रमुख होती जा रही है। टेक्नोलॉजी कुछ भाषाओं को प्रश्रय देती है। इसके कारण विकसित लोगों की भाषा (और खुद वे भी) और विकसित तथा पिछड़े लोगों की भाषा और पिछड़ती जा रही है। ऐसे में टेक्नोलॉजी से वंचित लोगों के सामने क्या रास्ता है?

मैनेजर पाण्डेय: भाषा भी अनेक सन्दर्भों में एक टेक्नोलॉजी ही है। प्रकृति से, जीवन से और समाज से जुड़ने तथा जोड़ने की टेक्नोलॉजी। इसलिए भाषा को टेक्नोलॉजी से जोड़कर देखिए तो मालूम होगा कि दोनों के बीच एक द्वन्द्वात्मक, गतिशील और विकासशील सम्बन्ध होता है। जिस टेक्नोलॉजी का, जिस भाषा में पहले आविष्कार होता है, उस भाषा में पहले उसका प्रसार होता है। फिर दूसरी भाषाओं में उसका विस्तार होता है। आप जिस इंटरनेट, मोबाइल आदि की बात कर रहे हैं वह आज की दुनिया में लगभग सभी विकासशील देशों की भाषाओं में मौजूद है इसलिए कुछ लोगों की सुविधा को भाषा की टेक्नोलॉजी का सिद्धान्त न माना जा सकता है न बनाया जा सकता है। टेक्नोलॉजी का विस्तार जरूरत के कारण होता है और जो भाषाएँ या जिन भाषाओं के प्रयोगकर्त्ता टेक्नोलॉजी के जिस रूप की जरूरत समझते हैं उसको अपनी भाषा में विकसित करते हैं। आप इसे टाइपिंग से लेकर इंटरनेट तक के हिन्दी में विस्तार को देखकर समझ सकते हैं।

प्रमोद तिवारी: भारत की भाषिक विविधता एक समस्या के रूप में देखी जाती है। अगर हम हिन्दी और लोकभाषाओं के सम्बन्ध को देखें तो आज कुछ लोग हिन्दी पर भी वर्चस्ववादी होने का आरोप लगाते हैं। यह कहाँ तक सही है?

मैनेजर पाण्डेय: हिन्दी क्षेत्र के लिए यह एक विचारणीय सवाल जरूर है कि हिन्दी का उसकी लोकभाषाओं से क्या सम्बन्ध हो। इसके दो अतिवादी छोर हैं, एक छोर पर वे लोग हैं जो हिन्दी से स्वतन्त्र लोकभाषाओं के अस्तित्व और महत्त्व को स्वीकार ही नहीं करते, दूसरे छोर पर वे लोग हैं जो हिन्दी के विरोध में लोकभाषाओं की लड़ाई लड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि हिन्दी की ताकत हिन्दी क्षेत्र की लोकभाषाएँ ही हैं। जिस भक्ति काव्य को हिन्दी साहित्य का सर्वोत्तम काव्य माना जाता है वह लोकभाषाओं का ही काव्य है। इसीलिए कभी नागार्जुन ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर लिखी अपनी कविता में कहा था-

हिन्दी की है रीढ़ गँवारू बोली
यह भावना तुम्हीं ने हममें घोली

नागार्जुन की बात मानें तो हिन्दी क्षेत्रा की लोकभाषाएँ हर दृष्टि से हिन्दी की रीढ़ हैं। हिन्दी के सृजनात्मक विकास के भाषा सम्बन्धी तीन स्रोत हो सकते हैं और हैं भी- एक स्रोत है हिन्दी क्षेत्रा की लोकभाषाएँ, दूसरा स्रोत है संस्कृत भाषा और तीसरा स्रोत है अंग्रेजी। यह हिन्दी के रचनाकारों और लेखकों को तय करना चाहिए कि वे इन तीनों स्रोतों में से किस स्रोत से शक्ति ग्रहण करना चाहते हैं। उनके इस निर्णय पर ही उनके साहित्य का भविष्य निर्भर होगा। अगर हिन्दी साहित्य को हिन्दी क्षेत्र की जनता का साहित्य बनाना है तो उसे लोक भाषाओं से जुड़ना ही होगा। सवाल यह भी है कि हिन्दी से स्वतन्त्र इन लोकभाषाओं में साहित्य सृजन लम्बे काल से होता आ रहा है और आज भी हो रहा है। अगर उस रचनाशीलता की रक्षा और विकास की चिन्ता हिन्दी वालों के मन में नहीं होगी तो हिन्दी के प्रति विरोध का भाव लोकभाषा के लेखकों और रचनाकारों में जरूर पैदा होगा। इसलिए अंग्रेजी के बढ़ते प्रभुत्व और प्रभाव से हिन्दी और हिन्दी क्षेत्रा की लोकभाषाओं की रक्षा के लिए हिन्दी और उसकी लोकभाषाओं के बीच एकजुटता जरूरी है। आपसी विरोध, विद्वेष और विग्रह से हिन्दी का भी नुकसान होगा और लोकभाषाओं का भी।

प्रमोद तिवारी: किसी देश की भाषा नीति की शिक्षा, भाषिक विकास और सामाजिक विकास में बड़ी भूमिका होती है। अध्ययन बताते हैं कि प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा न केवल भाषा को बचाती है बल्कि छात्रों के ज्ञान और उनके शैक्षिक विकास की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण होती है। भारत के आदिवासी एवं अन्य पिछड़े क्षेत्रों में मातृभाषाओं में शिक्षा के अभाव का उनके सामाजिक विकास पर उल्टा असर पड़ रहा है। मातृभाषाओं में शिक्षा की बात राहुलजी और लोहियाजी करते रहे हैं, परन्तु इसे लेकर कोई ठोस नीति नहीं बन पायी, इसके क्या कारण रहे?

मैनेजर पाण्डेय: राहुलजी और लोहिया ही नहीं दुनिया के और भी बडे़ लोग (रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी) मानते और लिखते रहे हैं कि बच्चे का स्वाभाविक विकास अपनी मातृभाषा में होता है इसलिए हमेशा मुझे लगता है कि उनकी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में, माध्यमिक शिक्षा राष्ट्रभाषा में और उच्च माध्यमिक के बाद की शिक्षा के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय भाषा को भी सीखना चाहिए। हिन्दुस्तान में यह पद्धति बिल्कुल उलट गयी है। यहाँ जो ज्ञान आयोग बना, जिसे कुछ लोग ठीक ही अज्ञान आयोग कहते हैं, यहाँ शुरुआती शिक्षा ही अंग्रेजी में शुरू हो रही है। इससे एक तो उनका स्वाभाविक विकास नहीं होगा, दूसरे वे अपनी भाषा को हिकारत से देखेंगे और तीसरे स्तर पर वे हिन्दी को भी न सीखेंगे न सीखने की कोशिश करेंगे। हमारे भविष्य के नागरिक स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय होने लगेंगे और उससे पहले अन्तरराष्ट्रीय होने की कोशिश करेंगे।

यह एक विचित्र और विडम्बनापूर्ण स्थिति है पर यह भी सच है कि हम या आप या हमारे जैसे और लोग या हमारे पूर्वज राहुलजी, लोहिया या टैगोर केवल अपनी सोच-विचार का सच ही कह सकते हैं। लेकिन बच्चों का भविष्य और उनके साथ ही देश का भविष्य तो सत्ताओं, सरकारों और राजनीतिज्ञों के हाथ में है। वे जो चाहेंगे वही करेंगे और वही होगा।

प्रमोद तिवारी: भारत में लिपि भेद ने भाषा भेद का और भाषा भेद ने धर्म भेद का रूप लिया जिसने देश को बाँटने में बड़ी भूमिका निभायी है। इस दृष्टि से भाषा विकास में लिपि की भूमिका को किस रूप में देखते हैं?

मैनेजर पाण्डेय: हमारे देश में भाषाएँ तीन स्थितियों में हैं। आदिवासी समुदायों की कुछ ऐसी भाषाएँ हैं जो केवल बोलचाल के स्तर पर जीवित हैं, उनके पास अपनी कोई लिपि नहीं है। दूसरी स्थिति वह है जिसमें आदिवासी क्षेत्र में ही कुछ भाषाओं की लिपियाँ हैं पर उनमें मुद्रण की व्यवस्था नहीं है। तीसरी स्थिति में वे भाषाएँ हैं जिनकी लिपियाँ हैं और जिनमें मुद्रण की व्यवस्था भी है। लिपि और भाषा का अन्तरंग सम्बन्ध होता है इसलिए मैं इस बात का समर्थन नहीं करता कि उर्दू को फारसी लिपि के बदले नागरी लिपि में लिखने का अभियान चलाया जाये या फिर हिन्दी-उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखने का प्रयास किया जाये। इसलिए यह दीवाली या ईद के पटाखे और फुलझड़ी की तरह सनसनी पैदा करने के खयाल से कुछ लोग सारी भाषाओं को एक ही लिपि में लिखने की बात करते हैं। हिन्दुस्तान में इस पर 40-50 साल पहले गम्भीर बहसें हो चुकी हैं और उन बहसों के बावजूद विभिन्न भाषाओं की अपनी लिपियाँ हैं। कभी-कभी एक ही लिपि के विभिन्न रूपों का प्रयोग अलग-अलग भाषाओं के लिए होता है। भाषाओं की विविधता के साथ ही लिपियों की विविधता भी समाज और संस्कृति के इतिहास की सच्चाइयाँ हैं जिन्हें भूलने के बदले याद करना बेहतर होगा।

'संवाद परिसंवाद' पुस्तक से

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मैनेजर पाण्डेय जी की सभी पुस्तकें यहाँ पाएँ


Friday, 21 September 2018

‘स्वर्ण कमल’2016 पुरस्कार | मीडिया कवरेज



‘स्वर्ण कमल’2016 पुरस्कार




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हिन्दी महोत्सव'2016 | मीडिया कवरेज



'हिन्दी महोत्सव'2016

 | मीडिया कवरेज | 

दैनिक हिंदुस्तान/Dainik Hindustan (7 मार्च 2016,पृष्ठ संख्या-7)

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नवोदय टाइम्स/Navodaya Times(7 मार्च 2016,पृष्ठ संख्या-6)


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दैनिक जागरण/Danik Jagran(7 मार्च 2016,पृष्ठ संख्या-23)

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Book Link


हिन्दी महोत्सव'2017 | मीडिया कवरेज



'हिन्दी महोत्सव'2017

 | मीडिया कवरेज | 


वेब दुनिया/Web Duniya (2 मार्च 2017)

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जनसत्ता/ Janstta ( 2 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या - 4 )


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दैनिक जागरण/ Dainik Jagran ( 4 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या – 9)


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जनसत्ता/ Janstta ( 4 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या - 9 )


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नवोदय टाइम्स/Navodaya Times (4 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या - 9)


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नवोदय टाइम्स/Navodaya Times (5 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या - 9)


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Daily Tribune/डेली ट्रिब्यून (12 मार्च 2017, पृष्ठ संख्या - 8)

किताब समीक्षा: पतनशील पत्नियों के नोट्स



 किताब समीक्षा: पतनशील पत्नियों के नोट्स  




'बीवी जो जिस्म नहीं रह गई, जुनून नहीं रह गई'






बीबी हूं जी, हॉर्नी हसीना नहीं
हर रात तेल और मसालों की बू से लबालब इस हरारत भरे बदन को बिस्तर तक पहुंचाते हुए अपने दिलो-दिमाग पर जमी औरताना किचकिच को साफ करती चलती हूं. माफी चाहती हूं कि आज भी तुम अपने बिस्तर पर हॉर्नी हसीना की जगह बहस के लिए पिल पड़ती बेस्वाद बीवी ही पाने वाले हो.
बीवी जो जिस्म नहीं रह गई, जुनून नहीं रह गई. बस एक थुलथुले, लिजलिजे गोश्त में तब्दील हो चुकी है. बीवी जिसके बदन में नजाकत और शरारत भरी कामुक शिरकतों को महसूस करने की कवायद में मनहूसियत ही हाथ लगा करती है.
(पतनशील पत्नियों के नोट्स किताब का एक अंश)
बस्टी ब्यूटियों का तिलिस्म
जिस मुल्क में देवियों तक को भरपूर उभारों और गोलाइयों वाले उरोजों के साथ रचा गया हो, वहां बेहाल और ऊलजुलूल अनुपात वाली छातियों की मालकिन होने का जुर्म छोटा नहीं हो सकता है. सच कहूं तो मैं किसी ऐसी औरत से मिलने को बेताब हूं जो अपनी छातियों की दरार में बेशर्म हकीकत बनकर उभरती झुर्रियों की झलक से परेशान न होती हो. जो अपने सीने पर पसरते हुए सफेद धारियों के जंगली जाल से खौफ न खाती हो.
(पतनशील पत्नियों के नोट्स किताब का एक और अंश)

अगर किसी की पत्नी ऐसा बोले तो हिंदुस्तान के समाज में ये कुफ्र ही माना जाएगा. क्योंकि आम तौर पर हमारे समाज में औरतों की चुप्पी ही उनका एक्जिस्टेंस मानी जाती है. अगर बोलें तो सोशल ऑर्डर के टूटने का खतरा मंडराने लगता है. ये तो मानी हुई बात है कि हर किसी को बीवी एक रबर बैंड की तरह चाहिए. जैसे चाहिए, खींच लीजिए. दिन भर काम कराइए, फिर कहीं कोने में डाल दीजिए. पर रात में बीवी हॉर्नी हसीना ही होनी चाहिए. कितने ऐसे केस आते हैं जिसमें थुलथुल पति अपनी पत्नी से एक्रोबैट वाले करतब करने को कहता है. ना करने पर मार-पीट सब हो जाती है. फिर पति अपना अधिकार भी छीन के लेता है. क्योंकि मैरिटल रेप का कॉन्सेप्ट तो है नहीं इंडिया में. कॉन्सेप्ट तो पीरियड का भी नहीं है. औरत के अलावा कोई नहीं जानता कि उसे पीरियड आ रहे हैं.

ये बातें एक लड़की कह रही है

औरतों की इन सारी बातों को नीलिमा चौहान लिखकर लाई हैं अपनी किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में. वाणी प्रकाशन से आई है ये किताब. 200 पेज की किताब में 49 चैप्टर हैं. हॉर्नी हसीना से शुरूआत होती है. ब्रा, लस्ट, तीस घटा पांच यानी पीरियड, सब पे बात होती है. शुक्रिया भी अदा किया गया है अंत में.




नीलिमा चौहान

किताब में दो खूबसूरत चीजें हैं- भाषा और मुद्दे. हिंदी और उर्दू मिक्स कर बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बातें कही गई हैं. स्पष्टता से. फिर कोई मुद्दा छोड़ा नहीं गया है. हर चीज पर बात की गई है. एक चीज का खास ख्याल रखा गया है. बिना किसी के दिमाग पर दबाव डाले सारी बातें कह देना. शायद इसी के लिए उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.
क्योंकि सिर्फ हिंदी भाषा इस्तेमाल करने से कंटेंट के सीरियस होने का खतरा था. तब ये किताब ‘स्त्री-विमर्श’ के दायरे में आने लगती. पर पतनशील पत्नियां कहां विमर्श करना चाहती हैं. वो तो बस अपनी बात करना चाहती हैं. विमर्श आप करिए. उर्दू के शब्द ह्यूमर को एक एंगल दे देते हैं. एक अदब. एक तंज. मेरे ख्याल से बहुत मजबूती से प्रतिरोध जताने के लिए भाषा का ये इस्तेमाल बड़ा ही खूबसूरत होगा. शायद इसी वजह से शायर बड़ी आसानी से बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं.

इन बातों की खूबसूरती है कि लड़कियां खुद पर हंस रही हैं

अगर किताब के कुछ चैप्टरों के नाम ही देख लिए जाएं तो पता चल जाता है कि पतनशील पत्नियां कुछ छुपाना नहीं चाहतीं. अगर मजाक के नाम पर मर्द अपनी हर बात कह सकते हैं तो औरतों को भी ये लक्जरी पब्लिकली मिले. बहुत लंबे वक्त से ये बना चला आ रहा है कि किसी भी पार्टी में कोई मर्द बड़े ही आराम से जोक्स क्रैक करने वाले की भूमिका निभाता है और औरतें यू आर सो फनी कह के ताली पीटती हैं. पर पतनशील पत्नियां के पास भी जोक्स हैं. दे आर ऑल्सो फनी. वो किसी पेडेस्टल पर नहीं रहना चाहतीं. ना ही किसी पेडेस्टल के नीचे. तो उनकी बातें भी हैं, कुछ यूं-
1. तश्तरी में मादा लेखन. 2. शरीफजादियां नहीं होतीं शराबखोर. 3. घर वापसी. 4. शादी का मेहनताना. 5. मैं भी काफिर. 6. अय्यार जनानापन. 7. बराबर की छप्पनछुरी. 8. बीवियों के माशूक नहीं होते. 9. चूंकि बोरियत भी एक मर्दाना शै है. 10. बवाल ए जान ब्रा. 11. तीस घटा पांच. 12. जनाना लस्ट के लफड़े.
पर ये पूरी कहानी औरतों के एक खास वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है. ना तो ये कमर पर फेंटी बांध ईंट ढोने वाला वर्ग है, ना ही मर्सिडीज से निकल कर सीधा स्विमिंग पूल में छलांग लगाने वाला वर्ग है. ये छोटे शहरों का भी नहीं है. टियर 2 या टियर 1 के शहर के एक-डेढ़ लाख रुपये महीने की कमाई वाला वर्ग लगता है. जो आराम से जिंदगी बिता रहा है. इनके पास लाइफ तो है, कभी-कभी डल हो जाती है.
जो भी है, ये किताब बड़े ही प्यार से लिखी गई है. क्रूर मुद्दों को उठाकर. जिनको फेमिनिज्म का नाम सुन के कन्फ्यूजन हो जाता है, उनके लिए ये किताब प्राइमर का काम करेगी. जिन्हें मुद्दे पता हैं, उनके ज्ञान में इजाफा होगा. पर सबसे बड़ी बात है कि ये किताब औरतों का एक बहुत ही मजबूत पक्ष देती है. ट्रू फेमिनिज्म. कि औरतें मजाक कर सकती हैं. सेल्फ-डिप्रीकेटिंग ह्यूमर भी शामिल हैं उसमें. मतलब खुद पे हंस सकती हैं. उन्हें हर वक्त कॉन्शस रहने की जरूरत नहीं है. उन्हें कल्चर्ड होने का दिखावा नहीं करना है हर वक्त. जैसी हैं, उसमें कम्फर्टेबल हैं. मेरी नजर में ये चीज किसी भी औरत को सबसे ज्यादा मजबूत बना सकती है. विमर्श तो सिर्फ सरकार की पॉलिसी बनाने के काम आता है. पर औरतों का हंसना शुरू करना सबको विस्मय में डाल सकता है. आने वाले वक्त में ऐसी और किताबों की दरकार है.
कोई भी किताब या रचना किसी पॉइंट का द एंड नहीं होती. ये किताब भी उस दायरे से बाहर नहीं है. कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि कुछ चीजें जल्दबाजी में लिख दी गई हैं. और अच्छा लिखा जा सकता था. पर लिखने वाले की नजर में शायद इतना पर्याप्त होगा
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 पाखी पत्रिका के मार्च अंक में छपी 

 पतनशील पत्नियों के नोट्स की समीक्षा  



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12 मार्च 2017 

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पुरुषों के भी हैं पतनशील पत्नियों के नोट्स 

 गीताश्री 


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स्त्री के प्रति सामाजिक नजरिये पर व्यंग्य 


2 अप्रैल जुलाई 2017