Wednesday, 28 September 2016

लता: सुर-गाथा/Lata: Sur-gatha


लता : सुर-गाथा  

भारत रत्न स्वर-कोकिला लता मंगेशकर की सांगीतिक यात्रा ख़ास उनके जन्मदिन पर ! 




उन्हें दुनिया भर में भारतीय संगीत का पर्याय कहा जाता है, वे एक ऐसी किंवदन्ती बन गयी हैं कि आज समूची भारतीय संगीत परम्परा को उन्हीं के नाम से पुकारा जाता है। अपनी सुर-साधना से उन्होंने समय के तीनों छोरों को मिलाकर एकाकार कर दिया है।

भारत की सुर-सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी के जन्मदिवस पर वाणी प्रकाशन लेकर आया है एक बेहद ख़ास सौगात 'लता : सुर-गाथा'। यह महज किताब नहीं है, किताब से कहीं अधिक लता जी की सांगीतिक यात्रा का एक अनूठा दस्तावेज़ है।

'लता : सुर-गाथा' में युवा अध्येता Yatindra Mishra ने सुर-साम्राज्ञी के छह वर्षों के सान्निध्य को एक रचनात्मक उपलब्धि में कायान्तरित कर दिया है। सम्वादों की एक सतत शृंखला के रूप में इस पुस्तक की रचना की गयी है जिससे लता जी की आवाज़ की पूरी दुनिया का एक विराट चित्र उभर कर सामने आता है।

वाणी प्रकाशन की ओर से स्वर-कोकिला लता मंगेशकर जी को जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ!

पुस्तक 1 अक्टूबर से आपके पसंदीदा पुस्तक-केन्द्रों पर उपलब्ध होगी।



Tuesday, 27 September 2016

पुस्तक परिचर्चा : 'पकी जेठ का गुलमोहर'



नमस्कार!


प्रस्तुति 

  भगवानदास मोरवाल 

की नवीनतम कृति 

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पकी जेठ का गुलमोहर 
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 पर परिचर्चा
 मुख्य वक्ता 

 परवेज़ आलम        अनंत विजय    
  मीडिया विशेषज्ञ       मीडिया विशेषज्ञ     

शुक्रवार, 30 सितम्बर 2016,
शाम 6:00 बजे



आप सभी सादर आमन्त्रित हैं।

 विनीत 
 वाणी प्रकाशन व ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर

Saturday, 24 September 2016

The epic in rhythm : 'The Battle Royale'




The epic in rhythm : 'The Battle Royale'


'Kurukshetra', a masterpiece of ideas and thoughts, is an epic-in-miniature on war and peace. It reveals the heroic India to the world, an India hitherto in oblivion. This rendering aims to apprise the English readers about the ideas treasured in this modern epic of Dinkar who is held in the highest esteem for the depth of his vision, imagination and thought.


Dinkar, regarded as the 'sun' of modern Hindi poetry, is one of the greatest poets and thinkers of his time, who was hailed as a ‘Rashtrakavi’. Winner of many awards and honours including Sahitya Academi Award, Padma Bhushan, and Bharatiya Jnanpith. His prominent works include ‘Urvashi’, ‘Kurukshetra’, ‘Hunkar’, ‘Parshuram ki Pratiksha’, ‘Sanskriti ke Char Adhyaya’, etc.

Read this rhyming, mini-epic adapted from Ramdhari Singh Dinkar's highly acclaimed Hindi book 'Kurukshetra' by Dr. Shachi Kant and Dr. Raman P. Singh.

Click on the link below to order:


Tuesday, 20 September 2016

Indian Christian scholar of Hindi - Father Dr Camille Bulcke


Indian Christian scholar of Hindi - Father Dr. Camille Bulcke



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"I took the one less traveled by,
And that has made all the difference" 
-Robert Frost
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Father Dr Camille Bulcke, India's famous Christian Hindi scholar, made a remarkable difference when in 1945 he chose to write his PhD thesis in Hindi at University of Allahabad. The same thesis was later published as the book 'Ramkatha Ki Utpatti aur Vikaas' in 1949.



In 1935, left Belgium and came to India; taught mathematics and learned Hindi in Jharkhand. Being a multi-lingual, he already knew five European languages and Sanskrit, he mastered Brajbhasha and Awadhi, along with Hindi during his stay at Gumla, Jharkhand. He acquired Indian citizenship in 1951. In 1955, published English-Hindi glossary; in 1968, published Angrezi-Hindi Shabdkosh; translated important works from different languages into Hindi. The translation of Annie Besant's autobiography was his last project which remained incomplete. Apart from translations, he spent his life researching Tulsidas, Ramcharitmanas, and similarities between Ram and Christ.

On the auspicious occasion of the Belgian-Indian father Dr Camille Bulcke's 107th birth anniversary, Scroll brings to you the full story of his linguistic and literary journey in India to become Baba Bulcke.
http://scroll.in/…/meet-the-belgian-jesuit-who-submitted-th…
Get your hands on Bulcke's book 'Ramakatha and Other Essays' published by Vani Prakashan. Click on the link below:
http://www.vaniprakashan.in/details.php

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 #ramkatha #christ #RamAndChrist #India #Hinduism#IndianLanguages

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Wednesday, 14 September 2016

हिन्दी दिवस पर वाणी प्रकाशन की ख़ास पेशकश...


हिन्दी आधुनिकता : हिन्दी की बदलती दुनिया का जायज़ा

आज हिन्दी की दुनिया बहुत तेजी से फैल रही है। यह विचार की दुनिया से व्यवहार की दुनिया की ओर आ रही है। ऐसे में हिन्दी के फैलते क्षितिज का जायज़ा लेना हम सब की ज़िम्मेदारी है। वाणी प्रकाशन के गौरव ग्रन्थों की शृंखला में प्रकाशित 'हिन्दी-आधुनिकता' में इसी ज़िम्मेदारी को भाँपते हुए हिन्दी का जायज़ा लिया गया है।

यह किताब महज़ विचारों का खज़ाना नही है, हमारे दौर का बौद्धिक रोज़नामचा भी है। इसमें इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि हिन्दी के आत्मबोध में एक बदलाव घटित हो रहा है। इसमें हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिन्दी के अन्वेषण के लिए विचारों का एक जखीरा भी है।


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"अच्छी रचना के लिए अच्छी भाषा जरूरी है, 
जैसे अच्छे वस्त्र के लिए अच्छा सूत"
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आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने 'अच्छी हिन्दी' नामक पुस्तक में हिन्दी के स्वरूप, हिन्दी की बनावट और हिन्दी के परिष्कार की जरूरतों का विश्लेषण किया है। यह छोटी-सी पुस्तक पाठकों को हिन्दी से प्यार करना सिखाती है और एक भाषा के रूप में हिन्दी को सलीके से बरतना सिखाती है।

यह पुस्तक पाठकों को अच्छी हिन्दी के गुण बतलाती है, साथ ही शब्दों के उचित प्रयोग, और शब्दों के अविज्ञात प्रयोग के बारे में जानकारी देती हुई चलती है।

यह पुस्तक पाठकों को हिन्दी के करीब जाने के लिए प्रेरित करती है और देश की एकता और अखंडता में हिन्दी की भूमिका को रेखांकित करती है।

हिन्दी दिवस के अवसर पर वाणी प्रकाशन की ओर से पाठकों को हार्दिक 
शुभकामनाएँ!

हिन्दी दिवस पर हिन्दी से जुड़ी विशिष्ट पुस्तकों के लिए इस लिंक पर जाएँ :

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वाणी प्रकाशन समाचार (वर्ष : 10, अंक : 112, सितम्बर 2016)


प्रिय पाठकों,


वर्ष : 10, अंक : 112, सितम्बर 2016

इस अंक में पढिये


























Monday, 12 September 2016

'हलाला' : मेवाती लोकगन्ध में लिपटा किस्सा


'हलाला' : मेवाती लोकगन्ध में लिपटा किस्सा


'इंडिया टुडे' के ताज़ा अंक में पढ़ें भगवानदास मोरवाल के उपन्यास 'हलाला' की समीक्षा 'मेवाती लोकगन्ध में लिपटा किस्सा'।
मुस्लिम समुदायों में धर्म की आड़ में होने वाले स्त्री के मानसिक और दैहिक शोषण को केन्द्र में रखकर लिखी गयी और ‘फेमिना हिन्दी' द्वारा चयनित साल 2015-16 की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में शामिल इस पुस्तक में लेखक ‘हलाला’ जैसे विधान की चिंता में डूबे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की व्यवस्था पर मंडराने वाले व्यावहारिक और वास्तविक संकट को पेश करता है।

'मेवाती लोकगन्ध में लिपटा किस्सा' शीर्षक यह समीक्षा लिखी है जीवन सिंह ने।
 धन्यवादJeevan Singh, धन्यवाद India Today Hindi !

'हलाला' पुस्तक के लिए इस लिंक पर जाएँ : 
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'वुमन समिट' में कालपिनी कोमकली का सम्मान



इन्दौर में 'इंडिया टुडे समूह' द्वारा आयोजित 'वुमन समिट' में लेखिका और कलाविद कालपिनी कोमकली को सम्मानित किया गया है। कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री श्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
ब्रिलिएंट कन्वेन्शन सेंटर, इंदौर में आयोजित इस समिट में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जा रही “महिला एवं बाल कल्याण” योजना को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए महिलाओं को सम्मानित किया गया।
कालपिनी कोमकली ने 'कालजयी कुमार गन्धर्व' नाम से एक पुस्तक सह-सम्पादित की है जो कला के प्रति उनकी गहरी रूचि का जीवन्त प्रमाण है।

समस्त वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से Kalapini Komkali जी को इस
उपलब्धि के लिए बधाई!

'कालजयी कुमार गन्धर्व' पुस्तक के लिए इस लिंक पर जाएँ :
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Saturday, 10 September 2016

'दर्दजा' की लेखिका जयश्री रॉय को "स्पंदन कृति पुरस्कार"


'दर्दजा' की लेखिका जयश्री रॉय को "स्पंदन कृति पुरस्कार"
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हिन्दी कथा की दुनिया में नयी लीक की रचनाकार जयश्री रॉय के उपन्यास 'दर्दजा' को भोपाल की संस्था 'स्पंदन' के द्वारा वर्ष 2016 के "स्पंदन कृति पुरस्कार" के लिए चुना गया है। इस उपलब्धि के लिए समस्त वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से Joyshree Roy को बधाइयाँ!

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित 'दर्दजा' लेखिका का नवीनतम उपन्यास है जिसमें अफ्ऱीका समेत लगभग आधी दुनिया में फ़ीमेल जेनिटल मयूटिलेशन या औरतों की सुन्नत की कुप्रथा के खि़लाफ़ हमारी आधी आबादी का दर्दनाक संघर्ष दर्ज़ किया गया है। हिन्दी में इस थीम पर यह पहली किताब है।

दर्दजाके पृष्ठों पर एक ऐसे संघर्ष की ख़ून और तकलीफ़ में डूबी हुई गाथा दर्ज है जो अफ्रिका के 28 देशों के साथ-साथ मध्य-पूर्व के कुछ देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ जातीय समुदायों की करोड़ों स्त्रियों द्वारा फ़ीमेल  जेनिटल म्यूटिलेशन (एफ़जीए  या औरतों की सुन्नत) की कुप्रथा के ख़िलाफ़ किया जा रहा है। स्त्री की सुन्नत का मतलब है उसके यौनांग के बाहरी हिस्से (भगनासा समेत उसके बाहरी ओष्ठ) को काट कर सिल देना, ताकि उसकी नैसर्गिक कामेच्छा को पूरी तरह से नियन्त्रित करके उसे महज़ बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला जा सके। धर्म, परम्परा और सेक्शुअलिटी के जटिल धरातल पर चल रही इस लड़ाई में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसी विश्व-संस्थाओं की सक्रिय हिस्सेदारी तो है ही, सत्तर के दशक में प्रकाशित होस्किन रिपोर्ट के बाद से नारीवादी आन्दोलन और उसके रैडिकल विमर्श ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है।

अपनी समाज-वैज्ञानिक विषय-वस्तु के बावजूद प्रथम पुरुष में रची गयी जयश्री रॉय की कलात्मक आख्यानधर्मिता ने स्त्री  की इस ज़द्दोज़हद  को प्रकृति के ऊपर किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह का रूप दे दिया है। सुन्नत की भीषण यातना से गुज़र  चुकी माहरा अपनी बेटी मासा को उसी तरह की त्रासदी से बचाने के लिए पितृसत्ता द्वारा थोपी गयी सभी सीमाओं का उल्लंघन करती है। अफ़्रीका के जंगलों और रेगिस्तानों की बेरहम ज़मीन र सदियों से दौड़ते हुए माहरा और मासा के अवज्ञाकारी क़द  अपने पीछे मुक्ति के निशान छोड़ते चले जाते हैं। माहरा की बग़ावती चीख़ एक बेलिबास रूह केक़लाम की तरह है। हमारे कानों में गूँजते हुए वह एक ऐसे समय तक पहुँचने का उपक्रम करती है जिसमें कैक्टस अपने खिलने के लिए माक़ूल  मौसम का मोहताज़  हीं रहता।

'दर्दजा' और लेखिका की श्रेष्ठ कृतियों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें