Monday, 25 June 2018

आमन्त्रण : हिन्दी महोत्सव 2018- ऑक्सफ़ोर्ड। लंदन। बिर्मिंघम

||आमन्त्रण ||

नमस्कार !

आपको बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि  हिन्दी भाषा की विविधतासौन्दर्यडिजिटल और अन्तराष्ट्रीय स्वरूप का उत्सव


हिन्दी महोत्सव 2018
यूनाइटेड किंगडम

के तीन शहरों में आयोजित किया जा रहा है।

वाणी फ़ाउण्डेशनयू.के. हिन्दी समितिवातायन  और कृति यू. के.

के संयुक्त तत्त्वावधान में

28 जून से 1 जुलाई 2018

तक चार दिवसीय चलने वाले हिन्दी महोत्सव   का आयोजन

ऑक्सफोर्डलन्दन  और बर्मिंघम

में सुनिश्चित किया गया है।

महोत्सव में भाषासाहित्यप्रवासी लेखनकविता और संगीतमीडिया और प्रकाशन जगत से सम्बन्धित विविध विषयों पर परिचर्चासम्मेलनकार्यशाला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों  का आयोजन किया जाएगा। साथ ही यूनाइटेड किंगडम में हिन्दी पढ़ रहे छात्रों से विशेष संवाद भी किया जायेगा।


आप कार्यक्रम में सादर आमन्त्रित हैं।

कार्यक्रम की रूपरेखा संलग्न हैं।


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विनीत
अरुण माहेश्वरी
चेयरमैनवाणी फ़ाउण्डेशन

​*​
पद्मेश गुप्त
यू.के. हिन्दी समिति के संस्थापक
​---​
सुरेखा चौफ्ला
अध्यक्षयू.के. हिन्दी समिति

​*​
डॉ. के.के. श्रीवास्तव
अध्यक्षकृति यू.के.

​---​
तितिक्षा
महासचिवकृति यू.के.


​​*
दिव्या माथुर
संस्थापक, वातायन

Monday, 11 June 2018

वाणी प्रकाशन समाचार | वर्ष :11, अंक : 133, जून 2018

प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

  वर्ष :11, अंक : 133, जून  2018  









#VaniSamachaar #June2018 

Thursday, 24 May 2018

नये शेखर की जीवनी | अविनाश मिश्र

नये 
शेखर 
की जीवनी 
                                                                                  
                                                                                    अविनाश 
                                                                                        मिश्र


 वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है 
युवा लेखक अविनाश मिश्र का नया उपन्यास 

नये 
शेखर 
की 
जीवनी

आइये पढ़ते हैं किताब का एक अंश 

सत्ताएँ कैसे भेदती हैं एक व्यक्ति के अन्तरतम को...

शेखर मूलतः कवि है और कभी-कभी उसे लगता है कि वह इस पृथ्वी पर आख़िर कवि है। यह स्थिति उसे एक व्यापक अर्थ में उस समूह का एक अंश बनाती है, जहाँ सब कुछ एक लगातार में ‘अन्तिम’ हो रहा है। वह इस यथार्थ में बहुत कुछ बार-बार नहीं, अन्तिम बार कह देना चाहता है। वह अन्तिम रूप से चाहता है कि सब अन्त एक सम्भावना में बदल जाएँ और सब अन्तिम कवि पूर्ववर्तियों में।

वह एक कवि के रूप में अकेला रह गया है, गलत नहीं है तो एक मनुष्य के रूप में अकेला रह गया है एक साथ नया और प्राचीन। वह जानता है कि वह जो कहना चाहता है वह कह नहीं पा रहा है और वह यह भी जानता है कि वह जो कहना चाहता है उसे दूसरे कह नहीं पाएँगे

शेखर मूलतः कवि है और वर्षों से एक वक्तव्य देना चाहता रहा है। वह एक वक़्त से इस वक्तव्य को कविता-पंक्तियों की तरह अपने भीतर बुनता आया है। उसने कई वक्तव्यों को पढ़ा और सुना है और वह उन सब खामियों से वाकि है जो उसने उन्हें पढ़ते और सुनते हुए अनुभव की हैं।

शेखर अपने एकान्त को इस वक्तव्य के रिया से भरा करता है। वह राह चलते-चलते कुछ बोलने लगता है। उसका आस-पास उस पर हँसता है।

शेखर मूलतः कवि है और वह चाहता है कि लोग उस पर ध्यान दें।

शेखर इस वक्तव्य में उस जीवन के विरुद्ध जाना चाहता है जिसमें आत्मा अनुपस्थित है।

शेखर एक आत्मवंचित खालीपन से बाहर आना चाहता है।

लेकिन शेखर की उम्र या कहें उसकी अयोग्यता ने अब तक उसे उन अवसरों से अलग बनाये रखा है जिनमें ख़ुद को एक वक्तव्य देने के लिए मुस्तैद करना पड़ता है।

शेखर मूलतः कवि है और यह जानता है कि उसकी भावनाएँ उसके खिला इस्तेमाल की जा सकती हैं

मानसून-दर-मानसून बरसते चले जा रहे हैं और शेखर अपनी उम्र, अपनी अयोग्यता और अपनी कविता-पंक्तियों के साथ ख़ुद में कहीं गुम होता जा रहा है।

उदासी एक बासी ची है शेखर के समय में, जो बरों की तरह उसे दी गयी है। लेकिन यह बरों से भी ज़्यादा बासी है। सब कुछ रंगीन और रौशन है, लेकिन शेखर उदास है। वह बाक़ी खबरें जानना चाहता है, लेकिन वे प्रत्येक अन्तराल में उत्पादों में बदल जाती हैं। बाक़ी ख़बरें कहीं नहीं हैं।

शेखर अबारों पर सो रहा है एक बन्द कमरे में पानी पी-पीकर आईनों से झगड़ता हुआ। वह घुट रहा है, इसलिए खिड़कियाँ खोल देना चाहता है, यह जानते हुए भी कि अब कुछ भी सुरक्षित नहीं समग्र मानचित्र में।

शेखर मूलतः कवि है और पुरस्कार नहीं यात्राएँ स्वीकार करना चाहता है। यात्राएँ ही बचा सकती हैं उसे। वह बहुत दूर तक गुम होना चाहता है। सर्वत्र प्रताड़ितों के भोज्य में से एक कौर उठाते हुए वह जानना चाहता है कि सत्ताएँ कैसे भेदती हैं एक व्यक्ति के अन्तरतम को। वह यह भी जानना चाहता है कि क्या जल से भी ज़्यादा अर्थपूर्ण है कुछ जीवन में और वृक्षों से भी जो सर्वत्र उसके साथ रहेंगे और धूल से भी जो वह कहीं भी चला जाए, भूल से भी कभी उसे उसके साथियों से जुदा नहीं होने देगी।


अविनाश मिश्र
5 जनवरी 1986 को गाज़ियाबाद में जन्म। शुरुआती शिक्षा और जीवन उत्तर प्रदेश के कानपुर में। आगे की पढ़ाईलिखाईसंघर्ष और आजीविका के लिए साल 2004 से दिल्ली के आस-पास रहनवारी और बीच-बीच में दिल्ली से दूर प्रवास। कविताआलोचना और पत्रकारिता के इलाके में सक्रिय। कुछ प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में सेवाएँ दीं और लगभग सभी प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर रचनाएँ और साहित्यिक पत्रकारिता से सम्बन्धित काम प्रकाशित।अज्ञातवास की कविताएँ’ शीर्षक से कविताओं की पहली किताब साहित्य अकादेमी से साल 2017 में आयी। इन दिनों आलोचना की एक किताब पर काम और विश्व कविता और अन्य कलाओं की पत्रिका सदानीरा’ का सम्पादन कर रहे हैं।  
यह उपन्यास विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रकाशन प्लेटफार्म जयपुर बुकमार्क द्वारा संचालित 'फर्स्ट बुक क्लब २०१७' में प्रकाशन के लिए चुना गया है। 

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 #शीघ्रप्रकाशय  #जून2018 
@VANI PRAKASHAN  #VANI 55 
 @ZEEJLF @JBMatJLF 

Wednesday, 11 April 2018

वाणी प्रकाशन समाचार | वर्ष :11, अंक : 131, अप्रैल 2018

प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

  वर्ष :11, अंक : 131, अप्रैल  2018  










Tuesday, 3 April 2018

निर्मल स्मृति

निर्मल स्मृति

(3 अप्रैल 1929 )





निर्मल सूक्तियाँ ~
  • मुझे ईश्वर में विश्वास नहीं है, फिर भी न जाने कैसे एक विचित्र स्नेहिल-सी कोमलता मेरे अस्तित्व के गहनतम तल में भाप-सी उठने लगती है, जब मैं अपने लेखन में कभी ईश्वरका नाम लिखता हूँ।

  • साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ़ अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न में पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा अहसास होता है कि तुम सचमुच कितने प्यासे थे।
   
  • मनुष्य का अन्तःविवेक समाज की नैतिक मान्यताओं से नहीं आता, जो बदलती रहती हैं। यह आता है, उस असीम विस्तार के बोध से, जो इतिहास के ऊपर फैला हैऔर मनुष्य के भीतर भी।

  • मेरे लिए सफलता एक ऐसे खिलौने की तरह है, जिसे एक अजनबी किसी बच्चे को देता है, इससे पहले कि वह इसे स्वीकार करे, उसकी नज़र अपने माँ-बाप पर जाती है और वह अपना हाथ खींच लेता है।
  • जब हम जवान होते हैं, हम समय के ख़िलाफ़ भागते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बूढ़े होते जाते हैं, हम ठहर जाते हैं, समय भी ठहर जाता है, सिर्फ़ मृत्यु भागती है, हमारी तर                                               
  • असली सन्त और क्रान्तिकारी सिर्फ़ वही लोग हो सकते हैं जो माँ के पेट से निकलते ही चारों तरफ़ दुनिया को देखते होंगे और घोर निराशा में चीख मार कर रोते होंगे...क्योंकि हर बच्चा पैदा होते ही चीखता है- सन्त और क्रान्तिकारी बनने की सम्भावनाएँ हर व्यक्ति में मौजूद रहती हैं।
  • सुख की तलाश आँखमिचौनी का खेल है- जब तुम उसे खोजते हो, तो वह ओझल हो जाता है, फिर वह अचानक तुम्हें पकड़ लेता है, जब तुम अपनी यातना की ओट में मुँह छिपा कर बैठे हो।
  • हर लेखक की शुरुआत में उसका अन्त छिपा रहता है...और इन दोनों के बीच वह स्वयं है, पराजित भी और विजेता भी, यातना भोगता हुआ, लेकिन उस यातना का द्रष्टा भीएक ऊबड़-खाबड़ ज़मीन, जिस पर उसकी समूची दुनिया बसी है।
  • शब्द व्यक्तियों के बीच सम्प्रेषणीयता स्थापित नहीं करते, बल्कि महज उसे उद्घाटित करते हैं, जो पहले से ही उनके बीच अदृश्य रूप से व्याप्त है।

                                                              
  • कभी-कभी ऐसा होता है कि हम चाहे सत्य को प्राप्त न कर सकें, अपने झूठ को पहचान लेते हैं, उस झूठको उद्घाटित करने का जोख़िम उठा लेते हैं। यह अपने में एक नैतिक कर्म है।
  • कोई भी रचना न पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है, न पूर्ण रूप से उपज, बल्कि जिस सँकरे दरवाज़े से लेखक ख़ुद नहीं गुज़र सकता, उसकी रचना अपने को अदृश्य छाया-सी उस दरवाज़े के अनुकूल समेट कर रास्ता बना लेती है। समेटने की प्रक्रिया में उस अदृश्य ईश्वर का जन्म होता है जिसे हम रूप कहते हैं, उस छाया को गति और प्राण देता और एक मांसल प्रवाह देता हुआ।

  • बन्द करने के लिए कितनी चाभियाँ हैं, खोलने के लिए एक भी नहीं।
  • एक सुख का अभाव कभी दुख का कारण नहीं बनता, उलट एक नये, अपरिचित सुख को जन्म देता है
  • पुराने स्मारक और खँडहर हमें उस मृत्यु का बोध कराते हैं जो हम अपने भीतर लेकर चलते हैं। बहता पानी उस जीवन का बोध कराता है जो मृत्यु के बावजूद वर्तमान है, गतिशील है, अन्तहीन है।

  • इतिहास का यह धर्म है कि वह हर देश को किसी-न-किसी दुनिया के कठघरे में खड़ा कर सके; कलाकार का धर्म है कि वह हर कठघरे से मुक्ति पा कर अपनी प्राथमिक और मौलिक दुनिया में प्रवेश करने का साहस जुटा सके।
  • हमारा असली यथार्थ वही नहीं, जो मैं जी रहा हूँ। हमारा असली यथार्थ हमारे स्वप्नों, हमारी आकांक्षाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे उन विकल्पों के भीतर भी छिपा रहता है जिन्हें हम चुन नहीं सके लेकिन वे हमारे भीतर उतने ही जीवन्त और स्पन्दनशील हैं।
  • पहाड़, भिक्षुक, लामा, फकीर, सूनी दुपहरें...ये ऐसेबिम्ब हैं, जिनके बीच मेरी कल्पना ने अपना परिवेश निर्मित किया था...बचपन के बिम्ब जिन्हें शब्दों में ढालते हुए समूचा जीवन बीत जाता है, और फिर भी लगता है, जो कुछ बना है, उससे बहुत कम है, जो अछूता, बंजर, आकारहीन पड़ा है।
  • साहित्य में अभाव का उतना ही महत्त्व है, जितना कला में अदृश्य का, और संगीत में मौन का...मौनअभाव और अदृश्य के स्थल खाली नहीं हैं...इनमें हमारी कल्पना वास करती है।
  • जब सारे अन्धविश्वास एक सुसंगत शृंखला में जुड़ते हैं, तो वे अन्धे हों, न हों, एक गहरी सांस्कृतिक अर्थवत्ता प्राप्त कर लेते हैं।
                                                                                             
  • तुम यथार्थ को पास रख कर उसका सृजन नहीं कर सकते। तुम्हें उसके लिए मरना होगा, ताकि वह  तुम्हारे लिए जीवित हो सके।
  • मृत्यु कोई समस्या नहीं है, यदि तुमने अपनी ज़िन्दगी शुरू न की हो।
  • जो लोग तुम्हें प्यार करते हैं, वे तुम्हें कभी माफ़ नहीं करते।
  • एक कलाकृति न जड़ है, न वृक्ष- वह भाषा में प्रकृति की लीला है।

  • किसी भी महान कलाकृति का अनुभव- वह चाहे कहानी में हो या महाकाव्य में- अपने पाठक को विस्मृति  के अँधेरे से स्मृति के आलोक में लौटाने का क्षण है।
  • देवता ईर्ष्या करते हैं मनुष्य से, इसलिए कि मनुष्य किसी भी बने-बनाये खेल से बाहर आ सकता हैदेवताओं की बनी-बनायी भूमिका होती है।

  • हम प्रायः लेखक के अकेले क्षणों की चर्चा तो करते हैं, कभी पाठक के एकान्त की बात नहीं करतेजिसके बिना वह कभी साहित्यिक कृति से साक्षात नहीं कर सकता था।
  • जो चीज़ें हमें अपनी ज़िन्दगी को पकड़ने में मदद करती हैं, वे चीज़ें हमारी पकड़ के बाहर हैं। हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं...
  • हमें समय के गुज़रने के साथ-साथ अपने लगावों और वासनाओं को उसी तरह छोड़ते चलना चाहिए जैसे  साँप अपनी केंचुल छोड़ता है और पेड़ अपने पत्तों और फलों का बोझ... जहाँ पहले प्रेम की पीड़ा वास करती थी, वहाँ सिर्फ़ खाली गुफ़ा होनी चाहिए, जिसे समय आने पर संन्यासी और जानवर छोड़कर चले जाते हैं...
  • जीवन में अकेलेपन की पीड़ा भोगने का क्या लाभ यदि हम अकेले में मरने का अधिकार अर्जित न कर सकें? किन्तु ऐसे भी लोग हैं जो जीवन भर दूसरों के साथ रहने का कष्ट भोगते हैं, ताकि अन्त में अकेले न मरना पड़े...

  • हम अपने को सिर्फ़ अपनी सम्भावनाओं की कसौटी पर नाप सकते हैं। जिसने अपनी सम्भावनाओं को  आखिरी बूँद तक निचोड़ लिया हो, उसे मृत्यु के क्षण कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए...
  • कैसी विचित्र बात है, सुखी दिनों में हमें अनिष्ट की छाया सबसे साफ़ दिखाई देती है, जैसे हमें विश्वास न हो कि हम सुख के लिए बने हैं। हम उसे छूते हुए भी डरते हैं कि कहीं हमारे स्पर्श से वह मैला न हो जाए और इस डर से उसे भी खो देते हैं, जो विधाता ने हमारे हिस्से के लिए रखा था। दुःख से बचना मुश्किल है, पर सुख को खो देना कितना आसान है... 
  • जब हम अकेले सड़क पार करते हैं, तो खाली हाथ हवा में डोलता है, पुरानी छुअन की याद में उस अपाहिज की तरह, जिसे मौके-बेमौके अपने कटे अंग की याद आ जाती है- यह एक छोटी-सी मृत्यु है। लोग बहुत धीरे-धीरे मरते हैं...
  • जिसे हम पीड़ा कहते हैं, उसका जीने या मरने से कोई सम्बन्ध नहीं है। उसका धागा प्रेम से जुड़ा होता है, वह खिंचता है तो दर्द की लहर उठती है...
  • मैं जब अकेले में सोचता हूँ- यह मैं हूँ, यह क्षण मेरा है, यह मेरी जगह है; कोई मुझे इससे नहीं छीन सकता... तो एक गहरी राहत और ख़ुशी होती है- मैं स्वतन्त्र हूँ और पूरी तरह अपनी स्वतन्त्रता चख सकता हूँ। किन्तु जिस दिन कोई ऐसा क्षण आएगा, जब मैं यह सोच सकूँगा- कि न यह मैं हूँ, न यह क्षण मेरा है, न मेरी अपनी कोई जगह है, न मैं जीवित हूँ, न मनुष्य हूँ... इसलिए जो नहीं हूँ, उसे कौन मुझसे छीनकर ले जा सकता है? जिस दिन मैं यह सोचूँगा, उस दिन मैं मुक्त हो जाऊँगा, अपनी स्वतन्त्रता से मुक्त, जो अन्तिम गुलामी है। मुक्ति और स्वतन्त्रता में कितना महान अन्तर है...

निर्मल वर्मा का समस्त साहित्य संसार 

वाणी प्रकाशन से ...

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चित्र  (c) गगन गिल