Saturday, 18 March 2017

'कलम-लन्दन' में 'वोटर माता की जय' पर परिचर्चा

'कलम-लन्दन' में लेखिका प्रतिष्ठा सिंह संग 

वोटर माता की जय  पर परिचर्चा


इस चुनावी मौसम में सुनिए #वोटरमाताकीजय की लेखिका प्रतिष्ठा सिंह को 
बिहार चुनाव के अपने अनुभव साझा करते हुए ‘कलम’ में

वाणी प्रकाशन से हाल ही में आयी किताब वोटर माता की जय पर ‘कलम’ के लंदन संस्करण में 19 मार्च 2017 को लेखिका प्रतिष्ठा सिंह के साथ परिचर्चा होगी|  प्रभा खेतान फाउंडेशन और विद्यापथ संस्था मिलकर 19 मार्च 2017 को शाम 4 बजे लन्दन के O2 सेंटर में ‘कलम-लन्दन’ का आयोजन कर रहे हैं|  


'वोटर माता की जय' का आवरण 



'वोटर माता की जय' बिहार के महिला समाज की एक ऐसी कथा है जिसमें पूरे बिहार की पृष्ठभूमि की झलक नज़र आती है| पुस्तक की भाषा का बिहारी लहजा इसकी रोचकता और पठनीयता को एक नयी पहचान देता है| यह किताब बिहार की महिलाओं की राजनीतिक सजगता और प्रगतिशीलता का सजीव प्रमाण है| कि अब का सनेश साफ़ है : बिहार में वोटर की, खासकर महिला वोटर की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता| 2015 के चुनाव में बिहार के महिला वोटर वर्ग ने राजनीतिक सूरत पलट कर रख डाली| 'वोटर माता की जय' बिहार के इसी चुनावी संघर्ष के क्रमिक विकास की कहानी है| 


किताब के बारे में...




वोटर माता की जय पर कुछ सम्मतियाँ 


चुनावों पर अनेक तरह की समीक्षाएँ एवं आलोचनाएँ लिखी जाती रही हैं, ख़ासतौर पर बिहार के चुनावों पर| लेकिन यह किताब उन सबसे अलग है| यहाँ बहुत ही सरलता और सहजता से एक गम्भीर सामाजिक बदलाव को प्रस्तुत किया गया है जिसका हम स्वागत करते हैं| यदि ऐसे विषय पर किसी राजनीतिक दल के द्वारा लेखन किया जाता है तो उसमें कुछ एकतरफ़ा स्वाद रहने का खतरा हमेशा रहता है| यहाँ, चूँकि लेखिका राजनीति से सम्बन्ध नहीं रखती इसलिए उनके लेखन और नज़रिए में निष्पक्षता साफ़ झलकती है| बिहार की महिलाओं ने बेहद निडरता और जोश के साथ लेखक से बातचीत कर ये साबित कर दिया है कि वे प्रगतिशील हैं|  

                                                                                                                     --पवन कुमार वर्मा
            वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, बुद्धिजीवी एवं साहित्यकार



सफ़र के बारे में...



प्रतिष्ठा सिंह, लेखिका 

एक महिला होने के नाते दूसरे राज्यों की अपनी बहनों को जानने की इच्छा थी| बिहार में रूचि थी| हमारे मिस्टर ने हमारी उत्सुकता को फिर से हवा दे दी| दिल्ली में मन नहीं लग रहा था| चुनाव सर पर थे और हमारे सर पर बिहार भ्रमण का भूत! सो हम चल पड़े!


-    प्रतिष्ठा सिंह 






पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें:


www.amazon.in



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Wednesday, 15 March 2017

विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड



विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड


विनोद भारद्वाज को लाइफ अचीवमेंट अवार्ड  प्रदान  करते हुए बायें से अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र  प्रताप सिंह, प्रो.  हरीश त्रिवेदी, विख्यात कथाकार उदय प्रकाश (पीछे ), प्रो. सुधीश पचौरी और वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध  निदेशक अरुण  माहेश्वरी  

वाणी फ़ाउंडेशन और इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित हिन्दी महोत्सव के दूसरे दिन (4 मार्च 2017) इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के कॉन्फ्रेंस रूम में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन के सम्पादकीय विभाग से जुड़े वरिष्ठ प्रूफ़ संशोधक श्री विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। विख्यात आलोचक प्रो. सुधीश पचौरी और ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रो. हरीश त्रिवेदी के हाथों श्री भारद्वाज को सम्मानित किया गया। सम्मान के तौर पर उन्हें वाणी प्रकाशन का प्रतीक चिह्न (माँ सरस्वती की प्रतिमा), शॉल एवं 11,000 रुपये की राशि भेंट की गयी। इस अवसर पर विख्यात लेखक उदय प्रकाश, वरिष्ठ मीडियाकर्मी प्रियदर्शन, भाषाशास्त्राी प्रो. अन्विता अब्बी, अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह, वाणी फ़ाउंडेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी एवं फ़ाउंडेशन की मैनेजिंग ट्रस्टी और हिन्दी महोत्सव की फेस्टिवल डायरेक्टर अदिति माहेश्वरी-गोयल भी मंच पर उपस्थित थीं। विनोद भारद्वाज को लगभग तीन दशकों तक वाणी प्रकाशन से जुड़े रहकर अपनी ईमानदार सेवा, निष्ठा और कर्मठता के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया। 

श्री भारद्वाज का जन्म 1964 में अलीगढ़ के गौमत गाँव में हुआ। आरम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातक, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्राी और महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय (रोहतक) से बी.एड. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। अस्सी के दशक में उन्होंने हिन्दी प्रकाशन की दुनिया में कदम रखा और एक कुशल प्रूफ़ संशोधक के रूप में जल्दी ही ख्याति प्राप्त करने लगे। शुरुआत के कुछ वर्षों में उन्होंने हिन्दी के कई प्रतिष्ठित प्रकाशकों के लिए प्रूफ़ संशोधन का काम किया और तत्पश्चात 27 वर्षों से वाणी प्रकाशन से जुड़े हैं और वर्तमान में वरिष्ठ प्रूफ़ संशोधक के पद पर आसीन हैं। तीन दशक के अपने कॅरियर में उन्होंने प्रूफ़ संशोधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया और लेखक समुदाय का ध्यान खींचा, ख्याति के साथ-साथ उन सबका विश्वास भी अर्जित किया। 

उनका मानना है कि आजकल जो पाण्डुलिपियाँ आती हैं वे भाषाई दृष्टि से बहुत अस्त-व्यस्त होती हैं। आज कम्प्यूटर के नये-नये फॉण्ट हैं। लेखक-अनुवादक-सम्पादक किसी पाण्डुलिपि को पूरी तरह दुरुस्त करके नहीं भेजते। अपने सम्बोधन में उन्होंने वाणी फ़ाउंडेशन और वाणी प्रकाशन परिवार का आभार व्यक्त किया और उन सभी विद्वानों, दोस्तों और वाणी प्रकाशन के सभी कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया जो समय-समय पर उनके कार्य को प्रोत्साहित करते रहे। इस अवसर पर प्रो. सुधीश पचौरी ने कहा कि जब कोई पाण्डुलिपि विनोद जी की मेज़ से होकर गुजरती है तो लेखक आश्वस्त हो जाता है कि अब उसकी पुस्तक बिल्कुल त्राुटिहीन छपेगी। 


 (वाणी प्रकाशन समाचार के मार्च 2017 अंक में प्रकाशित)





विशिष्ट : वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होगा 'हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश'



हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश
भारत की सांस्कृतिक निधियों का आलोक स्तम्भ


डॉ. कुसुम खेमानी वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी को
 'हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश' 
की सीडी सौंपते हुए, साथ में वरिष्ठ कवी केदारनाथ सिंह,
 प्रधान सम्पादक शंभुनाथ और मन्त्री  नन्दलाल शाह। 

भारतीय भाषा परिषद् द्वारा प्रख्यात आलोचक और विद्वान प्रो. शंभुनाथ के नेतृत्व में तीन वर्षों के अथक प्रयास से तैयार किया जा रहा हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश अब प्रकाशन के लिए तैयार है। भारतीय भाषा परिषद् की ओर से मन्त्री नन्दलाल शाह और वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली की ओर से अरुण माहेश्वरी ने कोलकाता में कुसुम खेमानी की उपस्थिति में इसके निमित्त एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। वाणी प्रकाशन इसका मुख्य वितरक है। आधुनिक पद्धति से बना हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश 5000 से अधिक पृष्ठों का है और यह दस खण्डों में प्रकाशित होगा। इसमें लगभग 1500 चित्र भी होंगे। इसे तैयार करने, प्रकाशित करने और देश के विभिन्न शहरों में प्रमोशन पर आने वाला कुल खर्च लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख तक अनुमानित है। 

भारतीय भाषा परिषद् और वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली के बीच हुए समझौते के अवसर पर सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि कोलकाता से आधुनिक हिन्दी और पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी। आजादी के बाद कोलकाता एक बार फिर इस ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण कार्य का केन्द्र बना है। भारतीय भाषा परिषद् ने यह ऐतिहासिक कार्य कराया है। हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके कई संस्करण होंगे। यह कई पीढ़ियों के लिए आलोक स्तम्भ का काम करेगा। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने देश के विभिन्न शहरों में विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से इसके लोकार्पण और प्रमोशन की घोषणा की। उम्मीद की जाती है कि छह महीनों के भीतर हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशछप कर तैयार होगा। 


कोश के पहले संस्करण के कुल 3000 सेट प्रकाशित होंगे। दस खण्डों का पेपरबैक संस्करण भी विद्यार्थियों को विशेष छूट पर उपलब्ध होगा। 

हिन्दी में पहला विश्वकोश नगेन्द्रनाथ बसु ने 24 खण्डों में 1916 से 1931 बीच प्रकाशित किया था। इससे पहले वे बांग्ला विश्वकोश का काम शुरू कर चुके थे और हिन्दी विश्वकोश उसकी छाया था। लम्बे समय तक यही हिन्दी विश्वकोश चलन में रहा। फिर 1958 में धीरेन्द्र वर्मा के सम्पादन में हिन्दी साहित्य कोश आया। इसका पहला संस्करण मुख्यतः पारिभाषिक शब्दावलियों पर केन्द्रित था। 1965 के दूसरे संस्करण में नामावली का खण्ड जुड़ा। अन्तिम रूप से यह 1970 में संशोधित-परिवर्धित हुआ था, पर छप पाया 1985 में। पिछले लगभग 45-50 सालों से यही कोश उपलब्ध था। यह एक विडम्बनाजनक स्थिति कही जाएगी, क्योंकि कोई भाषा तब तक दरिद्र है जब तक उसमें एक अद्यतन, तथ्यपूर्ण, समावेशी और सारवान ज्ञानकोश न हो।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशमें साहित्य से सम्बन्धित विषयों- साहित्येतिहास, साहित्य के सिद्धान्त, भाषाविज्ञान आदि के अलावा हिन्दी की लोकभाषाओं, हिन्दी-उर्दू अन्तःसम्बन्ध, बहुलतावादी भारतीय संस्कृति, कलाओं, धर्म, दर्शन, समाज विज्ञान, इतिहास, मीडिया, अनुवाद, मानवाधिकार, पर्यावरण, पश्चिमी सिद्धान्तकार, राजनैतिक व्यक्तित्व, पौराणिक चरित्र, लोकसंस्कृति, वैश्वीकरण, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, सभी राष्ट्रीय भाषाओं, प्रबन्धन आदि 33 विषयों से सम्बन्धित 2640 प्रविष्टियाँ हैं। 

ये प्रविष्टियाँ 300 से अधिक विद्वानों द्वारा लिखी गई हैं। पिछले दशकों से साहित्य का अर्थ व्यापक हुआ है। यह जितना स्थानीय और राष्ट्रीय मामला है, उतना ही हर देश में वैश्विक प्रभाव से भी जुड़ा है। इसलिए स्वाभाविक है कि हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशमें भारतीय जीवन की समस्याओं से जुड़े विविध विषयों का समावेश किया गया है।

हिन्दी की प्रकृति और भूमिका अन्य भारतीय भाषाओं से कुछ विशिष्ट है। इसलिए यह कोश हिन्दी प्रदेशों के अलावा दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और अन्य भारतीय क्षेत्रों की भाषाओं, संस्कृतियों, दर्शनों, सिद्धान्तों और महान कृतियों से भी साक्षात्कार कराएगा। इतना ही नहीं, यह हिन्दी क्षेत्र की 48 लोकभाषाओं, भाषाओं और इनकी कलाओं-संस्कृतियों की भी छवियाँ प्रस्तुत करेगा। 


 ज्ञानकोश : एक नज़र में 

·         पिछले 50 सालों में दुनिया में ज्ञान का जो नया विस्फोट हुआ, उसका कोई
प्रतिबिम्ब हिन्दी के पिछले ज्ञानकोशों में नहीं है, जबकि प्रस्तुत ज्ञानकोश में
अद्यतन सूचनाएँ और विश्लेषण हैं ।

·         हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश की 2640 प्रविष्टियाँ संख्या ही नहीं, गुण की दृष्टि
से भी पाठकों को आकर्षित करेंगी क्योंकि ये सम्पादक मण्डल के विद्धनों द्वारा  प्री-रिव्यूड हैं और बहुत जाँच-परख कर शामिल की गयी हैं

·         हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश में साहित्यिक विषय तो हैं ही, ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से संबन्धित प्रविष्टियाँ भी हैं जो अब तक और किसी विश्वकोश में नहीं हैं।

·         यह ज्ञानकोश साहित्य के विद्यार्थियों के अलावा आम पाठकों और जिज्ञासुके लिए भी एक धरोहर का काम करेगा जो, देश समाज संस्कृतियों और दुनिया को समझना चाहते हैं।

·         इस ज्ञानकोश के निर्माण में बासी कढ़ी में उबाल को भी पसन्द नहीं किया गया है।




आज का पाठक किसी कोश से बहुत सारी चीजों के बारे में जानना चाहता है। कोई कोश पाठक की सारी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं कर सकता, पर एक सार्थक कोश उसकी जिज्ञासाओं को तीव्र जरूर करता है। यह प्रसन्नता की बात है कि देश भर से वरिष्ठ और नयी पीढ़ी के लगभग 300 लेखकों द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखी गयी प्रविष्टियों के व्यापक सहयोग से यह हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशतैयार हुआ है। 

यह हिन्दी पर केन्द्रित होते हुए भी भारत के हजारों साल के चिन्तन और विविध उपलब्धियों का निचोड़ है, ताकि हिन्दी की विशिष्टता के साथ अखण्डता भी नजर आए। ज्ञानकोश का अर्थ महज सूचनाओं का गोदाम नहीं है। इसलिए हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशसूचनापरक होने के साथ पठनीय और व्यापक विजन से भरापूरा है। यह सम्पूर्ण देश और हिन्दी की एक सामूहिक उपलब्धि है। इसका निर्माण साहित्य और संस्कृति के एक बेहद कठिन समय में कई चुनौतियों से गुजरते हुए हुआ है।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके सम्पादक मंडल में देश के विभिन्न राज्यों के जानमाने विद्वान शामिल हैं- राधावल्लभ त्रिपाठी, जबरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह और अवधेश प्रसाद सिंह और अन्य गणमान्य विद्वान इसके सदस्य हैं।। प्रसिद्ध पत्रकार राजकिशोर ज्ञानकोश के भाषा सम्पादक हैं। हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके प्रधान सम्पादक हैं प्रसिद्ध शिक्षाविद् और आलोचक शंभुनाथ, जिन्होंने तीन साल के अथक परिश्रम से हिन्दी के एक बड़े सपने को मूर्त रूप प्रदान किया है।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशनिस्संदेह ही भारत की मूल्यवान सांस्कृतिक निधियों का दर्पण होगा। यह पूरे हिन्दी क्षेत्रा की बौद्धिक चेतना को जोड़ने का काम करेगा और ज्ञान के नये उजास से हिन्दी पाठकों को आलोकित करेगा।

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'एक महीना नज़्मों का' की समीक्षा



satyagrah.scroll.in  में 'एक महीना नज़्मों का' की समीक्षा

समीक्षक : गायत्री आर्य
दिनांक : 17 सितम्बर 2016   


अमूमन ऐसा होता है कि किसी की मोहब्बत का जिक्र, जिसमें मासूमियत और सच्चाई साफ झलकती हो, सुनते ही दर्शक, श्रोता या फिर पाठक, अपनी मोहब्बत के दौर में पहुंच जाते हैं. शायद इसलिए कि हर इंसान अपनी जिंदगी के उस दौर में बार-बार लौटकर जाना चाहता है. कुछ इसी भावना के साथ एक महीना नज़्मों काकी नज़्मों को भी बार-बार पढ़ते चले जाने का मन होता है
इरशाद कामिल की इस किताब का नाम एक महीना नज़्मों काकी जगह इश्क की नज़्मेंभी हो सकता था. पूरी किताब इश्क, मोहब्बत के अलग-अलग वरक खोलती जाती है
इस नज़्म संग्रह में इरशाद कामिल की रोमानी डायरी की नज़्में दर्ज हैं. लगभग सभी नज़्में प्रेम के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. इरशाद ऐसे अदभुत कलमनवीस हैं जिनके दिल में जकड़न के खिलाफ आग और प्रेम की ऊष्मा एक साथ रहती है. इरशाद के भीतर की यह आग उनके गानों में साफ दिखती है. खासतौर से रॉकस्टार फिल्म के उस गाने में तुम लोगों की इस दुनिया में हर कदम पे इंसां गलत... मतलब कि तुम सबका मुझ पर मुझसे भी ज्यादा हक है.जहां तक इस किताब की बात है इन नज्मों में वे खुद को ऐसे प्रेमी के रूप में देखते हैं जिसने हमेशा प्रेम किया है और सबसे किया है - जब से दुनिया बनी है मैं मोहब्बत करता आ रहा हूं और जब तक रहेगी मोहब्बत करता रहूंगा... आजकल भी तो मैं घूमता हूं हर गली-मोहल्ले में आशिक बनकर
किताब की शुरुआत में लेखक ने खुद को एक अजनबी की नजर से देखने की कोशिश की है. यह वो दौर था जब लेखक इरशाद कामिल का जन्म हो रहा था. रोमानी डायरी सेवाले हिस्से में इरशाद खुद से की गई बातचीत में लिखते हैं - मैंने पूछा, माचिस है? वो मुस्कुराता हुआ बोला, आग है... आप न जाने इरशाद कामिल को कैसे, क्यों और कितना जानते हैं... आप उसे जो भी समझें लेकिन मैं उसे बेहद मामूली और फालतू दिमाग वाला इंसान मानता हूं. मामूली बातों से खुश भी हो जाता है और नाराज़ भी. खुशी कभी-कभार जाहिर कर भी देता है लेकिन नाराजगी ऐसे संभाल लेता है जैसे वो उसकी कमाई हो
लेखक कहता तो है कि इश्क से गैरजरूरी काम इस कामकाजी दुनिया में कोई नहीं, लेकिन उसका यकीं है कि वह इश्क ही है जो इस दुनिया को जीने लायक बनाए हुए है - चलो मोहब्बत की बात करें अब / मैले जिस्मों से उपर उठ कर /...चलो मोहब्बत की बात करें / जिन्दगी के पैरों तले / बेरहमी से रौंदे जाने के बाद / मरहम लगाएं जख्मी वजूद पर / जो शर्म से आंखें झुका कर / बैठा है सपनों के मजार पे / इससे बुरी कोई बात नहीं कर सकते / हम अपनी ही जिद में / धोखा दे चुके हैं अपने आपको / खेल चुके हैं खुद अपनी इज्जत से / भोग चुके हैं झूठ को सच की तरह... / अब इन हालात में / कोई गैरजरूरी बात ही कर सकते हैं हम / आओ मोहब्बत की बात करें
इरशाद कामिल हमारे दौर में गुलजार का ही एक और संस्करण हैं. वे गुलजार की ही तरह रोजमर्रा के जीवन से जुड़े शब्दों, कामों और घटनाओं को ऐसे गूंथते हैं कि उसे पढ़ने वाले उनके मुरीद हो जाएं
इरशाद कामिल की इस किताब का नाम एक महीना नज़्मों काकी जगह इश्क की नज़्मेंभी हो सकता था. पूरी किताब इश्क-मोहब्बत के अलग-अलग वरक खोलती जाती है और यह पढ़ते-पढ़ते आपको इसके इश्क में डूबे शब्दों और लेखक से मोहब्बत सी होती जाती है - मैं अपने आप को रख के / ख्याल में उसके / ये भूल जाऊं कभी / खुद को रख दिया था कहीं / वो अपने आप को रख के / नसीब में मेरे / उमर भर फिकर न करे अपनी
इरशाद कामिल हमारे दौर में गुलजार का ही एक और संस्करण हैं. वे गुलजार की ही तरह रोजमर्रा के जीवन से जुड़े शब्दों, कामों और घटनाओं को ऐसे गूंथते हैं कि उसे पढ़ने वाले उनके मुरीद हो जाएं - मुंडेरों पर पसरी मोहब्बत / सर्दी में खु़श्क गालों से / टपक-टपक पड़ती है / और शाम छलक जाती है / ये किताबें ले जाओ / जिनकी ओट से तुमने मुझे देखा था / ट्रांजिस्टर / जिसपे चलता हुआ एक गीत / अचानक ऊंचा कर दिया था तुमने / दोपहर के खाने के बर्तन / जिन्होंने मेरे लिए मुनादी की / लंच टाईम की/....पड़ोस की छत पर कल फिर धूप की राह देखेगा ख्याल पकाने के लिये
यूं तो इश्क बेहद निजी चीज है, लेकिन इरशाद का इश्क एक बिल्कुल अलग जमीन पर पलता-बढ़ता है. वे दुनिया से इश्क करने की बात भी करते हैं और इश्क में पूरी दुनिया के ख्याल की बात भी - चल मिलके इक गीत बनायें / उसके बाद विदा हो जायें / वो गीत हो गांव की लड़की का / चुपचाप बदलती धरती का / जो संवर के रहना चाहती है / वो गीत हो आम सी खुशियों का / जो होकर भी इस दुनिया में / जाने क्यों नजर नहीं आतीं /...वो गीत हो छोटे बच्चे का / जिसे दुनियादारी चांटों से / घर में सिखलाई जाती है / वो गीत तुम्हारा अपना हो / अब जान भी ले क्या कहके ही / हर बात बताई जाती है
जैसे सच्चा प्रेम कोई दिखावा नहीं उसी तरह यहां प्रेम की बात बेहद सरल भाषा में कही गई है, शब्दों का जरा भी पांडित्य प्रदर्शन नहीं है
गांव से शहर तक का सफर तय करने के क्रम में किशोर और युवावस्था के प्रेम भले ही पीछे छूट जाएं लेकिन आजीवन एक टीस बनकर कलेजे में दफन हो जाते हैं. इसी भाव की खूबसूरत नज़्म है निम्मो - बहुत देर तक रस्ता देखा / गांव को खुद पे हंसता देखा / उसे यकीं था लौटोगे तुम / तुम तो हो गये शहर में ही गुम / टूट गयी फिर वो बेचारी / इंतजार में हारी-हारी / निम्मो गांव की सड़क थी कच्ची / जिसको मेरे बिन रोना था / इक दिन पक्का होना था / अच्छा हुआ कि पक्की हो गयी / गांव में चलो तरक्की हो गयी / हां, पर मेरी निम्मो खो गयी
किताब में प्रेम के जितने तीव्र रंग और खुशबुएं हैं, उस हिसाब से किताब में बनी काली-सफेद पेंटिंग कुछ खटकती हैं. रंगीन पेंटिंग किताब के मिजाज को और शोख़ बना सकती थीं. नज़्मों की गिनती के लिए देवनागरी में अंकों का चुनाव सुखद लगता है और पुराने समय की याद दिलाता है
भौंडे गानों और उथले प्रेम के इस अंधेरे दौर में इरशाद एक उम्मीद हैं, एक राहत हैं, एक रौशनी हैं, जिनका दामन हमें कसके थामे रहना चाहिए. लेखक के लिए यह अहसास और मजबूत होना जरूरी है कि उनके शब्दों का क्या मतलब है इस समय में. हर एक शब्द इश्क के शहद में लिपटा हुआ है. पूरी किताब पढ़ने के बाद देर तक आप अपनी जबान पर वह मिठास महसूस कर सकते हैं. जैसे सच्चा प्रेम कोई दिखावा नहीं उसी तरह यहां प्रेम की बात बेहद सरल भाषा में कही गई है, शब्दों का जरा भी पांडित्य प्रदर्शन नहीं है. भाषा की सरलता और भावों की गहराई पाठकों को इरशाद का मुरीद बनाने की ताकत रखती है। 
किताब किसे पढ़नी चाहिए -
1. जो खूबसूरत नज़्म पढ़ने के शौकीन हों
2. जो अच्छी नज़्म लिखना सीखना चाहते हों
3. जो भी कोई प्रेम विषय पर कुछ अच्छा और बेहद सहज पढ़ना चाहता हों 
पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें : - 
http://www.vaniprakashan.in/details.php?prod_id=7240&title=EK%20MAHEENA%20NAZMON%20KA
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'पकी जेठ का गुलमोहर' की समीक्षा




satyagrah.scroll.in  में 'पकी जेठ का गुलमोहर' की समीक्षा

समीक्षक : गायत्री आर्य
दिनांक : 15 जनवरी 2017  



हर किसी की जिंदगी में जेठ जैसी कड़ी धूप कभी न कभी आती है और देर तक ठहरती भी हैलेकिन हर कोई उस झुलसा देने वाली तपिश में गुलमोहर बनकर नहीं खिलता. भगवानदास मोरवाल हिंदी साहित्य के ऐसे ही एक लेखक हैं जो जिंदगी के जेठ में गुलमोहर बनकर खिले हैं
पकी जेठ का गुलमोहर भगवानदास मोरवाल की 'स्मृति-कथा' है यानी वे संस्मरण जिनमें मेवात में बीते बचपन से लेकर राजधानी में पैर जमाने और लेखक बनने तक के लंबे सफर के छोटे-बड़े किस्से दर्ज हैं इस संस्मरण में आत्मकथा जैसी क्रमबद्धता है, मतलब कि बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था के बारे में जीवन के क्रम के हिसाब से ही बताया गया है. आत्मकथा जैसे इस संस्मरण में बहुत जगह लगता है कि जैसे इसका 'आत्म' भगवानदास मोरवाल न होकर खुद मेवात ही है
पूरे संस्मरण में लेखक की भाषा काफी चुटीली और कहीं-कहीं हास्य पैदा करने वाली है. खुद पर हंसकर दूसरों को हंसाने का फन भगवानदास इस किताब में बखूबी दिखाते हैं. उदाहरण के तौर पर हमारे कस्बे के कॉलेज का नायक, शरीफ़ खानदानी अल्हड़ युवतियों के सपनों का लुटेरा और हम जैसे नादान-नासमझ किशोरों के हृदय-सम्राट संदीप ज़ैदी की छब्बीस इंची बेलबॉटम और उनके साथ पहने जाने वाली सफ़ेद रेक्सीन की बद्धी वाली चप्पलें, हम जैसे किशोरों का एकमात्र सपना बन चुका था. इस सपने को पूरा करने का सबसे पहला गौरव मुझे मेरे ग़ैर-क़ानूनी रूप से किये गये लगभग बाल-विवाह के कारण प्राप्त हुआ था
भगवानदास मोरवाल हरियाणा के 'काला पानी' कहे जाने वाले मेवात के नगीना कस्बे के रहने वाले हैं. वे मेवात की नस-नस से वाकिफ हैं. बल्कि, यदि भगवानदास को मेवात का चलता-फिरता शब्दकोष कह दिया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा. उनके उपन्यास, ‘काला पहाड़‘, ‘बाबल तेरा देस मेंइस बात का सबूत हैं. इस स्मृति-कथा का एक सशक्त पक्ष यह भी है कि लेखक ने मेवात की खूबियों के साथ-साथ मेवात की खामियों को भी तटस्थता से उजागर किया है. हरियाणा वाले मेवों में पैतृक संपत्ति पर केवल पुत्रों का ही अधिकार होता है. घर के मुखिया (पुरुष) के देहान्त के बाद पत्नी और बेटियां उस संपत्ति (जिसमें खेत भी शामिल हैं) का उपयोग तो कर सकती हैं, किन्तु उसे न तो बेच सकती हैं और न ही वह बेटियों के नाम होती है....आज़ाद भारत में एक क़बीलाई स्त्री-विरोधी कानून का ऐसा खौफ़नाक चेहरा शायद ही कहीं देखने को मिले जैसा मेरे मेवात में देखने को मिलता है। 
मेवात हरियाणा का मुस्लिम बहुल इलाका है, जहां हिंदू-मुस्लिम आपस में इतने ज्यादा हिले-मिले हैं कि एक बार को विश्वास करना मुश्किल है. इस किताब में राजेन्द्र यादव का एक खत भी शामिल है जो उन्होंने भगवानदास की कहानी भूकम्पपढ़ने के बाद उन्हें लिखा था. उस खत में भी मेवात की हिंदू-मुस्लिम एकता का जिक्र करते हुए राजेन्द्र यादव लिखते हैं, ‘मेरी जानकारी में यह शायद पहली कहानी है जो मेवोंके जीवन पर लिखी गयी है. हो सकता है एकाध रांगेय राघव ने भी लिखी हो. मगर यह हिन्दी पाठकों के लिए नयी ही है, क्योंकि नामों से लेकर रीति-रिवाज़ और धार्मिक विश्वासों में वहां हिन्दू-मुसलमान इतने ज़्यादा घुले-मिले हैं कि बाहर वालों के लिए उस स्थिति को समझना मुश्किल है
कह सकते हैं कि 'पकी जेठ का गुलमोहर' कथाकार भगवानदास मोरवाल की स्मृतियों के बहाने मेवात और उसके जैसे अन्य ग्रामीण-शहरी समाजों की परतों की पड़ताल है. अब गांव पहले जैसे गांव नहीं रह गए, यह तो हर कोई कहता हुआ दिखता है. पर गांवों की फिजा बदलने के कारणों पर हर कोई गहराई से बात नहीं करता. मोरवाल गांवों के इसी बदलते परिवेश की पड़ताल अपनी स्मृति-कथा में करते हुए लिखते हैं, ‘1986 तक आते-आते हमारे घर से दो काम हमेशा के लिए विदा हो गये. पहला, घर का पुश्तैनी धन्धा, माटी के बासन बनाना और दूसरा, जिससे घर का आधा ख़र्च पूरा होता था, यानी भैंस रखना. पुश्तैनी धन्धा विदा होने की ख़ास वजह थी एक-एक कर परिवार का एकल हो जाना. इसके इलावा हम तीनों भाइयों में से किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली....जबकि भैंसों को न रखने की मुख्य वजह पर्यावरण में तेज़ी से आया परिवर्तन था....पशु-चारे की क़िल्लत और दुधारू पशुओं, खासकर भैंस की बढ़ती बेतहाशा कीमत के चलते, एक आम भूमिहर परिवार भैंस रखने की कल्पना भी नहीं कर सकता
राजनीतिक दलों ने किस तरह से अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पूरे देश की सांप्रदायिक एकता को खत्म किया है, इसका बहुत सटीक उदाहरण इस किताब में मिलता है. देश की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों की सद्भावना रैली के दौरान मेवात में न सिर्फ हिंसा, बल्कि हत्याएं तक होती हैं. भगवानदास लिखते हैं मेवात में जब लगा कि हालात ठीक हैं उसके लगभग पौने दो महीने बाद 30 जनवरी, 1993 को फिर से सद्भाव बहाल करने की ग़रज से, एक तरफ़ निकाली गयी सत्ताधारी कांग्रेस और दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा निकाली गयी नूंह में तथाकथित सद्भावना रैलियों ने स्थिति को सात दिसम्बर से भी ज़्यादा विस्फोटक बना दिया. इन दोनों राजनीतिक पार्टियों ने गांधी के इस शहीदी दिवस को मेवात के इतिहास में एक बदनुमा धब्बे की तरह दर्ज़ कर दिया. इन दोनों पार्टियों के तथाकथित देशभक्तों और राष्ट्रवादियों की ख़ूनी झड़प के चलते, ठाकुर बाहुल्य क़स्बे उजीना में चार लोगों को ज़िन्दा जला दिया गया
जिंदगी यदि जेठ की दुपहरी है तो भगवानदास मोरवाल उसी दुपहरी खिला गुलमोहर जो अपने लेखन के चटख रंग से आंखों को सुकून देते हैं. पूरी किताब छोटे-छोटे संस्मरणों की एक लंबी लड़ी है, जिसमें विविध रंगों की यादें चुटीले अंदाज में बयान की गई हैं. हालांकि दिल्ली आने के बाद लेखक द्वारा आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए किये जाने वाले और बतौर लेखक स्थापित होने के संघर्षों से जुड़े संस्मरण इतने ज्यादा हैं कि पढ़ते-पढ़ते कुछ बोरियत सी होने लगती है. इस कारण पूरी किताब को अंत तक पढ़ने के लिए जिस ललक की जरूरत है वह बीच में खो जाती है. किताब के अंतिम हिस्से में मेवात के हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द के खोने के कारणों और उनके प्रभाव को लेखक ने जिस तरह से दूसरे लोगों के खतों के माध्यम से बताया है वह पढ़ने लायक है. कह सकते हैं कि लेखक ने अपनी स्मृतियों के बहाने इस किताब में बहुजातीय ग्रामीण-शहरी समाज का अच्छा समाजशास्त्रीय अध्ययन किया है
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