Tuesday, 8 August 2017

मैकॉले,ऐलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा




  मैकॉले,ऐलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा   

-सम्पादक मडंल-

 हृदय कान्त दीवान  रमा कान्त अग्निहोत्री  अरुण चतुर्वेदी 

 वेददान सुधी  रजनी द्विवेदी 



 पुस्तक के सन्दर्भ में 
स्वतन्त्रता के 70 साल बाद भी यह माना जाता है कि हमारी शिक्षा मैकॉलेवुडसार्जेण्टबेंटिक व ऐलफिन्सटन के विचारों तले चरमरा रही है। इन लोगों ने ऐसे कौन से कदम उठाए जिनसे भारत में शिक्षणज्ञान-निर्माण व अन्य सभी बौद्धिक कार्य कुन्द पड़ गयेक्या मैकॉलेवादी शिक्षा के लिएहम स्वयं जिम्मेदार नहीं हैंक्या मैकॉले को एक खलनायक मानें या एक महानायक या एक साधारण लेखक व अफसरएक ऐसा इन्सान जो कई अलग-अलग परिस्थितियों के कारण भारत के इतिहास का एक मुख्य एवं विवादास्पद हिस्सा बन गया। मैकॉले को किस नज़रिए से देखा जाए यह कहना सचमुच बहुत कठिन है। यदि आप आज तक इस दुविधा में नहीं थे तो इस पुस्तक के लेखों को पढ़कर निश्चित इन अलग-अलग दृष्टिकोणों के बारे में सोचना अवश्य शुरू कर देंगे।
मैकॉले को शिक्षा महाविद्यालयों के लगभग हर सेमिनारकक्षाओं व चर्चाओं में कोसा जाता है। यह कहा जाता है कि आज हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने जो चुनौतियाँ हैं और इसकी जो स्थिति है उसकी बदहाल ज़िम्मेदारी मैकॉले की ही है। यह सवाल पूछना आवश्यक है कि क्या इसे सन्तोषजनक उत्तर माना जाएमैकॉले की शिक्षा पद्धति के वे कौन से मुख्य पहलू हैं जो हमारी आज की शिक्षा व्यवस्था से ऐसे चिपक गये हैं कि हम सब चाह कर भी उनसे विलग नहीं हो पा रहे हैं। या फिर मैकॉले का नाम सिर्फ़ एक बहाना है और असल में हम सभी लोगों को शिक्षा में शामिल ही नहीं करना चाहतेशिक्षा के संवादों व परिचर्चाओं में संवैधानिक लक्ष्यों को हासिल करने के सम्बन्ध में एक असहायता नज़र आती है। इस असहायता का ठीकरा मैकॉले के सिर फोड़कर निश्चिन्त होना किस हद तक उचित है?

 हृदय कान्त दीवान 
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। इनका प्रमुख कार्य विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा कार्यक्रमों को दो भारतीय भाषाओंहिन्दी व कन्नड़ में शुरू करने व देश में हिन्दी व कन्नड़ में विमर्श व चिन्तन शुरू करने के प्रयास में योगदान देना है। इन्होंने एकलव्य व विद्या भवन के साथ कई वर्षों तक कार्य किया है और अभी भी जुड़े हैं। वे देश में स्कूलशिक्षक और उच्च शिक्षा में बदलाव के प्रयासों से 35 वर्ष से जुड़े हैं। 

रमा कान्त अग्निहोत्री
दिल्ली विश्वविद्यालय से भाषाशास्त्र के प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्तवर्तमान में विद्या भवन सोसायटीउदयपुर (राज.) में कार्यरत हैं। प्रायोगिक भाषाशास्त्रशब्द-संरचना तथा सामाजिक भाषाशास्त्र जैसे विषयों को लम्बे समय से पढ़ाते रहे हैं और उनके बारे में विस्तृत लेखन किया है।

अरुण चतुर्वेदी
मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालयउदयपुर में राजनीतिशास्त्र के भूतपूर्व आचार्य। वर्तमान में विद्या भवन से जुड़े हैं। अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिभारतीय विदेशनीतिअन्तरराष्ट्रीय कानूनमानव अधिकार और तृणमूल स्तर पर नियमित लेखन।

वेददान सुधीर
विद्या भवन इन्स्टीट्यूट में 35 वर्ष से राजनीतिशास्त्र का अध्यापन तथा इसी संस्थान में निदेशक। भारतीय संविधान के चर्चित प्रसंग’, ‘भारतीय संविधान और राजनीति’, ‘पुस्तकों का लेखन’, तथा भारत में पंचायती राज’, और ‘21वीं शताब्दी के सरोकार’, पुस्तकों का सम्पादन। 

रजनी द्विवेदी
शिक्षक प्रशिक्षणपाठ्यचर्या व पाठ्यपुस्तक निर्माणपत्र-पत्रिकाओं हेतु लेखन व सम्पादनशोध इत्यादि कार्य से जुड़ी रही हैं। शिक्षकों व बच्चों के लिए सीखने-सिखाने व भाषा सम्बन्धित सामग्री निर्माण में रुचि।





Tuesday, 1 August 2017

कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी के दो नये उपन्यास ​'जटायु' और 'जन्म यदि तब'


कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी

के दो नये उपन्यास



जटायु

महाश्वेता देवी के उपन्यास का मतलब ही हैकोई भिन्नतर स्वाद! किसी भिन्न जीवन की कथा! उनकी कथा-बयानी में न कोई ऊपरी-ऊपरी घटना होती हैन कोई हल्की-फुल्की घटना या कहानी। ज़िन्दगी के बिल्कुल जड़ तक पहुँच जाने की कथा ही वे सुनाती हैं। वह कहानी मानो कोई विशाल वृक्ष है। कहानी के नीचे बिछी पर्त-दर-पर्त मिट्टी को उकेरकरबिल्कुल जड़ से महाश्वेता अपना उपन्यास शुरू करती हैं और पेड़ ​की​ सुदूरतम फुनगी तक पहुँंच जाती हैं। बीवी दीदी इस उपन्यास में मूल चुम्बक! उन्हीं से जुड़े उभरे हैंवाणीहाबुलहरिकेशसतुदा जैसे कई-कई पात्र!

दरअसल, ‘जटायु’ उपन्यास में जितनी घटनाएँ हैंउससे कहीं ​ज़्याद ​ रिश्तों की खींचतान! दो चरित्रों के आपसी रिश्ते! यह सोच-सोचकर हैरत होती है कि उसी बीवी दीदी को उनके पिताउनके विवाहित जीवन में सुखी नहीं देख पाये। उधर बीवी दीदी यानी रमला हैंवे ​ज़िन्दगी ​ में कभी भी अपनी देहअपने पति के सामने बिछा नहीं पायीं! ऐसी जटिलता आखिर क्योंवैसे इस तरह की जटिलताइनसान के अन्दर ही बसी होती है! इनसान के अवचेतन में! उन्हीं अवचेतन दिलों की कहानी और मर्द-औरत के आपसी रिश्तों के बीच खींचतान की कहानी है -जटायु


जन्म यदि तब 
वह कविता कहाँ गयीबिटिया शर्मिष्ठाअरेवह कविताजो मैंने लिखी थी और फेंक दी थीहाँबिटिया,तूने उठाकर सहेज लिया थावर्नाचल फिर से लिख लेबेटू! बँगला में न लिख सकेतो चल अंग्रेजी में ही लिख ले। तू ना लिख पायेतो अपने गौर काका को बुला! वह बिल्कुल ठीक-ठीक लिख लेगा। सुन,बिटियामेरा बड़ा मन था कि वह कविता मेरी मौत के बाद...लेकिनमाँ बुला जो रही है! मेरी माँतेरी माँ! एक बार उन दोनों के पास चला गयातो दोबारा लौटकर आना नहीं होगाबिटिया...। इसी तरह के पात्रों के इर्दगिर्द बुनी गयी हैं 'जन्म यदि तब' उपन्यास की कथा।



बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रहीं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है।

महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है -दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी सन्देश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से गरीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें।

गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमीज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

निधन: 28 जुलाई 2016, कोलकाता।


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Saturday, 15 July 2017

Monday, 12 June 2017

वाणी प्रकाशन समाचार ( वर्ष :11, अंक : 121, जून 2017 )

प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

 वर्ष :11, अंक : 121, जून  2017  









'Pravasi putra' by Dr. Padmesh Gupta




 डॉ.पद्मेश गुप्त 

का नया कविता संग्रह 
प्रवासी पुत्र 

395/- /- | 978-93-5229-530-2| कविता संग्रह  

​ पुस्तक के सन्दर्भ में

हिन्दी भारत की भाषा है लेकिन केवल भारत की नहीं पिछले कुछ समय से वह दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में फैलती गयी है और यह विस्तार आज भी जारी है। लन्दन में हिन्दीवासी बड़ी संख्या में हैं और हिन्दी बोलते भी हैं। यद्यपि अंग्रेज़ी का वर्चस्व थोड़ा बढ़ा है पर पिछले अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि कुछ क्षेत्रों में खासतौर से यू.के. हिन्दी समिति व वातायन के प्रयास से हिन्दी न सिर्फ बढ़ी है बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनी है। गोष्ठियाँ होती हैंपत्रिकाएँ निकलती हैं और ये सब कुछ जिस एक व्यक्ति का प्रयास है उसे मैं सीधे-सीधे उसके नाम से याद करूँगा श्री पद्मेश गुप्त। वे मूलतः लखनवी हैं। उनके वयोवृद्ध पिता दाऊजी मेरे आज भी अच्छे मित्र हैं।

यह जानकर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई कि पद्मेश का नया कविता संग्रह आ रहा है। संग्रह के साथ की भूमिका से संग्रह की सभी कविताओं और पद्मेश के कविता कहने की कला की जानकारी तो मिल ही जायेगी पर अपनी ओर से यह कहूँगा कि यह कृति एक अभिनव प्रयास है और पद्मेश की अन्य रचनाओं से आगे बढ़ी हुई है।

इससे पहले उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं पर यह तीसरा संग्रह थोड़ा अलग ही दिखाई पड़ता है और पहले से कुछ और भी महत्त्वपूर्ण। मैं पूरा संग्रह तो नहीं देख सका हूँ लेकिन एक कविता पर मेरी दृष्टि पड़ीजो बेटे को निवेदित है। जो आज की भाषा में है और जिसका सन्देश भी ठेठ आज का है। 

पद्चिह्न-पुत्र प्रंकित को

चलते चलते बाज़ार में 
किसी ने मेरी अँगुलियाँ थामीं
मैं खिलौनों की दुकान की ओर बढ़ गया
क्षण भर में भ्रम टूटा,
और मैंने पाया...
मेरी हथेली को स्पर्श करने वाला...
सिर्फ एक हवा का झोंका था।
फिर कैसे?
मुझे अपने पदचिन्हों के साथ...
कुछ नन्हे पाँव के निशान भी दिखायी दिये
और सूर्यास्त सी मुस्कान के साथ
मैं स्वयं...
खिलौनों का बाज़ार हो गया।

कविताएँ दूसरी भी महत्त्वपूर्ण हैं पर इस अच्छी कविता के साथ मैं अपनी बात साधुवाद के साथ समाप्त करता हूँ और प्रियवर पद्मेश को हार्दिक बधाई देता हूँ।

-केदारनाथ सिंह

डॉ. पद्मेश गुप्त


पद्मेश अब तक ब्रिटेन में विश्व एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुए चार सम्मेलनोंलन्दन में 20 अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों, 1999 में यू.के. मेें हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संयोजकसैकड़ों साहित्यिक गोष्ठियों,अध्यापकों के अधिवेशन एवं शिविर तथा हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं।

आपने यू.के. में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका पुरवाई’ का 18 वर्षों तक सम्पादन एवं प्रकाशन किया तथा प्रवासी टुडे’ पत्रिका का वर्षों तक सम्पादन किया।

2017 में पद्मेश गुप्त ने भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,मानव संसाधन विकास मन्त्रालयभारत सरकार द्वारा पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ग्रहण किया।  


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